महात्मा गौतम बुद्ध की जीवनी – भारत के महापुरुष


महात्मा गौतम बुद्ध की जीवनी - भारत के महापुरुष
महात्मा गौतम बुद्ध की जीवनी - भारत के महापुरुष

गौतम बुद्ध का जन्म कपिलवस्तु नामक नगर में 563 ईसवी पूर्व में हुआ था. इनके पिता शुद्धोधन कपिलवस्तु के राजा थे. वे शाक्य जाति के थे. उनकी माता पड़ोस के कौशल गणराज्य की राजकुमारी थी. इस प्रकार, महावीर जैन के सामान गौतम भी बड़े ही ऊंचे घराने में पैदा हुए थे. गौतम के और भी कई नाम थे –

सिद्धार्थ, सुगत, तथागत और अमिताभ. सिद्धि प्राप्त करने के बाद वे बुद्ध कहलाए.

Mahatma Gautam Buddha ki jivni – Bharat ke Mahapurush

सिद्धार्थ की माता बचपन में ही मर गई और उनकी मौसी ने उन्हें पाला-पोसा. बाल्यकाल से ही उनमें वीतराग के लक्षण प्रकट होने लगे और अक्सर वे महल के एकांत में घ्यानमग्न रहा करते. एक ज्योतिषी ने राजा शुद्धोदन को यह कह दिया था की गौतम सन्यासी हो जाएंगे. राजा शुद्धोदन गौतम को राजकाज में कुशल, साहसी, वीर और संसारी बनाना चाहते थे. इसलिए उन्होंने गौतम को शास्त्र की अपेक्षा शस्त्र की शिक्षा देनी शुरू कि और ऐसा प्रबंध किया की जो कुछ सुंदर और शोभन हो उसी पर उनकी दृष्टि पड़े.

उन्हें संसारी बनाने के लिए पिता ने कम उम्र में एक बहुत ही सुंदर स्त्री यशोधरा से उनका व्यवहार भी कर दिया. लेकिन भगवान तो इसके लिए अवतीर्ण नहीं हुए थे. संयोगवश उनकी दृष्टि रोगी, वृद्ध और मृतक पर पड़ी और उनके मन में बहुत वैराग्य हो गया. संसार के दुख दर्दों को देख कर वे विरक्त हो उठे और उनका निदान खोजने के लिए एक रात वे चुपचाप महल से निकल पड़े.
अब तक उन्हें एक पुत्र हो गया था जिसका नाम था राहुल. अभी उस नवजात शिशु के जन्मोत्सव के उपलक्ष में राग रंग चल ही रहा था कि गौतम एक रात सभी को सोता छोड़कर ज्ञान की खोज में निकल चले. घूमते घामते वे वैशाली पहुंचे और एक ब्राह्मण के शिष्य हुए. पर उनके उपदेश से उन्हें संतोष ना हुआ और राजगृह आये. राजगृह के राजा बिंदुसार ने उन्हें अपना राज्य देकर भी रोकना चाहा, पर वे तो स्वयं राजपाट छोड़कर आए थे. अंत में वे घूमते हुए गया जी पहुंचे और वही एक पीपल के वृक्ष के नीचे उन्हें बुद्धि अर्थात ज्ञान की प्राप्ति हुई. तब से वे बुद्ध कहे जाने लगे. इस समय उसकी अवस्था 35 वर्ष की हो चुकी थी.

अब बुधदेव धूम-घूमकर अपनी बातों का प्रचार करने लगे. पूरी दुनिया में जिसकी धूम हुई, बनारस के निकट सारनाथ से ही उस धर्म का प्रचार प्रारंभ हुआ. बुद्ध ने अपनी बातों को महलों से लेकर झोपड़ियों तक फैलाने की कोशिश की. 40 वर्षों तक धर्म प्रचार करने के बाद कुशीनगर में 488 ईस्वी पूर्व उनका देहावसान हुआ.

गौतम बुद्ध के उपदेश बड़े ही सीधे सादे थे. उन्होंने बताया कि संसार में दुख है, दुख का कारण है और दुख से छुटकारा पाया जा सकता है. उनका मत था कि दुख से छुटकारा पाने पर निर्वाण मिल जाएगा अर्थात जन्म मरण के बंधन टूट जायेंगे. इसलिए दुख से छुटकारा पाने के लिए उन्होंने अष्टांगिक मार्ग पर चलने की सलाह दी.

  • सम्यक दृष्टि
  • सम्यक संकल्प
  • सम्यक वाक्य
  • सम्यक कर्मान्त
  • सम्यक आजीव
  • सम्यक व्यायाम
  • सम्यक स्मृति तथा
  • सम्यक समाधि

गौतम ने बताया की अति सर्वथा त्याग्य है. मनुष्य को मध्यम मार्ग पर चलना चाहिए.

बुद्ध ने जाति पाति के बंधनों को नहीं माना. उन्होंने बलि प्रथा का विरोध किया और धर्म में आडंबर की जगह सादगी को स्थान दिया.

इनकी प्रधान शिक्षाएं थी – किसी प्राणी की हिंसा मत करो, सभी जीवो से प्रेम करो, सदा सत्य बोलो ,सभी मनुष्य बराबर है, आदि. बुद्ध ने जन-भाषा पाली में अपने धर्म का प्रचार किया. सीधे-सादे उपदेश और जनभाषा पाली के कारण बुद्ध का धर्म बहुत जल्द फैल गया. इसके अलावा गौतम का व्यक्तित्व भी बहुत महान था.

बुद्ध जाति पाति को नहीं मानते थे. सभी को बराबर प्रेम भाव से देखते थे. वे कभी क्रुद्ध नहीं होते थे और बड़े ही दयालु स्वभाव के व्यक्ति थे. उनके धर्म का द्वार राजा महाराजा से लेकर दीन-दरिद्रों तक सभी के लिए खुला हुआ था. फलस्वरुप, अल्प समय में ही इनके धर्म के अनुयायियों की संख्या काफी हो गई. इतना ही नहीं, विदेशों में भी इनके धर्म का खूब प्रचार हुआ. आज भी वर्मा, लंका, तिब्बत, चीन और जापान आदि अनेक देशों के काफी लोग बुद्ध धर्म के अनुयाई है.

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