राजाराम मोहन राय – भारत के महापुरुष


राजाराम मोहन राय - भारत के महापुरुष
राजाराम मोहन राय - भारत के महापुरुष

राजाराम मोहन राय का जन्म बंगाल के हुगली जिले के राधानगर में हुआ था. उनकी जन्म तिथि 1774 इसवी है. इनके पिता मुर्शिदाबाद के नवाब के यहां नौकर थे.

उन दिनों के रिवाज और प्रचलन के अनुसार उन्होंने अपने लड़के राजा राम मोहन राय को फारसी और अरबी की शिक्षाएं दी. पटना के अच्छे मदरसे में इन्होंने 3 साल तक पढ़ाई की. इसके बाद इन्हें संस्कृत पढ़ने का शौक हुआ और ये बनारस गए. बनारस शुरू से ही संस्कृत का प्रधान केंद्र रहा है. बनारस के पंडितों से शिक्षा पाकर ये संस्कृत के भी अच्छे विद्वान बन गए.

बनारस से घर लौटने पर पिता से इनका झगड़ा हो गया. पिता मूर्तिपूजक थे और देवी देवताओं में एक गहरा विश्वास रखते थे. घर में पुराने-पुराने अंधविश्वासों का प्रचलन था. राम मोहन को ये बातें पसंद नहीं थी. उन्होंने बंगला भाषा में मूर्ति पूजा के खिलाफ एक पर्चा छपवाया. इस पर इनके पिता बहुत नाराज हुए. पिता पुत्र के विचार बिलकुल भिन्न थे. फलतः राम मोहन ने घर छोड़ दिया और इधर उधर घूमने लगे.

देश के कई स्थानों का भ्रमण करते हुए तिब्बत पहुंचे और कुछ दिनों तक वहां रह कर उन्होंने वहां के धर्म और साहित्य का गंभीर अध्ययन किया. इस बीच इनके पिता का देहांत हो गया और ये घर लौट आए.

घर वापस आने पर राम मोहन ने हिंदू और मुसलमान धर्मों के मूल सिद्धांतों का गंभीर अध्ययन आरंभ किया. हिंदुओं और मुसलमानों के धार्मिक ग्रंथों का सच्चा ज्ञान वह प्राप्त करना चाहते थे. वे इसाई धर्म को भी मूल रूप से में जानना चाहते थे और इसलिए उन्होंने ग्रीक और हिब्रू भाषाएं भी सीखनी शुरू की. शीघ्र ही वे सफल हो गए और मूल रूप में बाइबल पढ़ने और समझने लगे.

इस प्रकार, विभिन्न धर्मों के मूल ग्रंथों के अध्ययन से उनके मन में दृढ़ विश्वास हो गया कि वास्तव में सभी धर्म और सभी संप्रदाय एक ही है. ऊपरी रीति रिवाजों में ही सिर्फ अंतर है. उन्होंने फारसी भाषा में एक पर पर्चा छपवाया, जिसमें इसी बात पर जोर था कि धर्म अनेक है, मत अनेक है, लेकिन ईश्वर एक ही है.

राजा राम मोहन राय ने अंग्रेजी भाषा और साहित्य का भी अच्छा ज्ञान प्राप्त किया था. और वे अंग्रेजी के बड़े-भारी विद्वान थे. ईसा मसीह के जीवन और उनकी शिक्षाओं पर इन्होंने अंग्रेजी में कई लेख लिखें और प्रकाशित कराए.

भारत के इतिहास में जिस समय राजा राममोहन राय का जन्म हुआ था, हिंदू समाज बड़ी पिछड़ी हुई स्थिति में था. हिंदू समाज और हिंदू धर्म में अनेकानेक बुराइयां घुस आयी थी. जाति पाति का बंधन बहुत बड़ा था. लड़के-लड़कियों का विवाह बचपन में ही कर दिया जाता था. विधवाओं की शादी नहीं होती थी. अक्सर वे मृत पति के साथ ही बेरहमी से जला दी जाती थी. श्री राम मोहन ने खुद अपनी आंखों से अपनी भाभी को जलते देखा था. यह रिवाज सती प्रथा के नाम से सारे देश में प्रचलित था.

