ब्रह्माजी ने देवता, मनुष्य और असुर को क्यों कहा, जाओ ‘द’ का जीवन में उपयोग करो


ब्रह्माजी ने देवता, मनुष्य और असुर को क्यों कहा, जाओ 'द' का जीवन में उपयोग करो
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भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में एक बहुत ही महत्वपूर्ण कथा प्रसिद्ध है. कहा जाता है, एक बार विश्व के निर्माता प्रजापति ब्रह्मा के पास देवता, मनुष्य और असुर (राक्षस) तीनो ही, एक ही समय पहुंचे और सम्मिलित रूप से प्रार्थना की : प्रभु हम सब को कोई ऐसा उपदेश दीजिए जिससे हम लोगों का जीवन सफल और सार्थक हो और साथ ही साथ मुक्ति भी प्राप्त हो जाए.

ब्रह्मा जी ने सम्मिलित रुप से ही, तीनो को एक ही अक्षर में, एक ही उपदेश देते हुए कहा – जाओ और ‘द’ का जीवन में उपयोग करो.

तीनों ही, देवता, मनुष्य और असुर : ब्रह्मा जी के इस ‘द’ उपदेश से बड़े ही संतुष्ट हुए और अपने अपने गंतव्य स्थान पर वापस हो गए.

स्मरण रहे, वापस होकर, सभी ने अपनी अपनी समझ और परिस्थिति के अनुसार ‘द’ का अर्थ लगाया और तदनुसार ही उसका उपयोग अपनी अपनी जीवन में किया और लाभांवित हुए.

देवताओं ने सोचा – स्वर्गलोक में कल्पवृक्ष है, जब जो चाहो, उपलब्ध है. यहां भोग विलास की समस्त वस्तुए प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है. हम इसमें इतना ना लिप्त हो जाते हैं कि हमारा विवेक भ्रष्ट हो जाता है और हम अपने परम महान उद्देश्य गिर जाते हैं और अंत में परिणाम यह होता है कि हम देवतागण अपनी इस भूल के कारण स्वर्ग से भ्रष्ट हो कर मृत्यु लोग – मनुष्य लोक पृथ्वी पर आ गिरते हैं. अतः, ब्रह्मा जी ने हमें ‘द’ का उपदेश देकर : ‘द’ से दमन करने का निर्देश किया है : आदेश दिया है. हमें अपनी इंद्रियों को संयमित करने का : अपने वश में रखने का उपदेश किया है. देवताओं ने ‘द’ से इंद्रियों के दमन में अपनी जीवन की सफलता और कल्याण माना है.

मनुष्य ने सोचा – भगवान ने मनुष्य को भी : हमें धरती पर, भोग के लिए, कल्याण के लिए प्रचुर सामग्री दी है – साथ ही साथ लोभ, मोह, काम आदि प्रवृत्ति ही जीवन से जोड़ दी है, फलतः, मनुष्य संपूर्ण जीवन में मोह, माया और लोभ में फंसकर सारी जिंदगी जीवन से मृत्यु पर्यंत संग्रह की लिप्सा में ही लिप्त रहता है. इसका अंतिम परिणाम यह होता है कि मनुष्य अपने जीवन के मूल उद्देश्य से भटक जाता है और सांसारिकता में आसक्त होकर अपने जीवन को नरक कर नग लेता है. प्रजापति ने कदाचित हमें ‘द’ से दान करने का निर्देश किया है. कारण ‘दान दिए धन ना घटे’, ऐसा अर्थ मनुष्य ने लगाया. मनुष्य ने दान में ही अपना कल्याण देखा, पाया. मनुष्य ने पाया कि दान करने से जग से विरक्ति होती है. धन के प्रति आसक्ति घटती है और प्रभु से मन जुड़ता है, जो जीवन की सफलता और कल्याण के लिए सार्थक तत्व है.

मनुष्य ने प्रजापति के ‘द’ उपदेश का निम्नांकित अर्थ और निष्कर्ष निकाला :

दान में ही मनुष्य जीवन की सार्थकता और कल्याण है.

और…

असुरों ने सोचा – प्रजापति ने हमारे जीवन में प्रचुर मात्रा में हिंसा भर दी है. हिंसा के मूल में क्रोध है. क्रोध और हिंसा की इस नित्यप्रति प्रवृत्ति के कारण हत्याएं, क्रूर-कर्म और हमारा सहज व्यापार और धर्म बन गई है और क्रोध तो नरक का मूल है – ‘क्रोध नरक का मूल है’ … क्रोध और हिंसा से जीवन और असफल होगा, इससे जीवन का कल्याण संभव ही नहीं. फिर कर्म फल के मुताबिक हमारे और अधम योनि में जन्म लेने की संभावना बनती है और नरक का मार्ग प्रशस्त होता है, खुलता है. कौन ऐसा कष्ट भोगे, अतः, प्रजापति ने हमारी कुत्सित वृतियों को ध्यान में रखकर सभी प्राणियों पर दया करने में ही कल्याण देखा, अतः ‘द’ के द्वारा दया का निर्देश, आदेश और उपदेश किया है. सच तो यह है कि हम प्राणियों पर दया करके ही हिंसक और क्रूर कर्मों से दूर रह सकते हैं और कुकर्मों से जो पाप और मानसिक आत्मिक अनुताप होगा, उस से मुक्त होकर जीवन को सार्थक और सफल बना सकते हैं. इस प्रकार असुर ने प्रजापति के ‘द’ उपदेश का निम्नांकित निष्कर्ष निकाला :

सभी प्राणियों पर दया करने में ही असुरों के और किसी के जीवन का कल्याण और हित छिपा है.

इस प्रकार, उपदेश की देवता, मनुष्य और असुरों की ‘द’ उपदेश कि, अपने-अपने ढंग से समझदारी की जानकारी प्रजापति को हुई : वे सबसे : तीनों से, बड़े ही प्रसन्न हुए और इन तीनों का जीवन प्रजापति की कृपा से सफल, सार्थक और जीवन मरण से मुक्त हो गया.

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