सावधान की कथा


सावधान की कथा

Savdhan ki katha, story in Hindi : सावधानी से जो धर्म की रक्षा करता है. विवेक से जो धन का व्यय करता है. उसका धन सुरक्षित रहता है. लक्ष्मी उसका साथ नहीं छोड़ती. उसे सजग पुरुष कहा जाता है.

एक नगर था. उसका नाम था जयंती.

वहां सुपराक्रम नामक राजा का राजा का राज्य था.

उसने अपनी वीरता से बहुत धन अर्जित किया था. वह केवल धन ही अर्जित नहीं करता था, वह नीतिशास्त्र का पंडित भी था. उसके राज्य की प्रजा उससे खुश थी. प्रजा उसे प्यार से नीति नेत्र कहती थी.

राजा को अनेक पुत्र थे. अनेक पुत्रों का पिता होने के कारण वह अपने को भाग्यशाली समझता था.

एक समय की बात है. रात का समय था. राजा अपने महल में सोया था. उस समय उसने किसी औरत का रोना सुना. राजा ने अनुमान लगाया कि यह किसी उच्च कुल की महिला का रुदन है.

वह अपने महल से बाहर निकला. जिस तरफ से रोने की आवाज आ रही थी उधर ही चल दिया. वहां जाने पर राजा ने देखा की अत्यंत सुंदर औरत बैठ कर रो रही है. उसके शरीर पर बहुमूल्य आभूषण थे.

राजा ने उस अतिव सुंदर से रोने का कारण पूछा. उसने कहा, राजन ! मैं आपकी लक्ष्मी हूं. मैं इतने दिनों तक आप जैसे वीर राजा की सुरक्षा में रही. अब दूसरी जगह जा रही हूँ. मेरे रोने का यही कारण है.

राजा ने कहा, तो इसमें रोने का क्या कारण है.

लक्ष्मी ने कहा, मैं आपके प्रेम के कारण रो रही हूं.

राजा ने कहा, अगर मुझ में तुम्हारा अनुराग है तो दूसरी जगह क्यों जा रही हो ?

लक्ष्मी बोली, राजन ! मैं लक्ष्मी हूं. मैं स्वभाव से ही चंचल हूं. बहुत दिनों तक एक स्थान में रहना पसंद नहीं करती हूं.

राजा सोच में पड़ गया.

वह सोचने लगा, मैंने कौन सी गलती की है कि लक्ष्मी मुझे छोड़ कर जा रही है. उचित व्यवहार नहीं करनी से ही लक्ष्मी किसी को छोड़ सकती है.

राजा ने फिर सोचा, हो सकता है कि मैं अनेक पुत्र वाला हूं. इसलिए लक्ष्मी मुझे छोड़ रही है.

कहा भी गया है, राजा को पुत्रहीन नहीं होना चाहिए. उसे अनेक पुत्रों वाला भी नहीं होना चाहिए. राजा के अधिक पुत्र यश या धन के लोभ के कारण आपस में वैर रख सकते हैं. आपस में बराबर संघर्ष भी कर सकते हैं.

बहुत सोचकर राजा बोला, हे लक्ष्मी ! अगर तुमने यहां से भाग जाने का निर्णय लिया तो मैं तुम्हें रोक नहीं सकता. मुझमें इतनी शक्ति नहीं है कि मैं तुम्हें रोकू. तुम्हारी इच्छा जहां जाने की हो वहां जा सकती हो. मैं एक वर की याचना करता हूं. उसे दया करके मुझे दे दो. फिर चली जाना.

लक्ष्मी बोली, राजन ! वर मांग लो. ऐसा वर नहीं मांगना कि मैं जा ना सकूँ.

राजा ने वर मांगा, तुम्हारे द्वारा मेरे पुत्रों का अहित ना हो.

लक्ष्मी ने कहा, राजन ! जरा बताओ तो ! अगर मैं तुम्हें ऐसा वर दे दूं तो फिर मेरी मेरा दूसरी जगह जाना कैसे हो सकता है ?

लक्ष्मी ने कहा, हे राजन ! अगर तुम यही वर मांगना चाहते हो कि मैं तुम्हारे पुत्रों से अलग ना होऊं. तो ठीक है, मैं तुम्हारी ही छाया में आराम करती हूं.

लक्ष्मी राजा के यहां से नहीं जा सकी.

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