आत्मसंतोष की महिमा : लोक कथाएं


आत्मसंतोष की महिमा : लोक कथाएं
आत्मसंतोष की महिमा : लोक कथाएं

Atmsantosh ki mahima : Lok Kathayen (Sikshaprad stories in hindi) : नेपाल की तराई में एक गांव था हेटौडा. उस गांव में एक आदमी रहता था. वह बहुत गरीब था. वह किसी तरह अपना गुजर बसर करता था. वह अपनी जिंदगी से बहुत बेजार था. कभी दिन को खाना मिलता तो रात को ना मिलता और रात को मिलता तो दिन में खाली पेट रहना पड़ता. उसे समझ में नहीं आता था कि भगवान उसे किस पाप का फल दे रहा है.

एक दिन की बात है. वह सिर झुकाए गांव की पगडंडी से गुजर रहा था. एकाएक उसकी नजर एक महात्मा पर गई. महात्मा ने उसे दीन दुखी देखकर उसका हालचाल पूछा तो गरीब ने रो-रो कर अपना सारा दुखड़ा सुना दिया. महात्मा उसकी हालत देख कर बहुत दुखी हुआ. उसने गरीब को एक मंत्र दिया और कहा इसका सुबह उठकर रोज उच्चारण किया कर उससे भगवान प्रसन्न होकर तुम्हें दर्शन देंगे. फिर तुम, उनसे मन की मुराद मांग लेना.

गरीब दें मंत्र याद कर लिया और प्रसन्नता से चला गया. अब वह रोज सुबह उठकर भगवान की आराधना करने लगा. कुछ दिनों तक लगातार आराधना करने से भगवान खुश हो गया और एक दिन प्रसन्न होकर उसे दर्शन दिए. भगवान ने कहा – मैं तुम्हारी भक्ति से बहुत प्रसन्न हूं, बोलो तुम क्या चाहते हो.

भगवान को साक्षात अपने निकट देखकर गरीब पहले तो एकाएक घबरा गया. अब क्या मांगे ? फिर वह हाथ जोड़कर चिंतामग्न हो गया. भगवान ने पुनः कहा – अरे भाई जल्दी से कुछ मांगो मुझे देर हो रही है.

बेचारा गरीब तब भी चुप रहा. उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या मांगे. वह चिंता में पड़ गया. एकाएक जब कुछ ना सुझा तो वह बोला – भगवान जी आप कल इसी समय आइएगा, तब तक मैं कुछ सोच लूंगा फिर आपसे मन की मुराद मांग लूंगा.

ठीक है ! यह कह कर भगवान तत्काल अंतर्ध्यान हो गए.

गरीब चिंता में पड़ गया. उसका चैन उड़ गया. कल भगवान फिर आएंगे. भला वह उनसे क्या मांगे. वह रात भर नीचे पड़ा पड़ा करवटें बदलने लगा. उसे रात भर में कुछ ना कुछ सोच कर सुबह भगवान से मन की मुराद मांगनी थी.

उसने सोचा कि उसके पास रहने को घर नहीं है. क्यों ना वह भगवान से एक बढ़िया सा मकान मांग ले. बड़े-बड़े जमींदार भी तो अच्छे सच्चे मकानों में रहते हैं. जमींदारों का कितना रौब है गांव वालों पर. बस मैं भी जमींदार हो जाऊंगा और गांव वालों के साथ रौब के साथ रहूंगा. लोग-बाग मुझे आमिर देखकर जल भून जायेंगे. बस उसने निर्णय कर लिया कि वह भगवान से जमीनदारी का वर मांगेंगे.

लेकिन, जमींदार से बड़ा राजा का मंत्री होता है. उसे याद आया, कि जब मंत्री लोग जमींदारों के पास कर आदि वसूल करने आते हैं तो वह किस तरह गिड़गिड़ाकर उसकी आवभगत करते हैं. इसका मतलब तो यह हुआ, कि जमींदार से बड़ा मंत्री होता है. वह जमींदार नहीं बनेगा. हां, मंत्री जरूर बनेगा. सुबह जब भगवान आएंगे तो वह मंत्री का वर मांगेंगे. मंत्रियों का रौब ज्यादा होता है.

लेकिन, मंत्री की राजा के सामने क्या बिसात. सबसे बड़ा तो राजा होता है. मंत्री तो राजा के सामने कुछ नहीं होते. वे तो राजा के नौकर होते हैं. राजा जैसा चाहता है उन्हें नचाता है. गरीब ने सोचा, जब भगवान भगवान मन की मुराद पूरी करने पर राजी है तो क्यों ना राजा का वर मांगा जाए. उसने तय कर लिया कि वह भगवान से और कुछ नहीं मांगेंगे. मांगेंगे तो वह तो बस राजा का पद. फिर तो सारी जिंदगी आराम से कट जाएगी. सारा देश अपने अधीन होगा जो चाहूंगा क्षण भर में सामने हाजिर हो जाएगा. लोग मेरी जय जयकार करेंगे. ठाट बाट और आराम से मैं रहूंगा.

अब आदमी की इच्छाएं और बढ़ने लगी. राजा बनने से ही उसका मन संतुष्ट ना हुआ. वह अपने राज्य को बढ़ाने के उपाय सोचने लगा. चक्रवर्ती राजा बनने के स्वप्न देखने लगा. सारी रात वह इन्हीं इच्छाओं, कल्पनाओं में तड़पता रहा. उसे कुछ समझ में नहीं आया कि भगवान से क्या मांगे मांगा जाए. सोचते-सोचते सुबह भी हो गई.

जैसे ही सूरज की पहली किरण उसकी झोपड़ी में प्रवेश की उसी के साथ ही भगवान ने भी उसे दर्शन दिए. बेचारा गरीब उनके सामने हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया.

भगवान ने पूछा – हां भाई तुमने रात भर में कुछ सोच लिया होगा अब जल्दी से वर मांगो.

गरीब रात भर इसी चिंता में सो न सका था. फिर भी कोई फैसला ना कर सका. उसने विनीत स्वर में कहा हे ईश्वर – मैंने तो सोचा पर मुझे कुछ समझ में नहीं आता कि क्या मांगू. मेरी तो लालसाएं एक के बाद एक बढ़ती ही जा रही है.

भगवान मुस्कुराए, बोले ठीक है ! मैं तुम्हारी प्रत्येक इक्षाएं पूरी कर दूंगा.

लेकिन गरीब ने तब भी कुछ ना मांगा. वह देख चुका था की इच्छाओं का कोई अंत नहीं. एक पूरी होती है तो दूसरे जन्म लेती है और दूसरी पूरी होती है तो तीसरे.

उसने कहा – हे प्रभु ! मुझे कुछ नहीं चाहिए. मुझे तो सिर्फ आत्मसंतोष चाहिए, ताकि मन में कोई वासना ना उपजे.

मैं तुमसे बहुत खुश हूं .सबसे बड़ी निजामत आत्मसंतोष ही है. तथाअस्तु कह कर भगवान चले गए.

उस दिन से गरीब ने कभी भी अपने को गरीब नहीं समझा. उसकी सभी हीन भावना खत्म हो गई. वह अपने में मगन रहता और जो कुछ मिलता उसी में गुजारा करके भगवान के भजन में लिप्त रहता.

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