सुबुद्धि की कथा – नीति कथा


सुबुद्धि की कथा - नीति कथा
सुबुद्धि की कथा - नीति कथा

Hindi story with moral : हरिसिंह देव नाम का राजा था.

वह मिथिला में राज्य करता था. वह कर्णाट कुल में उत्पन्न हुआ था.

राजा के मंत्री का नाम गुणेश्वर था. नाम के अनुसार ही उसमें गुण भी थे. वह सभी विद्याओं में निपुण था.

हरिसिंह देव के सटे देवगिरी नामक राज्य था. वहां का राजा रामदेव था. उसने गुणेश्वर की निपुणता के विषय में बहुत कुछ सुना. उसने इसकी जांच करनी चाही.

राजा रामदेव ने इसके लिए एक उपाय सोचा. उसने हरिसिंह देव से मित्रता कर ली.

धीरे-धीरे दोनों राजाओं की मित्रता बढ़ती गई. दोनों ने एक दूसरे के साथ अच्छा व्यवहार करना आरंभ किया. नजदीकी बढ़ती ही गई.

राजा रामदेव ने अपने मित्र राजा को एक पत्र लिखा. पत्र में उसने राजा हरिसिंह देव के राज्य से 2 आदमियों को भेजने की प्रार्थना की. उसने पत्र में लिखा कि 2 आदमियों में से एक विद्वान तथा दूसरा मूर्ख होना चाहिए.

अपने मित्र राजा का पत्र पढ़कर हरिसिंह देव को चिंता हुई. वह सोचने लगा कि विद्वान में किसको भेजा जाए और मुर्ख में किसको.

राजा को चिंतित देख कर उसके मंत्री ने चिंता का कारण पूछा.

राजा ने मंत्री को बताया, राजा रामदेव सिंह के यहां से एक पत्र आया है. पत्र में एक विद्वान और मुर्ख की मांग की गई है. मैं बहुत सोच में पड़ गया हूं कि किस विद्वान और किस मूर्ख को भेजा जाए. राजा रामदेव मेरा परम मित्र है. उसकी बात रखना मेरे लिए जरूरी है. इसलिए मैं चिंतित हूं.

राजा की बात सुनकर मंत्री ने कहा, महाराज अगर आप मेरी बात माने तो किसी को मत भेजिए.

राजा ने कहा, मंत्रिवर ! ऐसी बात मत कहो. इससे मुझे बड़े पाप का दोषी बनना पड़ेगा.

मंत्री ने समझाया, राजन ! इसमें आप पाप के भागी नहीं होंगे. राजा रामदेव का इतना बड़ा राज्य है. फिर आपसे मूर्ख और विद्वान मांगने की जरुरत ही क्या है. जरा सोचे तो, आपके राज्य के विद्वान या मुर्ख से उन्हें क्या मतलब. इसमें जरूर कोई राज है. मेरी समझ में वह राज यह है की इसी बहाने मेरी परीक्षा लेना चाहते हैं.

राजा ने पूछा, अब बताइए क्या करना ठीक रहेगा.

मंत्री ने जवाब दिया, महाराज आप केवल इतना ही लिख भेजें कि मेरी समझ से विद्वान ना तो मेरे राज्य में है और ना आपके राज्य में. अच्छा होगा की इसकी खोजबिन किसी तीर्थस्थान में की जाए. अब रही मुर्ख की बात. वह तो सर्वत्र सुलभ है. फिर उसके भेजने का सवाल ही कहां उठता है. मैं मूर्ख का लक्षण लिख देता हूं.

यह कह कर मंत्री ने मुर्ख के लक्षण लिख दिया. इसके बाद राजा और मंत्री दोनों ने मिलकर राजा रामदेव के पत्र का उत्तर लिख भेजा.

राजा रामदेव को अपने पत्र का सही उत्तर मिल गया था. वह बहुत प्रसन्न हुआ. उसने मंत्री गुणेश्वर की काफी सराहना की.

राजा का भ्रम दूर हो गया. उसने यह मान लिया कि गुणियों की गुणों की परीक्षा नहीं की जा सकती. उनमें अताह गुण भरे होते हैं. वह सब कुछ समझता है, सब कुछ जानता है. वह क्षण भर में ही अपने विवेक से भले बुरे का निर्णय कर लेता है.

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