कृष्ण भगवान की नगरी द्वारका क्या वास्तव में कभी थी ?


कृष्ण भगवान की नगरी द्वारका क्या वास्तव में कभी थी ?
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कृष्ण भगवान की नगरी द्वारका क्या वास्तव में कभी थी ? Krishna bhagwan nagri Dwarka kya vastav me thi

पुरातत्व विज्ञान की जितनी आवश्यकता भारत में है उतनी दुनियां कहीं नहीं. क्योंकि इस देश के इतिहास में अनेक मिथक और पौराणिक कथाएं भरी परी है. इन मिथकों और कथाओं के बीच काल्पनिकता और प्रमाणिकता को अलग-अलग कर पाना सचमुच कठिन है. ऐसा ही एक चरित्र है भगवान कृष्ण का माना जाता था कि उनकी नगरी द्वारका मथुरा के निकट थी. लेकिन हाल ही में पुरातत्व वक्ताओं ने अरब सागर के निकट उस सोने की नगरी के बसे होने के प्रमाण पाए हैं. जो पुरातत्ववेता और इतिहासकार यह मानते हैं कि कृष्ण की द्वारका अरब सागर में थी.

सभी अपने इस बात की पुष्टि के लिए निम्न तर्क देते हैं. महाभारत महाकाव्य के अनुसार कंस जब अपनी बहन देवकी और उसके पति वासुदेव को उनके घर छोड़ने जा रहा था, तो रास्ते में एक आकाशवाणी हुई. जिसने उसे बताया कि देवकी की आठवीं संतान उसका वध करेगी. कंस ने आकाशवाणी पर विश्वास करते हुए अपनी बहन और बहनोई को बंदी बना लिया और बहन पर अत्याचार करते हुए उसकी सभी संतानों को मार डाला. लेकिन वह अपनी नियति से बच नहीं सका. देवकी का आठवां पुत्र बच गया था. वह बाद में भगवान श्रीकृष्ण के नाम से जाना गया और कंस का वध करके, आकाशवाणी का कथन सत्य कर दिखाया. हर जगह खुशियां मनाई गई. लेकिन मगध नरेश जरासंध ने जो कंस के ससुर थे. कसम खाई कि वह इसका प्रतिशोध लेंगे. मथुरा पर जरासंध के बार बार आक्रमण करने के कारण कृष्ण मथुरा छोड़ने पर विवश हो गए.

वे सौराष्ट्र चले आए, जहां उन्होंने कुशस्थली नगर के खंडहरों पर द्वारका नगरी का निर्माण किया. कुशस्थली का निर्माण 200 वर्ष पहले रेवत ने किया था. जो भगवान श्री कृष्ण के पूर्वज थे और आनर्त के पुत्र थे. महाभारत की भूमिका में हरिवंश द्वारा लिखे उपयुक्त वर्णन में आगे और भी उदाहरण मिलते हैं. उनके अनुसार भगवान कृष्ण की नगरी नारियल के पेड़ और अन्य पौधों से भरी पड़ी थी. परंतु जमीन पर्याप्त नहीं थी और राज्य में समुंद्र का एक हिस्सा आता था. इसलिए भगवान कृष्ण के अनुरोध पर समुंदर ने स्थान छोड़ दिया था.

कथा के अनुसार यह नगरी 36 वर्षों तक संपन्न रही. फिर भगवान कृष्ण के मोक्ष के साथ समुंदर ने इसे अपना शिकार बना लिया. लेकिन श्री कृष्ण को पहले ही इसकी जानकारी थी. इसलिए उन्होंने अर्जुन से कहा था कि उनकी मुक्ति के बाद 1 सप्ताह के अंदर वह इस नगरी को खाली करवा दे. अर्जुन ने कृष्ण की आज्ञा का पालन किया और जब नगर के अंतिम नागरिक उसे छोड़ रहे थे, तभी समुंद्र ने इस नगरी को निगल लिया. उसके अस्तित्व का कोई प्रमाण बाकी ना बचा. इसलिए इस विवरण पर विश्वास करते हुए और समुंद्र में कुछ महत्वपूर्ण साक्ष्य प्राप्त करने पर इतिहासकारो ने इस बात पर विश्वास कर लिया. यही भगवान श्रीकृष्ण की द्वारिका नगरी है.

