जलाने और दफ़नाने के अलावा कई विचित्र तरिकें भी है अंतिम संस्कार के लिए


जलाने और दफ़नाने के अलावा कई विचित्र तरिकें भी है अंतिम संस्कार के लिए
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मरने के बाद हर धर्म में इंसानी शरीर का अंतिम संस्कार किया जाता है. और सभी धर्म और संप्रदाय में अंतिम संस्कार की विधियां अलग अलग है. देखा जाए तो पूरी दुनिया में मरने के बाद शरीर को खत्म करने के मुख्यतः दो तरीके हैं. पहला है दफनाना और दूसरा दाह संस्कार करना यानि जलाना. इन दो मुख्य संस्कारो के अलावा भी कई तरिकें है अंतिम संस्कार के लिए, जो की आज हम अपने इस आर्टिकल ( जलाने और दफ़नाने के अलावा कई विचित्र तरिकें भी है अंतिम संस्कार के लिए ) में आप लोगों के साथ साझा करने वाले है. इनमे से कुछ अंतिम संस्कार कुछ इस प्रकार है – ममी बनाकर रखना, उबालकर कंकाल बनाना, गुफा में रखना, नदी में प्रवाहित कर देना, पशु-पक्षियों को खाने के लिए खुले मैदान में छोड़ना और शवों को खा जाने की भी परंपराएं भी शामिल है. दोस्तों, आइए जानते हैं दुनिया के अलग-अलग धर्मों और समुदायों में अंतिम संस्कार के लिए अपनाए जाने वाले विचित्र तरीकों के बारे में..

 

मृत शरीर को खुले आसमान के निचे छोड़ देने की परंपरा

पारसी समाज में अंतिम संस्कार के लिए आज भी मृतकों को न तो दफनाया जाता है और न ही जलाया जाता है. पारसी समाज के लोग शव को चील घर में रख देते थे ताकि उनका मृत परिजन गिद्धों व चीलों का भोजन बन जाए. आधुनिक युग में यह संभव नहीं है क्योंकि गिद्धों की संख्या तेजी से घटती जा रही है. इन्ही कारणो से उन्होंने नया उपाय ढूंढ लिया है. वे शव को कब्रिस्तान में रख देते हैं, जहां सौर ऊर्जा की विशालकाय प्लेटें लगी होती हैं, जिसमे शव धीरे-धीरे जलकर भस्म हो जाता है

गिद्धों को खाने के लिए डाल दिए जाते है

 

शव को खा जाने की परंपरा

ये सबसे विचित्र अंतिम संस्कार की परंपरा न्यू गिनी और ब्राजील के कुछ क्षेत्रों की है. इसके अलावा कुछ कुपोषित देशो और जंगली क्षेत्रों में भी ये रिवाज प्रचलन में है. इस रिवाज के अनुसार मृत शरीर को उनके परिवार जनो और सगे-सम्बन्धियो के द्वारा खाया जाता है. कहा जाता है की इन क्षेत्रो में खाने का इतना आभाव है की यहाँ के लोग कुछ भी व्यर्थ नहीं होने देते. हालांकि आजकल ये अमानवीय तरीका बहुत कम क्षेत्रों में रह गया है.

शव को खा जाने की परंपरा

 

गला घोट कर मृतक के एक प्रिय व्यक्ति को मारा जाता है

फिजी के दक्षिण प्रशांत द्वीप पर प्राचीन भारत की सती प्रथा से मिलती-जुलती एक परंपरा चलन में है. यहाँ की लोगों का कहना है की अगर पारंपरिक अंतिम संस्कार किया जाए तो मरने वाले को अकेला नहीं छोड़ा जा सकता है और उसके साथ किसी एक प्रिय व्यक्ति को भी मरना पड़ता है. इसके लिए गला घोटे जाने की परंपरा है. कहते है कि ऐसा करने से मरने वाले को तकलीफ नहीं होती है.

गला घोट कर मृतक के एक प्रिय व्यक्ति को मारा जाता है

 

गिद्धों को खाने के लिए डाल दिए जाते है

व्रजयान बौद्ध संप्रदाय के लोग बहुत अनोखे तरीके से अंतिम संस्कार करते हैं. इस परंपरा में पहले शव को शमशान ले जाते है जो की एक ऊंचाई वाले इलाके में होता है. वहां पर बौद्ध भिक्षु धूप बत्ती जलाकर उस शव कि पहले पूजा करते है और फिर एक शमशान का कर्मचारी उस शव के छोटे छोटे टुकड़ो में काट देते है.

