गाड़ीवान रैक्व


गाड़ीवान रैक्व
गाड़ीवान रैक्व

यह कहानी छांदोग्य उपनिषद की है गाड़ीवान रैक्व आत्मज्ञान को धन, सत्ता एवं ईश्वर से अधिक महत्व देते थे. आत्मा के विषय में जानकारी के लिए उनकी प्रसिद्धि थी.

प्राचीन समय में महावृष नाम का एक राज्य था. वहां के राजा का नाम जानश्रुति था. राजा उदार, धर्मात्मा, दानी एवं ज्ञानी थे. उन्होंने अपने संपूर्ण राज्य में धर्मशालाएं बनवा रखी थी, जहां मुफ्त में भोजन दिया जाता था. जानश्रुति को अपनी उपलब्धियों के ऊपर बहुत गर्व था. मानसिक शांति एवं धर्म के लिए वे दान दक्षिणा दिया करते थे और उसी से अपना महत्व आंकते थे.

एक दिन राजा अपने महल की छत पर आराम कर रहे थे. ठीक उनके ऊपर उड़ते हुए दो हंस बात करते हुए अपने घोंसले में जा रहे थे. राजा ने उनकी बात सुनी. हंस ने हंसिनी से कहा, क्या तुम राजा जानश्रुति के प्रताप को नहीं जानती ? तुम उनकी प्रसिद्धि की प्रकाश रेखा के पास मत जाओ नहीं तो जलकर भस्म हो जाओगी. दान देने के लिए इस समय वह सबसे अधिक प्रसिद्ध है.
हंसिनी हंसकर बोली, तुम मुझे डराते क्यों हो. हम आकाशचारी हैं और दूसरों की अपेक्षा संसार को अधिक जानते हैं. क्या इस राजा का महत्व गाड़ीवान रैक्व से अधिक है ? राजा यश, नाम एवं प्रशंसा के पीछे पागल है और इसी के लिए सब कुछ करता है. इतना दान दक्षिणा देने के बाद भी उसके मन में शांति नहीं है. रैक्व एक जगह शांतिचित रहता है और वही सब को आकर्षित करता है.

राजा जानश्रुति हंसो की बात सुनकर रैक्व का पता करने के विषय में सोचने लगा.

प्रातः प्रशस्तियों ने राजा को नींद से जगाने के लिए उसकी प्रशंसा की गीत गाने शुरू कर दिए. किंतु उसे अपनी प्रशंसा अच्छी नहीं लगी. वह सोचने लगा कि इस संसार में उससे भी महान लोग हैं. जानश्रुति ने अपने दरबारी प्रशस्ति गायकों को रोक कर कहा बोला – इन संसार में गाड़ीवान रैक्व मुझसे भी महान पुरुष है. अतः तुम लोग उसका पता लगाओ.

राजा की आज्ञा सुनकर चकित नौकर-चाकर रैक्व को खोजने चल पड़े. किंतु उन को रैक्व कहीं नहीं मिला. इस पर जानश्रुति क्रोध से बोला गाड़ीवान रैक्व को तुम लोग वहां ढूंढो जहां ब्रह्म ज्ञान एवं आत्मज्ञानी रहते हैं. राजा के नौकर रैक्व ऋषि को गांव गांव ढूंढने लगे. उन्हें दूर एक गांव में गाड़ीवान रैक्व मिल गया. शांतचित्त एवं दयापूर्ण रैक्व अपनी झोपड़ी के पास एक गाड़ी के नीचे बैठे थे.
रैक्व को देखकर राजा के नौकर बहुत चकित हुए. वह जानश्रुति को पागल समझने लगे, क्योंकि वह एक बहुत साधारण गाड़ीवान को अपने से महान समझने की गलती कर रहा था. उन्होंने रैक्व के मिलने की सूचना राजा को दी.

