किस कारण भगवान श्री कृष्ण को महाभारत में अस्त्र उठाना पड़ा !


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राजा शांतनु एक दिन जंगल में शिकार पर निकले और वही गंगा नदी के किनारे एक सुन्दर सी स्त्री जिसका नाम था सत्यवती पर मोहित हो गए. भीष्म पितामह ने अपने पिता राजा शांतनु का विवाह मल्हार मुखिया की बेटी सत्यवती के साथ कराया और उसके दो पुत्र हुए चित्रांगद और विचित्रवीर्य. इस शादी के पीछे भी एक रोचक, भीष्म पितामह के पिता के प्रति स्नेह, त्याग और बलिदान की सुन्दर कहानी है. इस को हमने अपने पिछले आर्टिकल में काफी अच्छे से दर्शाया है. निचे दिए गए लिंक पर आप पढ़ सकते है.

क्यों देवव्रत को भीष्म या भीष्म पितामह के नाम से महाभारत में जाना जाता है ?

चित्रांगद और विचित्रवीर्य के बचपन में ही उसके पिता शांतनु की मृत्यु हो गई. अतः उसकी माता सत्यवती राज देखती थी और भीष्म उसकी सहायता करते थे.

चित्रांगद और विचित्रवीर्य की मृत्यु भी जल्दी ही हो गई. चित्रांगद को कोई संतान न थी. विचित्रवीर्य के दो पुत्र हुए – धृतराष्ट्र और पाण्डु. धृतराष्ट्र बड़े और पाण्डु छोटे थे. उस समय विचित्रवीर्य के पुत्र धृतराष्ट्र और पाण्डु छोटे थे. राजकाज भीष्म को ही देखना पड़ता था. धृतराष्ट्र अंधे थे, इस कारण राज्य का संचालन का भार भीष्म के ही कंधों पर था.

पांडु के पांच पुत्र थे जो पांडव कहलाते थे और धृतराष्ट्र के सौ पुत्र थे जो कौरव कहलाते थे. इन राजकुमारों की शिक्षा दिक्षा का प्रबंध भी भीष्म ने हीं किया. उन्होंने धनुर्वेद के महान आचार्य गुरु द्रोण को राजकुमारों को धनुर्वेद की शिक्षा देने के लिए नियुक्त किया. गुरु द्रोणाचार्य ने राजकुमारों को अस्त्र शस्त्र की विद्या में पारंगत कर दिया. भीष्म इन राजकुमारों के पितामह थे, इसी कारण महाभारत में उन्हें भीष्म पितामह कहा गया है.

जब धृतराष्ट्र और पांडू के पुत्र बड़े हुए तब उनमें वैमनस्य हो गया. राज्य के बंटवारे के संबंध में भी उनमें समझौता नहीं हो सका. कौरवों और पांडवों के बीच राज्य के बंटवारे को लेकर भयानक युद्ध हुआ, जो महाभारत कहा जाता है. पांडवों में युधिष्ठिर सबसे बड़े थे और अपनी सत्य निष्ठा के लिए प्रसिद्ध थे. भीम को अपनी गदा पर और अर्जुन को अपने गांडीव धनुष पर गर्व था. कौरव वीरता और पराक्रम में इसकी तुलना नहीं कर पाते थे. कौरवों में सबसे बड़े दुर्योधन थे.

भीष्म ने कौरवों और पांडवों के बीच समझौता कराने का बड़ा प्रयत्न किया पर उन्हें सफलता ना मिली. दोनों पक्षों की सेना युद्ध क्षेत्र में उतर आई. श्रीकृष्ण पांडवों के सहायक थे. उन्होंने कहा था कि मैं अर्जुन का रथ हांकूंगा. हाथ में अस्त्र नहीं ग्रहण करूंगा. भीष्म कौरवों की ओर से युद्ध में सम्मिलित हुए थे. उन्होंने प्रतिज्ञा की थी, मैं युद्ध में कृष्ण को अस्त्र ग्रहण करवाके मानूंगा.

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भीष्म पितामह ने अपनी मृत्यु के पूर्व 10 दिन तक कौरवों के सेनापति का पद को संभाला. उन्होंने ऐसा भयंकर युद्ध किया कि पांडव सेना उनके प्रहारों से घबराकर भागने लगे. भीष्म के बाणो की वर्षा से पांडव की सेना के बड़े-बड़े महारथी युद्धक्षेत्र छोड़ देते थे. एक दिन के युद्ध में तो भीष्म की बाण वर्षा से श्रीकृष्ण भी घबरा गए. उन्होंने अर्जुन से कहा – भीष्म को अपने बाणो से घायल करो, नहीं तो पांडवों की हार होती है.

अर्जुन ने अपनी सारी शक्ति लगा दी पर उनके द्वारा छोड़े गए बाणों को भीष्म बीच में ही काट देते थे. भीष्म के चलाएं बाणों से सारा आकाश भर गया. पांडव सेना हाहाकार करके भागने लगे. श्रीकृष्ण से पांडवों की हार ना देखी गई. वे रथ का पहिया उठाकर भीष्म की ओर दौड़े. यह देखकर भीष्म हंसे और बाण चलाना बंद कर दिया. हाथ जोड़कर उन्होंने श्री कृष्ण से कहा – बस कीजिए भगवन, मेरी प्रतिज्ञा पूरी हो गई.

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