कैसे पुरु (पोरस) ने सिकंदर महान को भारत में घुसने न दिया !


कैसे पुरु (पोरस) ने सिकंदर महान को भारत में घुसने न दिया !
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झेलम नदी के किनारे, ईसा से पूर्व, एक महान राजा राज्य करता था. जिसका नाम था पुरु. पुरु इतिहास में और जन जन में महान पोरस के नाम से भी प्रसिद्ध है. उसकी वीरता की सैकड़ों कहानियां और किवदंतियां इतिहास और जनता में प्रचलित है.

इतिहास प्रसिद्ध पराक्रमी राजा सिकंदर महान विश्व विजय की आकांक्षा से अनेक देशों को रौंदता जीतता, सोने की चिड़िया भारत को अपने अधीन करने की लालसा से अपार और विशाल सेना लेकर भारत पर टूट पड़ा और भारत के मुख्य द्वार पंजाब तक पहुंचकर झेलम नदी के उस पार डेरा डाल दिया.

वैसे तो अनेक देशों और प्रांतों में महावीर सिकंदर के आगे, बिना लड़े ही, उसकी विशाल सेना को देखते हुए आतंकित और भयभीत होकर, हथियार डाल दिए और अधीनता स्वीकार कर ली. पर महान योद्धा और पराक्रमी पुरु ने निर्भीक भाव से पूरी शक्ति और साहस के साथ महान योद्धा सिकंदर का सामना करने का फैसला किया और सहज ही आसानी से बिना लड़े पराजय स्वीकार करने से अधीनता स्वीकार करने से इनकार कर दिया.

दोनों महान योद्धाओं की आपस में वीरता से भयंकर टक्कर हो गई. यूनानी सिकंदर की, युद्ध पद्धति, रणकौशल और नए-नए युद्ध के आयुधों अस्त्र-शस्त्रों के साथ विशाल सेना के आगे पुरु की सेना टिक ना सकी. सेना में, हाथियों चीख चित्कार से भगदड़ मच गई. पुरु की सेना के पांव उखड़ गए : फिर भी वह लड़ता रहा : युद्ध को जारी रखा और हार नहीं मानी. लड़ते-लड़ते स्वंय भी लहुलुहान और घायल हो गया. राजा पुरु के पराक्रम, शौर्य, साहस-वीरता के साथ दृढ़ निश्चय से प्रभावित और अभिभूत हो कर स्वंय महान सिकंदर ने ही अपनी प्रतिनिधि मौरस के हाथों युद्ध विराम एवं शांति का प्रस्ताव भेजा.

पुरु ने पूर्ण सम्मान के साथ शांति प्रस्ताव मान लिया और हाथी से उतरकर सीना तानकर पूर्ण गौरव और गरिमा के साथ आगे बढ़ा.

सिकंदर ने भी पुरु को पूर्ण वीरोचित सम्मान दिया और स्वयं भी पुरु से मिलने को आगे बढ़ा.

पुरु से मिलते ही सिकंदर ने सम्मान के साथ पूछा महावीर महाराज पुरु आपके साथ कैसा व्यवहार किया जाए?

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इस सवाल से महापुरुष महाराज पुरु थोड़ा भी आतंकित, हताश, उदास, आशंकित और निराश ना होकर बड़ी दृढ़ता, विश्वास और निर्भरता के साथ उत्तर दिया – जैसा एक राजा दूसरे राजा के साथ करता है. इस विस्मयकारी उत्तर ने सिकंदर महान को आश्चर्यचकित एवं हतप्रभ कर दिया. उन्होंने तो कुछ और ही सोचा था. उन्होंने सोचा था कि शायद पुरु घबराकर अधीनता स्वीकार ले, पर बात कुछ और ही हुई. पुरु ने समानता के स्तर पर व्यवहार करने का आशातीति उत्तर देकर, सिकंदर को महान आश्चर्य में डाल दिया.

इस उत्तर से सिकंदर महाराजा पुरु की निर्भीकता, साहस और आत्मगौरव से, इतना प्रभावित हुआ की उससे संधि कर ली, जीते हुए सारे राज्य ही नहीं लौटा दिए वरन अपनी और से अन्य जीते हुए राज्य भी इन्हे सौंपकर मैत्री कर ली और साथ ही साथ पारिवारिक संबंध जोड़ लिए.

कुछ दिन विश्राम करके, सिकंदर महान भारतवर्ष से ससम्मान वापस हो गया.

दो महान देशों के दो महानों कि यह महानता और मैत्री विश्व के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है और जब तक धरती रहेगी दोनों की यह महान गाथा अजर अमर रहेगी.

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