कोढ़ियों का भाई


Motivational and inspirational Hindi Story : कोढ़ियों का भाई

Motivational and inspirational Hindi Story : कोढ़ियों का भाई – एक युवा व्यापारी अपनी कपड़ों की दुकान पर बैठा था. इतने में एक धनी ग्राहक आया और वह व्यापारी उससे बातें करने लगा. बड़े सौदे की बातें हो रही थी कि अचानक दुकान के सामने एक भिखारी दीख पड़ा. युवक ग्राहक की बातों में लगा था. अतः भिखारी की ओर ध्यान ना दिया. कुछ देर प्रतीक्षा कर भिखारी आगे बढ़ा.

ग्राहक के चले जाने पर युवक के मन में विचार हुआ की कितना भयानक पाप हो गया. मुझसे एक भिखारी खाली हाथ चला गया. दुकान पर लाखों की संपत्ति थी. सब यूं ही छोड़कर युवा भिखारी की खोज में निकल पड़ा. कुछ दूर चल कर उसे भिखारी मिल गया. युवक ने बड़ी नम्र भाषा में उससे कहा भैया. मुझसे बड़ी भूल हो गई. धन के लालच ही ऐसा है, मैं उस में उलझ कर अंधा हो गया था. आपने मुझे सेवा का अवसर दिया पर मैं चूक गया. कृपया मुझे क्षमा करें. युवक ने पास के सारे रुपए और अपना कोर्ट उस भिखारी को दे दिया.

फ्रांसिस नामक यही युवक 1182 इसवी में इटली के असिसाई नगर में पैदा हुआ था. इसके अपना संपूर्ण जीवन दुखी रोगी व्यक्तियों की सेवा में लगा दिया. लोग इसे कोढ़ियों का भाई नाम से पुकारते थे.

एक दिन घोड़े पर सवार होकर कहीं जा रहे थे. थोड़ी दूर सड़क पर एक कोढ़ी आता दिखाई दिया. उन्होंने उसे तुरंत पहचान लिया क्योंकि उन दिनों कुढ़ीयों के लिए अलग परिधान अनिवार्य था. ताकि स्वस्थ व्यक्ति उन्हें दूर से ही देखकर हट जाए. फ्रांसिस ने कोढ़ी को देखकर घोड़ा मोड़ना चाहा, पर तभी दया पूर्ण कोमल हृदय तड़प उठा. कोढ़ी भी अपना ही भाई है और भाई से घृणा करना अधर्म है. फ्रांसिस ने घोड़ा कोढ़ी की ओर मोड़ दिया. पास जाने का साहस नहीं हो सकता क्योंकि कोढ़ी का चेहरा विकृत था. शरीर से भयानक दुर्गंध आ रही थी.

फ्रांसिस्को उसके सामने खड़े सोचते रहे. फिर मन को समझाया इसे सहायता चाहिए. पास के सारे पैसे उसके पास डाल कर चलने वाले थे. पुनः एक विचार कौंधा. पैसा देकर में औपचारिकता निभा रहा हूं जो उचित नहीं है. इसे पैसे नहीं स्नेह का स्पर्श चाहिए. फ्रांसिस स्वयं को रोक नहीं सके. घोड़े से कुदे और बोले भइया आपने मुझे सेवा का मार्ग दिखा दिया. मैं तो भूल ही गया था. फ्रांसिस का स्पर्श पाते ही कोढ़ी को लगा एक महाशक्ति मिल गई है. फिर तो घंटो बैठे फ्रांसिस उसकी सेवा करते रहे.

कुछ दिन बाद अपनी सारी संपत्ति दीन दुखियों को दान कर भीख मांगकर गुजारा करने लगा. उन दिनों भी भीख मांगना अपमानजनक कार्य समझा जाता था. ऊंचे कुल में पैदा होकर भीख मांगे, लोगों को अच्छा नहीं लगा. वे उन्हें दुत्कारते अपमानित करते थे. जो कुछ भी मिलता उसे भी कोढ़ी के शिविर में दे देते. जीवन के अंतिम दिनों तक ऐसा ही किया. वे सचमुच कोढ़ी के भाई थे.

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