कैसे हुई थी भगवान श्री राम की मृत्यु


कैसे हुई थी भगवान श्री राम की मृत्यु
कैसे हुई थी भगवान श्री राम की मृत्यु

दोस्तों हमारे लेख का नाम देखकर आप सभी यह सोच रहे होंगे कि भगवान श्री राम की मृत्यु की बात कैसे हो सकती है | पर दोस्तों यह विधान तो परमपिता ब्रह्मा जी का ही बनाया हुआ है कि जो प्राणी इस पृथ्वी पर जन्म लेगा उसकी मृत्यु निश्चित है, चाहे वह कोई भी हो |

भगवान विष्णु जी ने राक्षस रावण का वध करने के लिए पृथ्वी पर अपने मनुष्य रूप में श्री राम का अवतार लिया था | इस कारण उन्हें अपने शरीर को त्यागना ही था | उन्होंने अपने तरीके से अपने शरीर का त्याग किया था | भगवान श्री राम और उनके साथियों, अवतार लेने वाले उनके तीनो भाइयो और उन सभी वानरों ने अपने शरीर का त्याग किस प्रकार किया था यह हम अपने इस लेख के माध्यम से आप लोगो को बताएँगे |

दोस्तों आप रामायण की इस कहानी के बारे में तो जानते ही हैं कि रावण का वध करने के बाद भगवान श्री राम अपना बनवास पूरा करके अयोध्या वापस आए थे तो अयोध्या नगरी के राजा बने थे और सुखी पूर्वक रहने लगे थे | परंतु इसी बीच उनके राज्य के धोनी के उन शब्दों ने उन्हें दुविधा में डाल दिया था जिसमें धोबी ने अपनी एक रात घर से बाहर रही हो पत्नी को अपने घर से बाहर निकालते हुए क्रोध में यह कह दिया था कि मैं राजा राम नहीं हूं | जो किसी पराए के घर में रहकर आई सीता को अपने साथ रखा | दोस्तों भगवान राम जानते थे कि उनकी पत्नी देवी सीता अग्नि की तरह पवित्र है फिर भी उन्होंने अपना राज्य धर्म निभाते हुए अपनी गर्भवती पत्नी देवी सीता का त्याग कर दिया था |

भगवान राम के भाई लक्ष्मण, देवी सीता को एक भयानक जंगल में छोड़ आए थे | तब देवी सीता ने वन में रहनेवाले महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में शरण ली थी | उस आश्रम में अपने दो पुत्रों की लव और कुश को जन्म दिया था | दोस्तों आप लोगों यह भी जानते होंगे कि देवी सीता ने भगवान राम को जब उनके दोनों को पुत्रो को सौपती है | तब वह स्वयं अपनी जननी देवी पृथ्वी की गोद में समा गई |

भगवान राम 11000 वर्षों तक इस पृथ्वी पर रहे थे | जब यह 11000 वर्ष पूरे होने को थे तब एक दिन भगवान राम से मिलने के लिए एक तपस्वी आते हैं और भगवान राम से कहते हैं कि मैं आपसे कुछ आवश्यक बात करना चाहता हूं | परंतु उससे पहले आपको यह वचन देना पड़ेगा कि जो कोई हमारी बात सुने या बात करता देखें, उसका आपको वक्त करना पड़ेगा | तपस्वी की बात सुनकर भगवान राम ने कहा ठीक है ऐसा ही होगा | फिर भगवान राम ने अपने पास खड़े लक्ष्मण से कहा कि द्वारपाल के स्थान पर तुम कक्ष के बाहर पहरा दो | दोस्तों जब लक्ष्मण जी कक्ष के बाहर पहरा देने लगे तब कुछ तपस्वी ने भगवान राम से कहा कि मैं काल हूं और मुझे ब्रह्मा जी ने आपके पास यहाँ भेजा है | आपने स्वयं ही 11000 वर्षों तक पृथ्वी पर रहने की अवधि तय की थी जो पूरी हो चुकी है |इसलिए अभी आप और रहना चाहते हैं या अपने परम धाम वापस जाना चाहते हैं |

