महाकवि तुलसीदास – भारत के महापुरुष


महाकवि तुलसीदास - भारत के महापुरुष
महाकवि तुलसीदास - भारत के महापुरुष

हिंदी भाषा के अभूतपूर्व महाकवि तुलसीदास का जन्म सन 1559 के लगभग, बांदा जिले के राजापुर गांव में हुआ था. वह पाराशर गोत्र के सरयूपारी ब्राह्मण थे. उनके पिता का नाम आत्माराम और माता का नाम हुलसी था. तुलसीदास का पहला नाम रामबोला कहा जाता है. इनके बारे में प्रसिद्ध जनश्रुति है कि माता-पिता ने इन्हें जन्मते ही त्याग दिया. मुनिया नाम की एक दासी ने इन्हें पाला-पोसा और इनका नाम रामबोला रखा. मुनिया भी, जब यह छोटे ही थे मर गई और तब यह श्री नरहरि दास जी के पास रहने लगे.

श्री नरहरि दास जी ने इन्हें अच्छी शिक्षा दीक्षा दी और इनका नाम तुलसीदास रखा. नरहरिदास से ही इन्होंने संस्कृत पढ़ी और बाद में वेद, पुराण, दर्शन आदि का विधिपूर्वक अध्ययन किया.

इसके उपरांत, ये अपने घर राजापुर गए और वहीं इनका विवाह दीनबंधु पाठक की रूपवती कन्या रत्नावली से हुआ. यह सन 1583 की बात बताई जाती है.

किवदंती है कि तुलसीदास को अपनी स्त्री से बहुत प्रेम था और रात दिन उसी में भूले रहते थे. कहते हैं कि एक बार जब वह अपने पितृ-गृह को गई तो तुलसीदास जी उनके पीछे अपनी ससुराल जा पहुंचे. रत्नावली को बहुत ग्लानि और लज्जा हुई. उसने इनको ताना दिया –

लाज न लागत आपु को, दौरे आयहु साथ |
धिक-धिक ऐसे प्रेम को, कहा कहौं मैं नाथ ||
अस्थि-चरमयम देह मम, तामे ऐसी प्रीति |
तैसी जो श्रीराम महँ, होती न तो भव-भीति ||

यह बात तुलसीदास जी को ऐसी लगी कि वे विरक्त हो गए. रत्नावली के ताने का उन पर ऐसा प्रभाव पड़ा कि घर बार छोड़कर वे तुरंत काशी चले गए. यहीं उन्होंने नानापुराण निगमागम आदि का अध्ययन किया और उनके जीवन का प्रवाह ही बदल गया.
वही प्रेम जो पहले पत्नी की ओर था अब सभी ओर से हटकर श्रीराम में जुड़ गया और जीवन के अंतिम क्षण तक बड़ी मजबूती से जुड़ा रहा. एक ऐसी छोटी सी घटना ने, वास्तव में, तुलसी को तुलसी बना दिया.

घर छोड़ने पर तुलसीदास जी कई तीर्थों में भ्रमण करते रहे. इन्होंने मथुरा, वृंदावन, अयोध्या, चित्रकूट, प्रयाग, जगन्नाथ, कुरुक्षेत्र आदि कई जगहों का भ्रमण किया और अंत में काशी में रहने लगे. यहीं उन्होंने सन 1631 में अपने विश्व महाकाव्य श्रीरामचरितमानस की रचना प्रारंभ की और उसके कुछ अंश बाद में अयोध्या में लिखे. सुनते हैं कि तुलसीदास के हाथ की लिखी हुई रामायण का कुछ अंश अब तक सुरक्षित है.

काशी में तुलसीदास के रहने के कई स्थान प्रसिद्ध है. पहले शायद यह राज घाट पर रहते थे. वहां गंगाराम ज्योतिषी से इनकी काफी घनिष्ठता थी. इसके बाद संभवता ये अस्सी घाट पर रहने लगे, जहां इनकी मित्रता टोडरमल से थी. टोडरमल से इनका इतना प्रेम था कि उनकी मृत्यु पर इनका ह्रदय रो उठा –

महतो चारों गांव को, मन को बड़ा महिप |
तुलसी या कलिकाल में, आये टोडर दीप ||
तुलसी राम स्नेह को, सिर धरी मोरी भार |
टोडर कांधा ना दियो, सब कह रहे उतार ||