राजा रैक्व से मिलने के लिए व्यग्र थे. अतः वे रैक्व को भेंट देने के लिए 600 गाय बहुत से सोने के सिक्के रथ एवं घोड़े लेकर चल पड़े. जानश्रुति को आता देखकर रैक्व को पहले बहुत आश्चर्य हुआ, किंतु शीघ्र ही उनके आगमन का कारण रैक्व की समझ में आ गया. राजा ने उन्हें सादर प्रणाम किया और कहा कि वह भेंट देने के लिए कुछ सामान लाए हैं, जिसे वह ग्रहण करें तथा उनको वास्तविक वास्तविक सुख एवं शांति का मार्ग बताएं. गाड़ीवान रैक्व ऋषि के मन में राजा की भेटों को लेने की कोई इच्छा नहीं थी. उन्होंने राजा से कहा हे जानश्रुति आप इन मूल्यवान वस्तुओं को क्यों नष्ट कर रहे हैं. एक साथ मिलकर सैकड़ों राज्य भी ब्रह्म ज्ञान को नहीं खरीद सकते. आत्मग्यान खरीद बिक्री की वस्तु नहीं है और यह भौतिक सुख के साधन मेरे लिए महत्वहीन है.

रैक्व के कथन से राजा को बहुत दुख हुआ किंतु उसके प्रति आदर की भावना राजा के मन में बहुत बढ़ गई. निराश जानश्रुति अपनी राजधानी में लौट आए किंतु ऋषि का प्रभाव राजा के ऊपर बहुत पड़ा. राजा को यह बात बार-बार सुनने को मिलती थी बहुत से दुखी एवं हताश लोग रैक्व के पास गए और शांति प्राप्त कर वापस लौट आए. इसलिए जानश्रुति बहुत नम्र बनकर रैक्व के पास गए.

इस बार रैक्व ने राजा को आत्मिक ज्ञान के लिए परिपक्व समझा और उसका सहर्ष स्वागत किया. जानश्रुति रैक्व को अपनी रावंती में ले गए और वहां दोनों में आत्मज्ञान के विषय में बहुत चर्चा हुई.

रैक्व ने कहा – ईश्वर बहुत है, जिसकी उपासना लोग उच्चतम देव के रूप में करते हैं. वायु, अग्नि और प्राण की पूजा ईश्वर के रुप में होती है. किंतु आत्मा जो स्वयं अजन्मा है सबको उत्पन्न करती है एवं सबका पालन करती है. उसे किसी भी व्यक्ति वस्तु की आवश्यकता नहीं, वह स्वयं में पूर्ण एवं संतुष्ट है. सब आत्मा है. सभी उसी की इच्छा अनुसार कार्य करते हैं.

हे जानश्रुति, दान देने के कारण कभी भी अभिमान ना करें. अब आप अपने महलों में वापस जाइए. दान करिए किंतु अभिमान रहित होकर. उदारतापूर्वक दे, किंतु दम्भ न करें. स्वतंत्रतापूर्वक दें, किंतु यश प्राप्ति के लिए नहीं. दान करिए, किंतु ऐसे की जो आप दे रहे हैं, वह आपका नहीं, बल्कि दूसरों को देने के लिए आत्मा का दिया हुआ है.

वह, जो इस सत्य को जान लेता है ज्ञानी बन जाता है और उसे किसी भी वस्तु का आभाव नहीं होता और वह सभी वस्तुओं का आनंद लेता है.

राजा जानश्रुति गाड़ीवान रैक्व की ज्ञानपूर्ण एवं विवेकशील बातों से बहुत संतुष्ट होकर वापस अपने राज्य को लौटे. चलते समय राजा ने रैक्व ऋषि को एक हजार गायें, सोने के बहुत से सिक्के एवं रथ दिया. इस बार रैक्व ने राजा का दान स्वीकार कर लिया.
उसी समय से वह गांव गाड़ीवान ऋषि के नाम पर रैक्वपर्ण कहा जाने लगा.

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