ज़िन्दगी कितनी जेब में है, और कितनी नसीब में, देखना बाकी है, सोचना बाकी है …


ज़िन्दगी कितनी जेब में है, और कितनी नसीब में ,
देखना बाकी है , सोचना बाकी है …
उम्मीद का पठार जो अब हिरे सा दीखता है ,
परखना बाकी है , तराशना बाकी है …

मेरे हुनर की अब तक आतिश से नज़रें दो चार न हुई
मेरे ख्वाबों ने अब तक सुबह की धुप नहीं देखि ,
दिल जिस परिचेहरा के सड़के बेखुद हुआ जाता है
मेरी आशिक़ुई ने अब तक अपनी वो माशूक़ नहीं देखि .

मेरे आगे जो यह वक़्त बियाबान सा फैला है
इस स्याह रात के उस सिरे कोई सहर जरूर होगी ,
जो समंदर के सब राज़ साहिलों पर बिखेर दे ,
चाँद की दुआ रही तो वो एक लहर जरूर होगी .

की तब तक में ज़िन्दगी का साथ निभाता रहूँगा
डीलक्स जवाबों के न सही , बेचैन सवालों के गीत गाता रहूँगा ,
सोते बच्चे के ओट जो बुदबुदाते हैं वह नज़्म लिखूंगा
माँ की लोरियों से लिपटी सलामती के गीत गाता रहूँगा .

यूँ तो मेरे क़दमों ने सीख ली थी रस्सी पर चलने की कवायद
पर मैंने दुआ मांगी थी की मेरा दिल बहक जाए ,
सफर की दुश्वारियों को आसान यू करे हम
आवारगी की हसरत से हर रास्ता महक जाए .
ठीक उस वक़्त जब बर्फ गिर रही है सब ओर दुनिया मई
खून मेरा भाप बन जाए , ये रूह दाहक जाए .

की उस वक़्त तक मई अपने टुकड़े चुनता रहूँगा
फिर जाग उठने की हसरत में अपनी नींद बनता रहूँगा ,
माँ ने कुछ नसीहत दी थी अब याद नहीं मुझको ,
अब के माँ जब कहती होगी तो में लिखता रहूँगा …

  • By Amit Choudhary

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