परिवर्तन


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पैठण में एक महात्मा रहते थे. उनके आश्रम से कुछ दूर गोदावरी नदी बहती थी. महात्मा प्रतिदिन आश्रम से गोदावरी स्नान के लिए जाते थे. उनके आश्रम और गोदावरी तट के बीच कई यवनों के घर थे. वहां एक यवन युवक बहुत दुष्ट स्वभाव का था. वह आते-जाते महात्मा पर थूक देता था. खासकर जब भी महात्मा स्नान कर लौटते तो वह ज़रूरत थूकता. इस प्रकार स्वामी जी को कई बार स्नान करना पड़ता. स्वामी जी क्षमा और प्रेम की मूर्ति थे. वह कभी किसी पर गुस्सा नहीं करते. अतः उस दुष्ट के थूकने पर भी मुस्कुरा कर चले जाते.

एक दिन वह स्नान कर लौटे तो उन्होंने देखा कि वह दुष्ट वहां पर उपस्थित नहीं था. स्वामी जी उसकी प्रतिक्षा में वहां खड़े हो गए. क्योंकि उन्हें पता था कि अगर आज वे निकल गए तो वह यावन आएगा और निराश होगा. काफी देर तक वो वृक्ष के नीचे खड़े रहे.

जैसे ही वह दुष्ट आया उसने मुस्कुराते हुए महात्मा जी पर थूक दिया. सन्यासी चुपचाप पुनः गोदावरी स्नान के लिए चल पड़े. जब वो वापस आए तो भी वह धूर्त वहीं खड़ा था. उसने पुनः थूक की पिचकारी महात्मा पर छोड़ दी. साधु फिर गोदावरी स्नान को चले गए. अब वह धूर्त वृक्ष पर चढ़ गया और जब भी महात्मा स्नान कर लौटते उन पर थूक देता.

यूं तो उसके कई साथी भी थे जो अन्य हिंदू स्नानार्थियों पर कीचड़ या हड्डी इत्यादि अपवित्र वस्तु फेंक कर उन्हें अपवित्र कर देते थे. इससे कभी-कभी कई सज्जन चढ़ जाते. उनका चिढ़ना स्वाभाविक भी था. पर वे दुष्ट युवक अपने स्वभाव से लाचार थे.

किंतु यह दोष्ट युवक तो जैसे महात्मा के लिए हीं प्रतीक्षा करता रहता था. उस दुष्ट युवक और महात्मा में आज शक्ति परीक्षण हो रहा था. दुष्ट की दुष्टता और महात्मा की सहनशीलता देखने के लिए बहुत से नर-नारी वहां एकत्र हो गए. ज्यों-ज्यों वह थूकता, साधू और अधिक प्रसन्न मन से गोदावरी स्नान को चल पड़ते. वे आज अपना सौभाग्य मान रहे थे कि परमात्मा की असीम कृपा से हीं उन्हें यह फल मिल रहा है.

108 बार उस धूर्त ने महात्मा को तंग किया और साधु 108 बार स्नान करने गए. कुछ देर बाद इस क्षमा ने अपना असर दिखाया. साधु की सहनशीलता ने यवन को पश्चाताप की अग्नि में जला डाला. वह स्वामीजी से क्षमा याचना करने लगा.

साधू बोले – “भइया तू अपने स्वभाव के कारण दुष्टता कर रहा था पर मुझे बराबर गोदावरी स्नान का पुण्य प्राप्त हो रहा था.”

यवन स्वामी जी के चरणों में गिर कर रोने लगा. महात्मा ने उसे उठाकर उपदेश दिया.

और सोचो तो सही ऐसा क्षमावान साधु कौन हो सकता है?

ये एकनाथ जी थे.

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