लेकिन उनके आलोचक इसे मानने को तैयार नहीं है. द्वारका से संबंधित मांगते हैं और जब तक ऐसा नहीं होगा तब तक वह इस बात पर विश्वास करने से इनकार करते हैं. इस पर विश्वास करने वाले लोग इस स्थान पर पाए गए कमल के चिन्ह वाले शंख और महाभारत में ऐसे ही संख के उल्लेख की ओर संकेत करते हैं. इसके अतिरिक्त इस सिद्धांत के प्रवर्तक मानते हैं कि इस स्थान पर मिले मंदिर प्राचीन मंदिरों के अवशेष पर बने हुए हैं.

अंत में उनका कहना है कि द्वारिका जिस रेवत पर्वत पर स्थित थी वो आज की वरदा पहाड़ियां हैं. महाभारत और पुरानी कथाओं के अतिरिक्त घर जातक जो 300 ईसवी पूर्व में रची गई थी. वासुदेव और उनके नो भाइयों के विस्तृत विवरण मिलते हैं. उनमें उनके अनेक युद्धों और अंत में एक खूबसूरत द्वारका जिसके एक और पहाड़ थे और दूसरी और समुंद्र में बस जाने का उल्लेख है.

द्वारका निवासी डॉक्टर जयंतीलाल ठक्कर ने अपने आसपास के क्षेत्र का बहुत सूक्ष्मता से अध्ययन किया. वहां से दबे हुए घरों, मिट्टी के बर्तनों, सिक्का और चूड़ियों के अवशेष प्राप्त किए. इन को प्रमाणिक मान का उन्होंने इस पर बल दिया कि भगवान श्री कृष्ण की द्वारिका द्वारकाधीश मंदिर के निकट या उसके नीचे बसी हुई थी. बाद में समुद्र में समा गई.

दक्कन कॉलेज होने के प्रोफेसर अच्. डी. संकालिया इन ग्रंथ के प्रमाण में कुछ हद तक विश्वास करते हैं. उन्होंने सन 1963 में द्वारकाधीश मंदिर के निकट कुछ खुदाई की. खुदाई काफी दिन चली और उनकी पहली धारणा की पुष्टि हुई. यहां एक के ऊपर चार सभ्यताएं अवस्थित है. परंतु वह यह नहीं मानते कि यह श्री कृष्ण की द्वारका थे. संकालिया महाज यह कहते हैं, कि तमाम खोज यह संकेत करती है कि यह अत्यंत प्राचीन सभ्यता थी.

दूसरी और इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ एशियन ओशियनो ग्राफी के डॉक्टर एस. एस. राव ने सन् 1979 में द्वारिकाधीश मंदिर के निकट कुछ खुदाई करवाई. वहां उन्हें बारहवीं शताब्दी के मंदिर के अलंकृत खंबे और अवशेष तथा नोंवी शताब्दी के विष्णु मंदिर के अवशेष मिले. इससे भी पुराने काल के दो अन्य मंदिर भी प्राप्त हुए. वास्तव में डॉक्टर राव को यहां एक ही स्थान पर आठ सभ्यताओं के अवशेष प्राप्त हुए. उनके अनुसार इस स्थान पर पहली सभ्यता 15वीं शताब्दी पूर्व में आकर बसी होगी. उनकी खोज से पता चलता है कि लगभग 35000 वर्ष पहले यहां समुंद्र ने बहुत नुकसान पहुंचाया होगा और नगरी के अवशेष भगवान श्री कृष्ण की द्वारका के हो सकते हैं. बाद में छत से परे हुए खुदाई में विशाल चंद्राकार गढ़ और किले की दीवार तथा अन्य कल से प्राप्त हुए. यह सब गोमती घाट पर बने द्वारका बंदरगाह स्थित समुद्र नारायण मंदिर के 800 मील के क्षेत्र में पाए गए समुद्र तट पर आई. अनेक प्राचीन वस्तुओं जैसे शंख, मुद्रा आदि से भी सोने की नगरी द्वारिका के यही बसे होने के संकेत मिलते हैं. लेकिन यह भगवान श्री कृष्ण की नगरी थी अथवा नहीं यह निर्धारित करना कठिन है. ठोस पुरातत्वविद प्रमाण के प्रभाव में भगवान श्री कृष्ण की नगरी द्वारिका का रहस्य मनुष्य की कल्पना को अभी असमंजस में डाले हुए हैं.

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