रहीम, मानसिंह और मीराबाई से भी तुलसी का परिचय था और कहा जाता है कि सूरदास और नाभा दास जी से भी इनकी भेंट हुई थी. इन सब बातों से ऐसा लगता है कि अपने जीवन काल में ही तुलसीदास महान व्यक्ति और शक्तिमान कवि के रूप में प्रसिद्ध हो चुके थे. अन्य साधु महात्माओं की तरह तुलसीदास जी के विषय में भी उनके माहात्म्य की अनेक कथाएं समाज में प्रचलित है. सुनते हैं कि हनुमान जी की कृपा से इन्हें श्री रामचंद्र जी के दर्शन भी हुए थे. सन 1680 की श्रावण कृष्ण तृतीया को तुलसीदास का देहावसान हुआ. उनकी मृत्यु के संबंध में यह दोहा प्रसिद्ध है –

संवत सोलह सौ असी, असी गंग के तीर |
श्रावण श्यामा तीज शनि, तुलसी तज्यो शरीर ||

तुलसीदास अपने समय के महान पुरुष थे. साधारण परिवार में जन्म ग्रहण कर इन्होंने अपनी अलौकिक प्रतिभा से विश्व को वह महाकाव्य प्रदान किया जिसकी महिमा आज भी अजय है.

सत्यम, शिवम और सुंदरम का समन्वय कर इन्होंने हिंदू जाति और हिंदू संस्कृति की रक्षा की विराट चेष्टा की. यही कारण है कि ग्रियर्सन साहब ने उन्हें ठीक ही बुद्ध देव के बाद भारत का सबसे बड़ा लोकनायक बताया है.

तुलसीदास जी रामानंद के शिष्य और राम के भक्त थे, पर इन की भक्ति भावना बहुत ही उदार थी. इन्होने निर्गुण सगुण में मूलतः भेद नहीं माना है. शगुन केवल इसलिए अच्छा है, क्योंकि इससे उपासना सहज हो सकती है. यों शिव, कृष्ण आदि अन्य देवताओं और राम में कोई अंतर नहीं है. तुलसीदास वास्तव में बहुत बड़े समन्वयकारी थे और यही उनकी बहुत बड़ी विशेषता थी.

तुलसीदास जी ने कई ग्रंथ लिखे. उनकी कुछ अत्यंत प्रसिद्ध पुस्तकें यह है – रामचरितमानस, विनय पत्रिका, दोहावली, कवितावली, बरवे रामायण, गीतावली, जानकी मंगल, पार्वती मंगल, वैराग्य संदीपनी आदि.

तुलसीदास जी हिंदी के तो बहुत बड़े कवि हैं ही विश्व कवियों के बीच भी इनका स्थान विशेष महत्वपूर्ण है. क्या भाषा, क्या भाव, क्या शैली – सभी दृष्टियों से ये हिंदी के मूर्धन्य कलाकार है और ऐसी असाधारण प्रतिभा लेकर दुनिया में बहुत ही कम ही कवि पैदा हुए. उनका रामचरितमानस तो वास्तव में विश्व महाकाव्यों के बीच अन्यतम स्थान का अधिकारी सिद्ध है. भक्ति, कविता और मानवता का ऐसा संगम अन्यत्र नहीं दिखाई देता. हिंदुस्तान की सभी पुस्तकों में यह सबसे ज्यादा लोकप्रिय है और महलों से लेकर झोपड़ियों तक इनकी इसकी समान प्रतिष्ठा है. प्रसिद्ध विद्वान ग्रियर्सन के शब्दों में ठीक ही, इंग्लैंड में बाइबिल भी उतनी लोकप्रिय नहीं, रामायण भारतवर्ष में वर्ष में जितनी लोकप्रिय है और इसमें पूरी भारतीय संस्कृति स्पस्टतः मुखर हो होती है. यही कारण है कि संसार की प्रायः सभी भाषाओं में रामचरितमानस का अनुवाद हो चुका है और विश्व साहित्य का यह एक अनमोल रत्न है. आदर्श महाकाव्य की कसौटी पर भी रामचरितमानस पूरा-पूरा खरा उतरता है. इसके सभी चरित्र आदर्श है और पूरी गाथा महान सामाजिक आदर्श की स्थापना करती है. ऐसे महाकाव्य संसार में वास्तव में बेजोड़ है.

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