दया वीर की कथा – नीति कथा


दया वीर की कथा - नीति कथा
दया वीर की कथा - नीति कथा

Hindi story with moral : बहुत दिनों की बात है यमुना के तट पर योगिनीपुर नामक एक नगर था.

वहां एक यवन राजा राज्य करता था. उसका नाम अलाउद्दीन था. वह बलवान था. गरीबों की रक्षा करता था.

बलवान के साथ ही वह धनवान भी था. उसके राज्य के अधीन का प्रायः हर क्षेत्र समृद्ध था.

एक बार की बात है. वह अपने सेनापति से नाराज़ हो गया.

उस के सेनापति का नाम मुहिमशाही था.

सेनापति ने सोचा, क्रोधी राजा मुझे कहीं मरवा नहीं दे.

सेनापति ने वहां से भाग जाना ही उचित समझा. उसने अपने परिवार वालों के साथ भागना चाहा. फिर उसने सोचा कि परिवार वालों को छोड़ कर भागा जाए. फिर से उसने सोचा कि इन्हे अकेले छोड़ना उचित नहीं है.

उसके निकट ही राजा हम्मीर देव का राज्य था.

सेनापति ने विचार किया कि उसी की शरण में रहना चाहिए.

सेनापति हम्मीर देव की शरण में गया.

उसने राजा से कहा, मेरा मालिक मुझसे बिना कारण नाखुश है. वह मुझे जान से भी मार सकता है. मैं बहुत भयभीत होकर आपकी शरण में आया हूं. आप मेरी रक्षा करें. रक्षा करने में असमर्थ हो तो आज्ञा हो तो मैं दूसरी जगह जाऊं.

राजा हम्मीर देव बोले, तुमने मेरी शरण ली है. अब यमराज भी तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता. तुम निडर होकर यहीं रहो.

वह सेनापति राजा के किले में निर्भय होकर रहने लगा.

अलाउद्दीन को इसका पता चला. वह क्रोध से पागल हो उठा.

उसने अपनी सेना सजाई और हम्मीर देव पर चढ़ाई कर दी. घमासान युद्ध हुआ. कई दिनों तक युद्ध चलता रहा. अलाउद्दीन हम्मीर देव के किले के समीप पहुंच गया. उसने बाणों की वर्षा कर दी.

राजा हम्मीर देव भी सावधान था. उसने अपनी किले की घेराबंदी करा दी. ऊंची ऊंची बरछियाँ गढ़वा दी.

हम्मीर देव ने अपना धनुष बाण उठाया. धरती कांप उठी. आसमान में अंधेरा छा गया. चारों ओर बाणों की वर्षा होने लगी.

पहला युद्ध समाप्त हुआ. अलाउद्दीन ने राजा हम्मीर देव के पास एक दूत भेजा.

वहां जाकर दूत ने कहा, राजन ! मेरे राजा की आज्ञा है कि आप अपने किले से मुहीमशाही को बाहर निकाल दें. ऐसा नहीं हुआ तो सेनापति के साथ ही सुबह होते होते उसकी जान भी नहीं बचेगी.

दूत की बात सुनकर राजा हम्मीर देव क्रोध से आग बबूला हो उठा.

हम्मीर देव ने अत्यंत क्रोध के साथ दूत से कहा, तू दूत हो. इसलिए तुम्हारे प्राण मैं नहीं लेता हूं. अपने राजा से कह देना कि मेरी शरण में जो आ जाता है उसे यम के दूत भी नहीं ले जा सकते. तुम तो एक मामूली राजा हो. अपने राजा से कह देना कि इसका फैसला तलवार से ही होगा.

दूत ने अलाउद्दीन से सब बातें कह दी. वह भी क्रोध से पागल हो उठा. वह युद्ध के लिए तैयार हो गया.

यह युद्ध 3 वर्षों तक लगातार चलता रहा. बहुत से वीर मारे गए. कुछ भाग गए. कुछ अंत अंत तक डटे रहें.

अलाउद्दीन की लगभग आधी सेना मारी गई. बची हुई सेना हिम्मत हार चुकी थी. सेना की टूटती हिम्मत को देखकर अलाउद्दीन निराश हो गया.

वह वापस लौटने ही वाला था. इसी बीच हम्मीर देव की दो आदमी रायमल और रामपाल अलाउद्दीन से जा मिले.

उन्होंने हम्मीर देव के किले का भेद खोल दिया. खाने पीने की चीजे खत्म हो जाने की बात बता दी.

