कैसे डूब गई थी पूरी दुनिया अंधेरे में !


कैसे डूब गई थी पूरी दुनिया अंधेरे में !
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दोस्तों जैसा कि आप सभी जानते हैं कि हम अपने इस आर्टिकल में एक उस पुरानी घटना पर बात करने वाले हैं जिसमें विंध्या पर्वत ने दुनिया को प्रकाशित करने वाले भगवान सूर्य का मार्ग रोक लिया था और उसके कारण यह पूरी दुनिया अंधेरे में डूब गई थी. ऐसा क्यों हुआ था और किस कारण हुआ था चलिए जानते हैं अपने इस अंक में.

दोस्तों, कहा जाता है सूर्य देव सूर्योदय के समय तथा सूर्यास्त के बाद सुमेरु पर्वत की परिक्रमा किया करते थे. यह देख विंध्याचल पर्वत ने एक बार सूर्य से कहा – जिस प्रकार तुम सुमेरु पर्वत की परिक्रमा करते हो उसी प्रकार मेरी भी परिक्रमा किया करो. तब सूर्य देव ने कहा की – मैं अपनी इच्छा से सुमेरु पर्वत की परिक्रमा नहीं करता हूं. बल्कि, जिन्होंने इस जगत की रचना की है उन्होंने मेरे लिए यह कार्य निश्चित किया है. इस कारण ही मैं सुमेरु पर्वत की परिक्रमा करता हूं. मैं तुम्हारी परिक्रमा कदापि नहीं कर सकता हूँ.

दोस्तों, सूर्य के इस प्रकार कहने से अहंकारी विंध्य पर्वत को बड़ा क्रोध आ गया और उसने अपने मन में यह निश्चय किया कि वह सूर्य और चंद्रमा का मार्ग ही रोक देगा. अपने आप में यह निश्चय करने के बाद विंध्यपर्वत अपना आकार बढ़ाने लगा. जिसके कारण सारे संसार में अंधेरा सा छाने लगा. पशु, पक्षी, मनुष्य सभी इस मुसीबत को देखकर त्राहि-त्राहि करने लगे.

दोस्तों, विंध्या पर्वत का ये रूप देखकर देवता भी घबरा गए और सभी विंध्या पर्वत से विनती करने लगे कि वह संसार के प्राणियों का हित सोच कर अपना रूप छोटा कर लें. परंतु ,क्रोध से भरे विंध्याचल ने देवताओं से यही कहा कि जब तक सूरज मेरी परिक्रमा करने को तैयार नहीं होगा, मैं उसके रथ को आगे बढ़ने का मार्ग नहीं दूंगा और सूर्य देव ने भी यह कह दिया कि वह भी किसी भी स्थिति में विंध्य की परिक्रमा नहीं करेंगे.

दोस्तों, देवताओं ने विंध्य पर्वत को मनाने की बहुत कोशिश की परंतु, विंध्या पर्वत ने किसी की बात नहीं सुनी और सूर्य देव का मार्ग रोक कर खड़े रहे. तब सारे देवता परेशान होकर परमपिता ब्रम्हा जी की शरण में गए और उन्हें विंध्य पर्वत और सूर्य देव के बीच हुए घमासान के बारे में बता कर उनसे विनती की कि सारे संसार में त्राहि त्राहि मची हुई है. कृपया, आप ही इस घमासान को शांत करने का कोई उपाय कीजिए. तब परम पिता जी ने बहुत सोचकर देवताओं से कहा कि तुम सभी अगस्त ऋषि के पास जाओ, वही इस समस्या का समाधान कर सकते हैं.

दोस्तों, परमपिता ब्रह्मा जी के यह बात सुनकर सारे देवता अगस्त मुनि के पास गए और उन्हें विंध्या पर्वत और सूर्य देव के बीच हुई पूरी बात बता कर इसका समाधान करने की विनती की. देवताओं की यह बात सुनकर अगस्त ऋषि जी ने कुछ सोचा और फिर अपनी पत्नी को लेकर चल पड़े. अगस्त ऋषि चलते हुए विंध्या पर्वत के पास आए और उसे कहा मुझे एक अति आवश्यक कार्य से दक्षिण दिशा की ओर जाना है. इसलिए तुम अपना आकार पहले जैसा करके मुझे जाने का मार्ग दो.

दोस्तों, यह तो आप जानते ही हो, पहले कोई भी प्राणी देवताओं से उतना नहीं डरते थे जितना इन सिद्ध महर्षियों से डरते थे. इसलिए विंध्य पर्वत ने भी अगस्त मुनि से डरकर अपना आकर पहले जैसा छोटा कर लिया. लेकिन, अगस्त ऋषि ने विंध्य पर्वत को पार करने के बाद उससे कहा, कि जब तक मैं वापस न आ जाऊँ तुम अपने इस रुप में रहकर मेरी प्रतीक्षा करना. मेरे वापस आने के बाद तुम अपनी इच्छा अनुसार बढ़ते रहना.

दोस्तों, कहा जाता है, कि अगस्तमुनी फिर कभी वापस नहीं आए और विंध्य पर्वत आज भी अपने उसी रुप में अगस्त मुनि की प्रतीक्षा कर रहा है.

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