क्यों शिशुपाल के गालियां और अपमानित करने पर भी श्रीकृष्ण मुस्कुराते रहते थे ?


क्यों शिशुपाल के गालियां और अपमानित करने पर भी श्रीकृष्ण मुस्कुराते रहते थे ?
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शिशुपाल महाभारत का एक महत्वपूर्ण चरित्र माना जाता है : एक महान पात्र और कृष्ण ? वे तो स्वयं इसके सूत्रधार एवं नायक ही रहे हैं. जो सर्वशक्तिमान हो और वह क्षमाशील हो, किसी के भी बड़े से बड़े अपराध को क्षमा कर दें, छोटी बात नहीं है. पर, क्षमा असमर्थता या कायरता मान ली जाए तो शक्ति को अपनी सामर्थ्य का परिचय देने की बेबसी होती है. जब समर्थ को और असमर्थ समझा जाने लगता हो : आततायी को ठिकाने लगाने के लिए, अपनी शक्ति का परिचय देना पड़ता है, अपराधी को इस बात का एहसास कराते हुए कि अगर तेरे अपराधों को क्षमा करने की हम शक्ति रखते हैं तो हद से गुजर जाने पर क्षमा को कमजोरी मानने पर सामर्थ्य का परिचय भी दे सकते हैं. श्री कृष्ण का शिशुपाल को उसकी मां को दिए वचन स्वरूप सौ अपराधों को क्षमा करना और उसके बाद नहीं संभलने पर हद से बाहर गुजर जाने पर उसका वध, क्षमा के उदाहरण के रूप में, शक्ति के शील यानी क्षमा और सामर्थ्य का अप्रतिम और बेजोड़ उदाहरण है.

शक्ति सह सकती है तो समय पर विशेष परिस्थिति में अपनी सामर्थ्य का परिचय देने के लिए चोट भी कर सकती है.

शिशुपाल कृष्ण को अपना शत्रु समझता था और समय कुछ समय कृष्ण को जहां-तहां गालियां देता और अपमानित करता था, पर श्रीकृष्ण उसे कुछ नहीं कहते थे, क्षमा कर देते थे, क्योंकि उसके सौ अपराध तक क्षमा कर देने के लिए उसकी मां के प्रति वचनबद्ध थे. वे उसके अपराधों पर मात्र मुस्कुरा कर रह जाते थे. इस प्रकार उस का दुस्साहस बढ़ता ही गया. उसके अपराधों में दिनानुदिन वृद्धि होती गई.

परिस्थितियों को बिगड़ते देख, शिशुपाल की हरकतों से क्षुब्द होकर, अवसर पाकर, परंतु ऊबकर महावीर अर्जुन ने आश्चर्य प्रकट करते हुए महान श्री कृष्ण से पूछा – महान प्रवर ! मुझे यह बात समझ में नहीं आती कि आप इतने शक्तिशाली हैं, फिर भी शिशुपाल द्वारा इतने अपमानित होने पर भी उसे कुछ नहीं कहते और केवल मुस्कुरा कर रह जाते हैं जबकि आपको उस दुष्ट को प्रताड़ित ही नहीं करना चाहिए, वरन अपराध के अनुसार दंड भी देना चाहिए ? मुझे तो लगता है, आप यह सब नाटक कर रहे हैं, एक तमाशा भर ! अपनी शक्ति और सामर्थ्य को इतना अपमानित नहीं करना चाहिए. शिशुपाल को दंडित ना करके आप उसे बढ़ावा दे रहे हैं. इससे समाज का बड़ा सहित होगा और आपकी प्रतिष्ठा को आंच जाएगी. यह सच है, कि मैं बल में शिशुपाल से कहीं आगे हूं. जब भी चाहूँ उसे दंडित कर सकता हूं. पर ऐसा करने में मेरा क्या गौरव है ? शक्ति की प्रतिष्ठा प्रतिष्ठा अपराधी को दंड देने में नहीं, वरन दंडित करने में है, जो किसी भी शक्तिशाली के शील और संस्कार का सौंदर्य है. क्षमा भी अपने में एक बल है, शक्ति है, जिसका प्रदर्शन असमर्थ नहीं, कायर नहीं, समर्थ और शक्तिशाली ही कर सकता है. तुम्हारे कहे अनुसार अपराधी को दंड देना चाहिए, दुष्ट को मारा जाए, एक गाल में मारे तो मारने वालों के दूसरे गाल में मारा जाए. एक गाली दे तो, बदले में दस गलियां सुनाई जाए. जो तलवार उठाये उसकी गर्दन ले ली जाए, यही ना ! पर नहीं, अर्जुन ! हम अपनी शक्ति की जांच कर रहे हैं. अर्जुन ने कहा – पर नीति तो कहती है, दुष्ट के साथ दुष्टता से पेश आना चाहिए. बलवान होने पर भी कमजोर द्वारा सताए जाने पर चुप रहना, मैं नीति और धर्म दोनों के विपरीत समझता हूं.

