लकड़हारे की भूल


लकड़हारे की भूल
लकड़हारे की भूल

Bodh kahani – Hindi story with moral : एक लकड़हारा था. वह रोज जंगल मैं जाता था. वहां से वह लकड़ियां काट कर लाता था. इन्हीं लकड़ियों को बेच कर वह अपने परिवार को चलाता था.

एक दिन लकड़हारे ने लकडी काटी और इनका बड़ा गठ्ठर बना लिया. अब वह डर से बोला चल भाई घर चले, शाम हो रही है. वह लकड़ी का गट्ठर लकड़हारे के पीछे पीछे चल दिया. दिनभर लकड़ियां काट काट कर वह लकडहारा थक गया था. वह घर से दूर था. उसने सोचा कि पैदल चलने से अच्छा है इस गठ्ठर पर बैठ जाउं. मुझे भी थोड़ा आराम मिल जाएगा.

यह सोच कर लकड़हारा लकड़ी के उस गट्ठर पर बैठ गया. लकड़हारे के बैठते ही वह गठ्ठर रुक गया. अरे चल ना ! देखता नहीं शाम होने वाली है. लकड़हारे ने कहा, किंतु गठ्ठर न हीला. लकड़हारे ने दो तीन बार फिर से चलने के लिए कहा. लेकिन गट्ठर तो हिलने का नाम ही नहीं लेता था.

उसकी यह हठ देखकर लकडहारे को गुस्सा आ गया. उसने अपनी कुल्हाड़ी उठाई और उसी से गट्ठर को पीटने लगा. लकड़हारे का गठ्ठर पीटते पीटते बिखर गया. वह अपनी जगह से ना हिला.

लकड़हारा थक गया तो चुपचाप खड़ा हो गया. कुछ देर बाद उसका क्रोध शांत हुआ. उसने फिर से बिखरी हुई लकड़ियों को समेटा और उनका गट्ठर बनाने लगा. वह बड़बड़ा रहा था, जो लोग सीधी तरह से बात नहीं मानते उन्हें इसी तरह समझाना पड़ता है. अब तक तो हम आधा रास्ता पार कर लेते. चल तैयार हो जा चलने के लिए.

लकड़ी का गट्ठर बनाकर लकडहारा फिर से उस पर बैठ गया. लेकिन गठ्ठर न हिला. अब क्या हो गया. फिर से मार खानी है क्या. चलता क्यों नहीं. लकड़ी का गट्ठर इसी तरह पड़ा रहा.

हारकर वह लकड़हारा उठा और बोला ले अब मैं नहीं बैठूंगा. घर तो चल. पर वह गट्ठर फिर भी नहीं हिला. आज तुझे क्या हो गया. रोज सीधे घर चला जाता था. अब तो सूरज डूब रहा है. जंगल में भयानक जानवर है. तुझे तो डर नहीं लगता पर मुझे तो डर है. अगर शेर या तेंदुआ आ गया तो मैं क्या करूंगा.

जब लकड़ी के गठ्ठर ने उसकी एक ना सुनी तो लकड़हारा की समझ में नहीं आ रहा था वह क्या करें. मारपीट करने से कोई लाभ ना था. लकड़ियां बिखर जाने पर उसे ही दोबारा गट्ठर बनाना पड़ता. अंधेरा छाने लगा था. जंगली जानवरों की आवाज़ें भी दूर से आने लगी थी.

बार-बार लकड़ी के गठ्ठर को मनाने लगा. अपनी गलती के लिए क्षमा मांगने लगा. फिर भी वहीं पड़ा रहा. उसने कहा – हे भगवान ! इस मुसीबत से अच्छा तो यही है कि मौत आ जाए.

उसके सामने एक भारी भरकम मोटा काला आदमी खड़ा हो गया. तुम कौन हो भाई ? वही जिसे तुमने याद किया. उसने सोचा इतनी जल्दी तो मरना भी नहीं चाहता. इससे कैसे जान बचाउ. क्या सोच रहे हो ? तुमने मुझे क्यों बुलाया. क्या काम है ?

घबराहट मैं लकड़हारे को कुछ नहीं सूझ रहा था. उसने कहा यह लकड़ी उठा कर मेरे कंधे पर रख दो. बस ठीक है. अब मैं घर जाता हूं. लकड़हारा चल दिया. तब से आज तक मनुष्य अपना बोझ अपने कंधों पर ही ढो रहा है.

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