क्या ब्राह्मण भगवान एवं ग्रहों के एजेंट हैं ? वेद कहता है…


Kya Brahman bhagwan evam grhon ke agent hai ?

अमुक ग्रह का अमुक दान ब्राह्मण को करने से ग्रह शांत हो जाएंगे. क्या ब्राह्मण ग्रहों के एजेंट हैं? सनातन धर्म की मान्यता के अनुसार कोई भी घटना अचानक घटित नहीं होती. अचानक ही कोई रोग भी नहीं आता, उसके पीछे कारण होता है. पूर्व जन्म कृत्य पाप एवं पुण्य के परिणाम स्वरुप दुख, रोग, व्याधियां स्वयमेव प्रकट हो जाती है.

पूर्व जन्म कृत्य पाप व्याधि रूप बनकर मनुष्य को कष्ट देते हैं, जिनकी शांति औषधि, दान, जाप, होम और भगवान की पूजा से हो सकती है. इस बात को भारत ही नहीं, समस्त विश्व मानता है कि डॉक्टर दवा देने के बाद भी दुआ, दान, जाप और भगवान से प्रार्थना करने को कहते हैं, जिनके प्रभाव से रोग रहित व्यधित व्यक्ति चमत्कारिक रुप से ठीक होते देखे गए हैं.

द्रव्य को मनुष्य का ‘बाह्य प्राण’ माना जाता है. सो यदि कोई पुरुष स्वेच्छा से दान रूप में अमुक-अमुक वस्तु प्रदान करेगा, तो उसे कुछ हर्षपूर्ण कष्ट अवश्य होगा, जिससे रोग कष्ट निवृत हो जाएगा, यानि रोगी को जितना कष्ट भुगतना था, वह द्रव्य के दान देने से ठीक हो जाएगा. इसलिए दान भी हैसियत से कम करने पर फल नहीं देता. ग्रह घूसखोर नहीं, वह तो भगवान की ओर से नियुक्त किए गए न्यायाधीश हैं, जो पूर्व जन्म के पाप का दंड देते हैं. जैसे जज गलत कार्य करने वाले व्यक्ति को दंड सुनाता है कि इतना जुर्माना या इतने दिनों तक कैद. यदि जुर्माना भर दिया जाए, तो कैद में जाने की आवश्यकता नहीं रहती. इसी प्रकार शारीरिक, मानसिक कष्ट या दान पुण्यादि – इन दोनों विकल्पों में से एक को चुना जा सकता है .दान करने पर कष्ट अवश्य दूर होते हैं, मेरा यह निजी अनुभव है. उसी प्रकार ब्रह्मणों से अधिक भगवान के एजेंट और कौन हो सकते हैं, जो सदैव मंत्रो, पूजा-पाठ द्वारा हर समय भगवान का ध्यान रखते हैं. यह स्वयं वेद कहता है.

जो पुरुष देवताओं के निमित्त गाय को ब्राह्मणों को नहीं देता, उसको देवता दंड देते हैं. वेदादी स्मृतियां कहती है कि मनुष्यों में ब्राह्मण सर्वश्रेष्ठ है. स्वयं भगवान अपने मुखारविंद से ‘श्रीमद् भागवत गीता’ एवं ‘स्कंद पुराण’ में कहते हैं कि ब्राह्मण मुझे सबसे ज्यादा प्रिय है और उनकी ही कृपा से में समस्त ब्रह्मांड, भूखंड और इस चंचल लक्ष्मी का स्वामी हूं.

अतः निश्चित रूप में ब्रह्मणों से अधिक भगवान का एजेंट कौन हो सकता है, जो निरंतर गायत्री जाप से प्रायश्चित कर्म करते हैं तथा दान को पचाने की शक्ति रखते हैं, इसलिए वहीं दान लेने के अधिकारी हैं.


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