राम मोहन ने हिंदू समाज की बुराइयों को दूर करने की ठानी है. जगह जगह उन्होंने भाषण दिए और समाज की बुराइयों पर लेख लिखकर अखबारों में प्रकाशित कराएं. उन्होंने सरकार पर जोर डाला की बुराइयों को वह बंद करें. लॉर्ड विलियम बैंटिक उस समय हिंदुस्तान का गवर्नर जनरल था और बड़ा ही अच्छे ख्याल का आदमी था. राजा राममोहन राय ने हिंदू शास्त्रों का प्रमाण देते हुए जब सती प्रथा बंद करने का विचार रखा, तो बैंटिक ने उसे स्वीकार कर सारे देश में कानून बना दिया.

उनके उदार और मौलिक विचारों के कारण बहुत से पुराने ख्याल के मानने वाले उनके दुश्मन हो गए. राजा राम मोहन को उन लोगों से भद्दी निंदा सुननी पड़ी. फिर भी, वे दृढ़ संकल्प रहे और बराबर अपने भाषणों एवं लेखों से सामाजिक बुराइयों को दूर करने की कोशिश में लगे रहे. उन्होंने 1830 में ब्रह्म समाज की स्थापना की, जिसका उद्देश्य ही था समाज और धर्म में सुधार लाना.

इसके अलावा राम मोहन राय ने शिक्षा के क्षेत्र में भी सुधार किए और अनेक परिवर्तन कराये. वही प्रथम भारतीय थे, जिन्होंने पहले पहल बंगला की शिक्षा में अंग्रेजी को भी स्थान दिया. बंगला के अतिरिक्त, हिंदी गध को भी उनकी देन कम नहीं है. बंगदूत पत्र में लेख लिख कर उन्होंने हिंदी गध का भी पथ प्रशस्त किया.

राजाराम मोहन ही पहले भारतीय थे, जिन्होंने उस युग में समुद्र की यात्रा की. उस जमाने में समुंद्र पार जाने से जाती भ्रष्ट हुई मानी जाती थी. लेकिन राममोहन अंधविश्वासों के कायल नहीं थे. उनकी प्रतिभा की धूम देश-विदेशों में हो गई थी. उनके उदार और उन्नत विचारों ने इंग्लैंड की जनता पर भी उन का सिक्का जमा दिया था.

दिल्ली के बादशाह शाह आलम ने अपना दुखड़ा पहुंचाने के लिए राम मोहन को इंग्लैंड भेजा. सन 1830 में 5 महीने के सफर के बाद राममोहन राय लंदन पहुंचे, वहां उनका बहुत स्वागत हुआ. लेकिन, जब वे इंग्लैंड में ही थे की मौत ने उनको आ घेरा और 1833 में ब्रिस्टल में उनकी मृत्यु हो गई.

सैकड़ों वर्ष बीत जाने पर आज भी उनकी याद अमर है और यह हमेशा भारतवासियों के हृदय में अमर रहेगी. राजा राम मोहन राय ना केवल बड़े-भारी विद्वान, कुशल वक्ता और समर्थ लेखक थे, साथ ही साथ वे बड़े ही शक्तिमान समाज सुधारक उद्धारक और धर्म सुधारक भी थे. अंग्रेजी, हिंदी, बांग्ला, संस्कृत, फारसी, अरबी, ग्रीक, हिब्रू आदि अनेक भाषाओं और साहित्य के मर्मज्ञ ने आज के भारत को, वास्तव में, आलोकित किया. यही कारण है कि आज भी राजा राम मोहन का नाम अमर है. वे आधुनिक भारत के पिता के रूप में विख्यात है.

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