दोस्तों भगवान श्रीराम, काल के साथ कक्ष में बातें कर रहे थे की तभी दुर्वाशा ऋषि आ गए | और द्वारा के बाहर पहरा दे रहे लक्ष्मण से कहा कि श्री राम को मेरे आने की सूचना दे दो | परंतु लक्ष्मण जी ने भगवान श्री राम के आदेश का पालन करते हुए दुर्वाशा ऋषि से क्षमा मांगते हुए यह कह दिया कि भगवान राम अभी आप से नहीं मिल सकते हैं आप थोड़ी प्रतीक्षा कीजिए |

दोस्तों दुर्वाशा ऋषि को लक्ष्मण जी की बात सुनकर क्रोध आ गया और उन्होंने लक्ष्मण से कहा कि श्री राम को मेरे आने की सूचना दो नहीं तो मैं श्राप देकर राम लक्ष्मण और भरत सहित इस राज्य का विनाश कर दूंगा | दोस्तों दुर्वासा ऋषि की बात सुनकर लक्ष्मण जी ने सोचा ऋषि के श्राप से सभी का विनाश होने से अच्छा है कि अकेले मेरी ही मृत्यु हो | यह निश्चय कर के लक्ष्मण जी , बातचीत कर रहे भगवान श्री राम के पास आते हैं और उनसे दुर्वासा ऋषि के आने का समाचार बताते हैं | भगवान श्री राम तपस्वी रूपी काल को विदा करके दुर्वाशा ऋषि का सत्कार करते हैं |

दोस्तों भगवान श्रीराम ने काल को लक्ष्मण के सामने यह वचन दिया था कि जो उनकी बात सुनेगा या उन्हें बात करते देखेगा| उसका उन्हें वध करना पड़ेगा | अपने इस वचन से भगवान श्रीराम परेशान हो जाते हैं क्योंकि इस वचन के अनुसार उन्हें अपने भाई लक्ष्मण का वध करना था | तब वशिष्ठ जी ने कहा कि आप अपने दिए हुए वचन को पूरा करते हुए लक्ष्मण जी का त्याग कर दो क्योंकि किसी भी साधु पुरुष का त्याग करना उसका वध करने के समान होता है | वशिष्ठ जी की बात सुनकर भगवान श्री राम लक्ष्मण जी का परित्याग कर देते हैं|

दोस्तों इस कारण से राम के परित्याग कर देने से लक्ष्मण जी वहां से आंसू बहाते हुए चले जाते हैं और सीधे सरयू नदी के तट पर जाकर आचमन करते हैं और हाथ जोड़कर अपनी संपूर्ण इंद्रियों को वश में करके अपनी सांस रोक लेते हैं | यह देख सारे देवताओं उन पर फूलों की वर्षा करते हैं और देवराज इंद्र उनको उनके शरीर के साथ ही लेकर स्वर्ग में चले जाते हैं |

लक्ष्मण जी के मृत्यु लोक से चले जाने के बाद भगवान श्रीराम ने भी मृत्यु लोक को छोड़ देने का निश्चय कर लिया | भगवान श्रीराम का यह समाचार जानकर हनुमान ,सुग्रीव सहित सभी वानर और विभीषण अयोध्या आए | और भगवान राम भरत और शत्रुघ्न के साथ सभी वानर मृत्यु लोक को छोड़ने का निश्चय कर लेते हैं | भगवान श्री राम ने हनुमान विभीषण सहित पांच लोगों को मृत्युलोक छोड़ने से मना कर दिया | पर सभी वानर और अयोध्या वासियों ने भगवान श्री राम के साथ सरयू नदी में प्रवेश किया और सरयू नदी के जल में विलीन हो गए |

तो दोस्तों हमारी यह कहानी आपको कैसी लगी अपना कमेंट में जरुर शेयर करें

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