मेधावी की कथा – नीति कथा


मेधावी की कथा - नीति कथा
मेधावी की कथा - नीति कथा

Hindi story with moral : बहुत पहले की बात है. गौड़ प्रदेश में एक प्रसिद्ध कवि था. उसका नाम श्रीहर्ष था.

उसने एक महाकाव्य की रचना की. महाकाव्य का नाम था नलचरित.

महा काव्य रचना के बाद वह विद्वानों की राय जानना चाहता था. इसके लिए वह बनारस गया. वहां कोक नामक एक पंडित रहता था. श्रीहर्ष अपना पूरा काव्य पढ़कर कोक को सुनाना चाहता था.

कोक भोग विलास से अलग हो चुका था. वह भागवत भजन में हमेशा लगा रहता था. अतः उस के पास इतना समय नहीं था कि वह श्रीहर्ष के काव्य को सुनें.

श्रीहर्ष निराश नहीं हुए. दोपहर के समय कोक काशी की मणिकर्णिका घाट पर स्नान करने जाता था. रास्ते में ही श्रीहर्ष अपना महाकाव्य सुनाया करता था. कोक महाकाव्य सुनता रहा, किंतु उसके संबंध में अपना कोई सुझाव नहीं दिया.

इसी तरह बहुत दिन बीत गए. कोक बिल्कुल चुप था.

उसकी चुप्पी देख कर एक दिन श्रीहर्ष ने स्वयं कहा, महात्मा मैंने कठिन परिश्रम कर के महाकाव्य लिखा है. आप विद्वान भी हैं और महाकवि भी.

मैं यही सोचकर आपके पास आया था कि आप मेरे महाकाव्य के विषय में कुछ कहेंगे. इसी कारण मैं रोज रोज अपने काव्य को आपको सुनाता हूं. अभी तक आपने इसके बारे में अच्छा या बुरा कुछ भी ना कहा.

कोक ने कहा, तुम ऐसा मत समझो श्रीहर्ष. मैं तुम्हारे काव्य को बड़े गौर से सुनता हूं. अब तक मैंने इसलिए कुछ नहीं कहा, क्योंकि मैं पूरा काव्य को सुनना चाहता हूं. मैं पूरा काव्य सुनकर ही कुछ कहना चाहता था.

श्रीहर्ष ने कहा, महाराज अब तो आप पूरा महाकाव्य सुन चुके हैं.

कोक ने कहा सुन चुका हूं और उस पर विचार भी कर चुका हूं. लो, अगर सुनना ही चाहते हो तो सुन लो.

कोक ने श्रीहर्ष के मुख से सुनी सब बातें श्रीहर्ष को सुना दी.

श्रीहर्ष को बड़ा हर्ष हुआ. उसे विश्वास नहीं था कि कोक को उसकी बातें याद होंगी.

कोक महान विद्वान था. श्रीहर्ष को यह तब मालूम हुई, जब उसने कोक की स्मरण शक्ति को परखा. श्रीहर्ष कोक की प्रशंसा करते अघाता नहीं था.

कोक विद्वान के साथ ही बुद्धिमान भी था. उसने श्रीहर्ष के काव्य की केवल प्रशंसा ही नहीं की बल्कि उसके दोषों की और भी उसका ध्यान खींचा.

श्रीहर्ष कोक की बातों से बड़ा प्रसन्न हुआ. वह खुशी खुशी अपने घर वापिस आ गया. वह समझ गया कि एक बार सुनने पर जो याद कर लेता है. ऐसे बुद्धिमान को मेधावी कहा जाता है.

यह ठीक ही कहा गया है कि बुद्धिमान सभी अवगुणो का त्याग करते हैं. गुणों को ही ग्रहण करते हैं.

उसी प्रकार भ्रमर फूलों के कांटो को ग्रहण नहीं करता. वह तो मात्र सुगंध लेता है.

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