कृष्ण ने उत्तर दिया, बड़े ही शालीन भाव से – क्षमा बल का चमत्कार है, अर्जुन ! सहनशक्ति शक्ति की समर्थता है. बल की बड़ाई दंड देने में ही नहीं, बल्कि अपराधी को क्षमा करने में है. क्षमा करने पर अपराधी शर्मिंदा होता है और अपने को सुधारने की चेष्टा कर सुधरता भी है. अपराधी क्षमा पाकर संभलने की चेष्टा करता है. बल तो दंड कभी भी दे सकता है, पर क्षमा तो बल्कि की शक्ति है, जिसका उपयोग विवेकशील पुरुष और शक्तिशाली ही कर सकता है. दंडित करने से दुर्भावना का क्षेत्र बढ़ता है, अशांति बढ़ती है, संघर्ष बढ़ता है. क्रोध के दायरे को बढ़ावा देना, कहां की बहादुरी है ? जहां तक शिशुपाल का सवाल है, उसे तो मैं कभी भी दंडित कर सकता हूं, पर उसे क्षमा करके अपने बल की जांच कर रहा हूं, अपनी सहनशक्ति की जांच कर रहा हूं की मैं कितना सह सकता हूं. उसका अपराध मुझे क्रुद्ध करता है कि शांत रखता है या मेरी शक्ति मौन रहती है या उबाल खाती है, बेचैन होने पर. अगर गाली से क्षुब्द हो जाऊंगा तो शिशुपाल की जीत हो जाएगी और मेरी हार. शारीरिक शक्ति की अपेक्षा आत्मिक शक्ति महान होती है. मैं तब अपने को बलवान नहीं समझूंगा, सहन क्षमता या शक्ति की दृष्टि से. यह एक बात हुई. दूसरी बात यह है कि मैंने उसकी मां को वचन दिया है कि मैं शिशुपाल के 100 अपराध क्षमा कर दूंगा, पर उसके बाद नहीं, उसके आगे नहीं. मैं इस प्रकार उसके सौ अपराध क्षमा करके, जहां अपने बल की क्षमा शक्ति की जांच करूंगा, वहां दूसरी और अपने वचन को निभाऊंगा और आवश्यकता पड़ी तो अपनी शक्ति और सामर्थ्य का प्रदर्शन भी करूंगा, वह भी देख लेना ! अर्जुन ! सच जानों, सच मानो, उसके अपराधों की संख्या 100 के पार नहीं गई है, बस सौ के आस पास पहुंची भर है. पर सच तो यह है कि मैं जानता हूं शिशुपाल शैतान है : आततायी है, फिर भी सौ बार क्षमा करके मैं उसे दंडित होने से बचने का अवसर देना चाहता हूं – संभलने के लिए भी और सुधारने के लिए भी. कृष्ण भगवान की इस तर्कसंगत वचन को सुनकर आश्वस्त हूँ और धैर्य के साथ कृष्ण भगवान के दोनों उदाहरणों क्षमा और दंड को देखने की तीव्रता से प्रतीक्षा करने लगा.

और सच ही श्री कृष्ण भगवान ने शिशुपाल को दंडित किया. शिशुपाल एक से एक बढ़कर अपराध करता गया और ज्यों ही सौ अपराध पूरे कर लिए कि भगवान श्रीकृष्ण को अपने वचन और अर्जुन को दिए गए आश्वासन की याद आ गई. संजोग भी कुछ ऐसा ही हो आया. युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ के पावन अवसर पर शिशुपाल ने केशव को : भगवान श्रीकृष्ण को, तरह तरह से अपमानित करना शुरु किया और यज्ञ में बाधा डालते हुए घोषणा की कि देखे यह यज्ञ सफल कैसे होता है ? इतना ही नहीं, भगवान श्रीकृष्ण को ललकारते हुए कहा – बड़े बहादुर बनते हो. शक्ति हो तो युधिष्ठिर की रक्षा कर के बतलाओ. यज्ञ को सफल कर के दिखलाओ. अगर शक्ति हो तो आओ, आज हम लोग निपट ले. क्यों कायर की तरह दुम दबाकर कोने में दुबके पड़े हो. तुम क्या हो कृष्ण ! मुझे मालूम है और यह यज्ञ ? देखता हूं, सफल कैसे होता हो.

इस ललकार ने भगवान कृष्ण को अपार आहत और अपमानित किया. उनकी भुजाएं फड़क उठी. उन्होंने आव देखा ना ताव, ना दाएं देखा ना बाएं और चक्र उठा लिया और कहा – लो, शिशुपाल शक्ति और सामर्थ्य हो तो अपने को बचाओ. पुनश्च कह कर बचने का एक और मौका देता हूं. जो भी तेरे संगी साथी और समर्थक है, सब की मदद ले लो. तेरी मृत्यु निकट है. एक बार प्रभु को याद कर लो.

सभी लोग देखते ही रह गए, भोचक्का. चक्र सुदर्शन तेजी से घूम गया : चल गया और शिशुपाल का सर धड़ से अलग हो गया.
यह है क्षमा और शक्ति की सामर्थ्य के चमत्कार का बेमिशाल उदाहरण!

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