लुकमान कहा दुख हंस कर झेल लेना चाहिए !


लुकमान कहा दुख हंस कर झेल लेना चाहिए !
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लुकमान अपने समय का सबसे बड़ा हकीम था : वैध था. परंतु यह जानकर आपको बड़ी ही तकलीफ होगी कि वह अपने बचपन में गुलाम था. लुकमान को अपने मालिक के हांथों, अपनी गुलामी के जमाने में, सौ-सौ तकलीफें झेलनी पड़ती थी. उसके मालिक उसे दुख देकर खुश भी होते थे और उसकी सहने की शक्ति की जांच भी करते थे !

एक बार की एक घटना ने तो लुकमान को गुलामी से आजादी ही नहीं दिलाई, बल्कि अपने मालिक का प्रिय पात्र भी बना दिया.
एक बार उसके स्वामी को : मालिक को ककड़ी खाने की इच्छा हुई. उनके लिए ककड़ी का इंतजाम किया गया. बड़े ही प्रसन्न होकर उनके स्वामी ने ककड़ी को ज्योंही खाना चाहा कि उसके कड़वे स्वाद ने उनके मन को खट्टा कर दिया. ककड़ी स्वाद में जहर सी कड़वी थी. मालिक ने उस ककड़ी के कड़वे स्वाद की जानकारी किसी को नहीं दी और उसे लुकमान की और बढ़ाते हुए कहा : लुकमान, इसे तू खा ले !

लुकमान चतुर ही नहीं, व्यवहारिक भी था. उसने अपने मालिक के मन के भाव को ताड़ लिया और बिना हिला-हवाला (आना-कानी) किए, ककड़ी को खुशी खुशी उसके हाथ से ले लिया. इतना ही नहीं, बिना किसी प्रकार का भाव व्यक्त करते हुए : बिना मुंह बिचकाये, कुछ भी बताएं, पूरी ककड़ी को एक ही सांस में, खा लिया, मानों ककड़ी का स्वाद बड़ा ही मीठा और लुभावना हो !

उसके मालिक ने तो कुछ और ही सोच रक्खा था. उनका विश्वास था कि लुकमान कड़वी ककड़ी को नहीं खाएगा, मुंह बिचकायेगा, नाराज होगा और क्रुद्ध होकर, जरूर फेंक देगा. उसका यह भी विश्वास था कि इतनी और ऐसी कड़वी ककड़ी कोई खा ही नहीं सकता ! पर यह अनुमान एकदम गलत निकला.

जब लुकमान ने कड़वी ककड़ी खा ली तो उसके मालिक ने आश्चर्यचकित होकर पूछा : अरे, लुकमान, गजब हो गया. जहर-सी कड़वी ककड़ी खा कैसे ली ? तूने किस किसी भी प्रकार का विरोध नहीं. क्या तुझे ककड़ी कड़वी नहीं लगी ? यह तो इतनी कड़वी थी कि कोई खा भी कैसे सकता था ? तूने खा लिया : ताज्जुब होता है. गजब कर दिया तूने !

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लुकमान ने बड़े ही विनीत भाव से अपने मालिक को उत्तर दिया : मेरे रहम दिल मालिक ! एक बात मन में उतार लीजिए ! जो खुदा हमें तरह-तरह के सुख देता है, वही खुदा अगर कभी हमें तकलीफ दे दे और झेलना भी पड़े : सहना भी पड़े तो उसे भी सुख की तरह ही खुश होकर झेल लेना चाहिए. हो सकता है, इससे खुदा प्रसन्न हो और इस दुख के बदले बड़ा से बड़ा सुख हासिल करावे. देखिए ना ! आप ही सदा हमें एक से एक जायकेदार और मजेदार चीजें प्रतिदिन हम पर रहम करके : खुश होकर के, देते थे : खिलाते थे. यदि एक दिन आपके हांथों अगर कड़वी ककड़ी मुझे खाने को मिली तो मैं क्यों नहीं उसे भी खुशी खुशी खाऊं ? मुमकिन है कि मेरी इस जांच में आपका कोई मकसद छुपा हो. यह भी मुमकिन है कि मेरी भलाई छिपी हो. मालिक की खुशी हर नौकर का फर्ज है. आप मेरे मालिक हैं और मैं आपका गुलाम हूं न ! आपका हुक्म मानना मेरा फर्ज है ना !
लुकमान के इस जवाब ने उसके मालिक पर गहरा प्रभाव पड़ा. वह लुकमान से इतना प्रभावित हुआ कि उसने उसे सीने से लगा लिया और कहा : लुकमान, आज से तुम मेरे गुलाम नहीं और मैं तुम्हारा मालिक नहीं. पूरे अदब के साथ अब मैं तुझे आज से तेरी गुलामी से आजाद करता हूं. आज से हम दोनों बराबर हैं, एक दूसरे के दोस्त ! लुकमान तूने मेरी आंखें खोल दी ! खुदा से बड़ा कोई नहीं. सुख दुख दोनों खुदा की देन है, दोनों को एक तरह सह लेना चाहिए. संभव है, तकलीफ के रूप में खुदा हमारी जांच कर रहा हो और बदले में बड़ा इनाम दे, किसी रूप में !

इस प्रकार लुकमान आजाद होकर अपनी मेहनत से दुनिया का एक मशहूर हकीम बन गया और आज भी दुनिया में उसका नाम कायम है.

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