एक ऐसा मंदिर भी है जो हवा में झूल रहा है, हैंगिंग टेम्पल : वीरभद्र का मंदिर


एक ऐसा मंदिर भी है जो हवा में झूल रहा है, हैंगिंग टेम्पल : वीरभद्र का मंदिर
एक ऐसा मंदिर भी है जो हवा में झूल रहा है, हैंगिंग टेम्पल : वीरभद्र का मंदिर

आंध्र प्रदेश का एक जिला है लेपाक्षी और यहीं है वीरभद्र का मंदिर. यह मंदिर पत्थर से बना एक प्राचीन मंदिर है और जैसे द्रविड़ शैली से बने सभी दक्षिण भारतीय मंदिर वैसे ही इसका भी निर्माण हुआ है. सभी मंदिरों के सामान इस मंदिर में खम्भे है. और कुल मिलकर सत्तर खम्भे. सत्तर खम्भे तो कोई आश्चर्य नहीं है, कितने मंदिर तो सौ से भी अधिक खम्भे वाले होंगे. सच, इसमें तो कोई आश्चर्य नहीं है, लेकिन इन सत्तर खम्भों में उनहत्तर खम्भे ज़मीन पर खड़े हैं. हाँ आपने सही पढ़ा, उनहत्तर खम्भे. तो क्या एक खंभा हवा में है.

ये खम्भा पहले हवा में नहीं तैर रहा था पर एक ब्रिटिश कारीगर ने जब ये जानना चाहा के ये खम्बे टिके किस पर है और निचे से सफाई की तो ये खम्भा भी हवा में था, इसका मतलब ये भी है की बाकि के खंभे भी हवा में है. इस मंदिर को झूलते हुए मंदिर या हैंगिंग टेम्पल के नाम से भी जाना जाता है.

सच, यही तो रहस्य है एक खंभा जमीन के सहारे नहीं है, लगभग एक इंच ऊपर है. सभी खम्भों के जैसे वह भी पत्थर का है और पत्थर के खम्भे तो भारी होते ही हैं. और इतना ही नहीं, आप एक कपड़े को नीचे से गुजार भी सकते हैं. द्रविड़ शैली से बने इस मंदिर के आर्किटेक्ट का भी जवाब नहीं.

veerbadhra temple

 

मंदिरों के बारे जानने के लिए आपको उनको शैलियों को समझना होगा. भारतीय स्थापत्य कला में दो प्रमुख शैलियाँ हैं:

१. द्रविड़ शैली

२. नागर शैली

दक्षिण भारत के ज्यादार मंदिर द्रविड़ शैली से बने हैं, इनमे जैसे-जैसे समय बीता अनेक सुधार आये और शैली भी बने. उत्तर भारत के सभी मंदिर नागर शैली से बने हैं. लेकिन नागर शैली से बने बहुत थोड़े ही है या फिर नहीं के बराबर. बहुत से मंदिरों को तो बाद में बनाया गया. वाराणसी के बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में एक मंदिर है जिसको बिड़ला मंदिर या नया विश्वनाथजी मंदिर भी कहा जाता है. इस मंदिर को बनाने का मूल उद्देश्य इतिहास के छात्रों को नागर शैली के बारे में बताना था. इसको मदन मोहन मालवीय के आग्रह पर बिड़ला समूह के राजा बिड़ला ने बनवाया था. जरा सोचिये, कितना अजीब है कि एक स्थापत्य कला को समझने के लिए एक मंदिर नहीं बचा, सभी मंदिरों को लूटेरों ने तोड़ डाले. दक्षिण के मंदिर तो इसलिए बच गए क्योंकि उत्तर भारत तक लूटेरे जाते-जाते थक जाते थे और यातायात के साधन तो उस समय बहुत ख़राब थे. शायद यही वजह रही होगी की दक्षणी भारत में आज एक से बढ़कर एक सुन्दर, अद्भुत कालकीर्तियों से अलंकृत, ऊँचे ऊँचे मंदिर आज भी देख सकते है. कुछ मंदिर तो ऐसे है जिनका रहस्य २१ सदी के विज्ञान से पड़े और देखने हैरत में पड़ जाते है.

 

झूलते हुए मंदिर या हैंगिंग टेम्पल के अलावा इन्हें भी जान कर आप हैरत में पड़ जाएंगे.

 

श्रद्धालुओं की आस्था है की खम्भे के नीचे से कपडा निकलने से सुख सृमद्धि बढ़ती है.

खम्भे के नीचे से कपडा

 

 

एक ही पत्थर से बनी नंदी की सबसे विशाल प्रतिमा है.

वीरभद्र का मंदिर : Nandi

 

एक ही ग्रेनाइट पत्थर से बनी विशाल नागलिंग प्रतिमा भी स्थापित है जो की संभवतः सबसे विशाल प्रतिमा हैं.

नागलिंग प्रतिमा

 

मंदिर में है राम पदचिन्ह जबकि कइयों का मानना है की यह माता सीता के पैरों के निशान है.

राम पदचिन्ह जबकि कइयों का मानना है की यह माता सीता के पैरों के निशानveerabhadra temple,veerabhadra mandir, Lepakshi, andhrapradesh, ek aisa mandir jo hawa me jhulta hai, ise hanging temple ke naam se bhi jaana jaata hai

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