हम्मीर देव के मंत्रियों से किले का भेद जानकर अलाउद्दीन प्रसन्न हुआ. उसने हमीर देव के किले को चारों ओर से घेर लिया. अपनी किले को घिरा जानकर हम्मीर देव ने अपनी सेना से कहा, मैं समझता हूं कि मेरे पास सेना कम है. फिर भी शरण में आए हुए की रक्षा के लिए हमें सब कुछ करना है. मैं यह भी जानता हूं कि अलाउद्दीन के पास अधिक सैन्यबल है. हम पर संकट है. शरणागत की रक्षा करनी है. अतः तुम लोग कहीं छुप कर अपने प्राण बचाओ. मेरे कारण संकट में मत पड़ो.

हम्मीर देव के बहादुरों ने कहा, आप कैसी बातें करते हैं. आप निर्दोष हैं. शरणागत की प्राण प्राण रक्षा चाहते हैं. हम लोगों ने आपका अन्न खाया है. आप जैसे उदार राजा को अकेले छोड़ कर भाग जाना बहुत बड़ी कायरता है. हम कायर नहीं हैं. वीर राजा के वीर सैनिक है. हम भी कल लोहे से लोहा बजा देंगे. शत्रुओं के सर चूर चूर कर डालेंगे. महाराज का बाल बांका नहीं होने देंगे.

सैनिकों ने राजा को सलाह दी, मुहीमशाही को कहीं भेज दें. यह युद्ध इसी के लिए है. अगर इसकी प्राण रक्षा नहीं हुई तो हमारी वीरता व्यर्थ है.

मुहिमशाही ने सारी बातें सुनी.

उसने कहा, महाराज आप मेरे कारण ही इतना कष्ट उठा रहे हैं. अपने परिजनों से दूर है. आपके राज्य का विनाश हो रहा है. यह अच्छी बात नहीं है. अतः मेरी राय है कि आप मुझे अलाउद्दीन को शौप दे.

मुहिम साही की बात सुनकर राजा हम्मीर देव ने कहा, सेनापति ऐसा मत कहो. अगर तुम तैयार हो जाओ तो तुम्हें सुरक्षित स्थान में भेज दिया जाए.

यह सुन कर सेनापति बोला, राजन ! ऐसी बात मत कहें. सर्वप्रथम मैं ही अपनी शत्रु पर ट्टू पडूंगा. उनके दांत खट्टे कर दूंगा. यदि बुरा नहीं माने तो एक बात कहूं.

राजा ने पूछा, क्या कहना चाहते हो.

सेनापति ने बताया, यही की इन नारियों को किसी सुरक्षित स्थान पर भेज दें. ये अबला है ना. इनका कुछ अहित हो सकता है.

नारियां एक स्वर में बोल उठी, शरणागत की रक्षा के लिए अगर आप सब कुछ कर देने के लिए तैयार हैं तो हम भी आपके साथ हैं. हम भी शरणागत के पुण्य फल के भागीदारी है. क्या महाराज, उस पुन्य से हमें अलग करना चाहेंगे. हम अबला जरुर हैं, किंतु जब पति के प्राण पर संकट आ जाए तो हम चंडीका का भी रूप धारण कर सकती हैं.

राजन ! आप तो जानते ही हैं कि पति के बिना पत्नी का जीवित रहना अनर्थ है. क्या वृक्ष के बिना लता को चैन मिल सकता है. हम भी तैयार हैं दुश्मनों के दांत खट्टे करने के लिए. हम भी आग से खेलना जानते हैं, किंतु दुश्मनों की गुलामी कबूल करना नहीं.

शरणागत की प्राणरक्षा के लिए हम्मीर देव अटल हो गए. सैनिकों ने ईट से ईट बजाने का संकल्प किया. शरणार्थी ने तलवार उठाने का वादा दिया. नारियों ने आग से खेलने का निश्चय किया.

दूसरे दिन फिर वही युद्ध. तलवारें झनझना उठी. वीरों की भुजाएं फड़क उठी. हम्मीर देव ने कवच पहना. घोड़े पर सवार हुए. आग बरसाने वाले योद्धा उनके साथ हो लिए.

राजा किले से बाहर निकला. वह रणभूमि में कूद पड़ा. चमकती तलवार की मूठ पकड़ी. प्यासी तलवार से शत्रुओं के अनेक हाथी-घोड़े कटकर गिरने लगे. तलवार ने अपनी प्यास बुझाई.

शत्रुओं के रथ कटे. उसके सिर धड़ से अलग होने लगे. रणभूमि शमशान जैसी हो उठी. रक्त की धारा बह चली. रुण्ड मुंड से धरती पट गई.

शत्रुओं पर वज्रपात करते करते स्वयं राजा हम्मीर देव शत्रुओं के हथियार से क्षत-विक्षत हो गया. वह धरती माता की गोद में सदा के लिए सो गया.

हवाएं शांत थी. आसमान का चमकता सूर्य इस वीर का कथागान कर रहा था. ऐसे वीर को पाकर धरती अपने को धन्य धन्य समझती थी.

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