और फिर उन टुकड़ों को जौ के आटे के घोल में मिलाया जाता है. उसके बाद वो टुकड़े गिद्धों को खाने के लिए डाल दिए जाते है. जब गिद्ध सारा मांस खाकर चले जाते हैं. तो उन बची हुई हड्डियों को इकठ्ठा करके उनका चुरा किया जाता है और उनको भी जौ के आटा और याक के दूध से बने मक्खन के घोल में डुबो कर कौओ और बाज को खिला दिया जाता है.

मृत शरीर को खुले आसमान के निचे छोड़ देने की परंपरा

 

ताबूत को ऊंचे चट्टान पर लटकाने की परंपरा

चीनी में राजवंशी परिवारों में शवों को ताबूत में रखकर ऊंची चट्टानों पर लटकाने की परंपरा थी. उनकी मान्यता थी की इस तरह से ताबूत को लटकाने से मृत व्यक्ति स्वर्ग के करीब पहुंच जाता है और उनकी आत्माएं स्वंतत्र रूप से चट्टानों के चारों तरफ घूम सकती हैं.

 ताबूत को ऊंचे चट्टान पर लटकाने की परंपरा

 

ममी बनाने का परंपरा

मिस्र के गिजा परामिडों में ममी बनाकर रखे गए शवों के कारण, फराओ के साम्राज्य को आज भी दुनियाभर के लोगों के लिए रहश्य बना हुआ है. यहां पर मिले शव लगभग 3500 साल पुराने माने जाते हैं. कहते है कि मिस्त्र में यह मान कर शवों को ममी बनाकर दफना दिया जाता था, कि एक न एक दिन वे फिर जिंदा हो जाएंगे. वैसे तो ये परंपरा कई देशो में प्रचलित है, ऐसा नहीं है की सिर्फ मिस्र ही ये प्रथा प्रचलन में है बल्कि भारत, श्रीलंका, चीन, तिब्बत और थाइलैंड में भी छोटे समुदायों (बहुत ही कम लोगों द्वारा ) के लोगों द्वारा किया जाता रहा है. चीन और तिब्बत में आज भी कई हजार वर्ष प्राचीन ममियां मौजूद है.

ममी बनाने का परंपरा

 

गुफा में रखना या पानी में बहा देना

सबसे पहले इसराइल और इराकी सभ्यता में लोग अपने मृतकों को शहर के बाहर बनाई गई एक गुफा में रख छोड़ते थे. फिर गुफा को बाहर से पत्थर से बंद कर दिया जाता था. जब ईसा को सूली पर से उतारा गया तो उन्हें मृत समझकर उनका शव गुफा में रख दिया गया था. इतिहासकार कर मानना हैं कि यहूदियों में सबसे पहले दफनाए जाने या गुफा में रखे जाने की शुरुआत हुई थी. इन सभ्यता के लोगों ने भी बर्फ और पहाड़ी क्षेत्रों में समतल जगह की कमी के चलते गुफाओं में अपने मृतकों का अंतिम स्थल बनाया. दक्षिण अमेरिका की कई सभ्यताओं में नदियों के बहाव वाले क्षेत्रों में मृतकों को जल में प्रवाहित कर उनका अंतिम संस्कार किया जाता रहा है.

गुफा में रखना या पानी में बहा देना

 

जलाने की परंपरा

जिन क्षेत्रों में घने जंगल पाए जाते थे, उन क्षेत्रों में मौत के बाद शवों को जलाने की परंपरा है. हिंदू धर्म में शवों को जलाकर पंच तत्व में विलीन करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है. हिंदू मान्यता के अनुसार शव से तुरंत मोह छोड़कर उसे अग्रि के हवाले कर देना सबसे बेहतर है. जबकि कई अन्य धर्मों में शवों को जलाना एक गलत कृत्य माना गया है.

जलाने की परंपरा

 

दफनाने की परंपरा

दफनाने की परंपरा की शुरुआत भारत से हुई, वैदिक काल से संतों को समाधि दी जाती थी. आज भी हिंदू साधु समाज संतों का दाह संस्कार नहीं किया जाता, उनकी समाधि ही दी जाती है. इस्लाम धर्म को मानने वाले, मृतकों को जमीन में दफनाते है. इसके अलावा ईसाई धर्म में भी मरने के बाद दफ़नाने का ही रिवाज़ है.

दफनाने की परंपरा

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