कैसे भीष्म पितामह महाभारत के सबसे वीर, पराक्रमी महारथी और मृत्यु उनके वश में थी ?


कैसे भीष्म पितामह महाभारत के सबसे वीर, पराक्रमी महारथी और मृत्यु उनके वश में थी ?
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प्राचीन काल में कौरवों और पांडवों के बीच घोर संग्राम हुआ था, जिसे महाभारत कहते हैं. इस युद्ध में सबसे वीर और पराक्रमी महारथी भीष्म पितामह थे. उनकी बाण वर्षा से पांडव दल त्रस्त था. भीष्म पितामह कौरवों की सेना के पहले सेनापति थे. उन से युद्ध करते हुए अर्जुन ने समझ लिया था कि जब तक वह जीवित रहेंगे, पांडवों को विजय नहीं प्राप्त हो सकती. अर्जुन ने अपने सखा और सारथि श्री कृष्ण से पूछा – भगवान कोई ऐसी युक्ति बताइए जिससे मैं भीष्म पितामह का वध कर सकूं. उनके बाणों से हमारी सेना के हजारों वीरों का प्रतिदिन संघार हो रहा है. ऐसा लगता है कि उनके रहते हमारे लिए विजय प्राप्त करना संभव नहीं.

श्रीकृष्ण ने कहा – भाई अर्जुन, पांडव दल में कोई ऐसा वीर नहीं है जो भीष्म पितामह जेसे महारथी को युद्ध में पराजित कर सके. यह भी सही है, कि पितामह के जीवित रहते पांडवों को युद्ध में विजय नहीं मिल सकती. अतः तुम उनके पास जाकर उन्हीं से पूछो.

अर्जुन ने श्रीकृष्ण की बात मान ली और वह भीष्म पितामह के पास गए और उन्हें प्रणाम किया. अर्जुन का अभिप्राय जानने के बाद भीष्म पितामह ने उनसे कहा – राजा द्रुपद का पुत्र शिखंडी पूर्व जन्म में स्त्री था और अब नपुंसक है. अतः मैं उस पर बाण नहीं चलाऊंगा. पर उसके चलाए हुए बाणों का मुझ पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा. यदि उसके पीछे खड़े होकर तुम बाण चलाओ तब मैं घायल हो जाऊंगा.

भीष्म पितामह कौरव पक्ष से युद्ध तो कर रहे थे पर वे युद्ध में पांडवों की विजय चाहते थे. वह जानते थे कि यदि कौरवों की विजय हो जाएगी तो दुर्योधन अन्याय पूर्ण शासन चलाएगा. वह चाहते थे कि देश में युधिष्ठिर के धर्म राज्य की स्थापना हो, इसी कारण उन्होंने अर्जुन को अपने वध की युक्ति बता दी. श्री कृष्ण ने अगले दिन युद्ध की यही योजना बनाई. शिखंडी को भीष्म के सामने युद्ध करने के लिए भेजा गया.

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उसको देखते ही भीष्म पितामह ने अपने धनुष बाण रख दिए. उनको तो प्रतिज्ञा ही थी कि वह स्त्री का मुंह नहीं देखेंगे, उस से युद्ध करने की बात तो दूर रही. शिखंडी के पीछे से बाण चलाकर अर्जुन ने भीष्म पितामह को घायल कर दिया. वे रथ के नीचे गिर पड़े. उनके शरीर में चुभे बाण ही उनकी सैया बन गए.

पिताजी के वरदान से भीष्म पितामह की मृत्यु उनके वश में थी. जब पितामह घायल हुए थे तब सूर्य दक्षिणायन थे. पितामह अपने शरीर का त्याग उस समय करना चाहते थे जब सूर्य उत्तरायण में हो. अतः 58 दिन तक वे शर-शैया पर लेटे रहे. इस बीच युद्ध समाप्त होने के बाद सायंकाल दोनों दलों के महारथी प्रतिदिन भीष्म पितामह के दर्शन करते और उनका आशीर्वाद प्राप्त करते थे.

महाभारत के युद्ध में कौरव दल का विनाश हो गया. पांडवों को विजय मिली और युधिष्ठिर के धर्म राज की स्थापना हुई. युधिष्ठिर विजय पाकर भी संतुष्ट नहीं थे. उनका मन इस बात से बहुत दुखी था की युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए उन्हें स्वजनों का वध करना पड़ा. शांति प्राप्त करने के लिए युधिष्ठिर सरसैया पर लेटे हुए भीष्म पितामह के पास गए हैं. भीष्म ने उन्हें समझाया कि अब आप पश्चाताप ना करें. संसार में जो कुछ भी होता है, ईश्वर की इच्छा से होता है. मनुष्य केवल साधन मात्र है. अब आप धर्मराज की स्थापना करें और अपनी प्रजा के जीवन को सुखी बनाए.

युधिष्ठिर ने श्रद्धा से उनकी बातें सुनी और उन्हीं के कहने के अनुसार अपना शासन चलाया. भीष्म जब तक जीवित रहे, युधिष्ठिर को राज धर्म का उपदेश देते रहे.

सूर्य के उत्तरायण होने पर भीष्म पितामह ने अपनी इच्छा के अनुसार अपना शरीर त्याग दिया.

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