अमर शहीद मंगल पांडे : मंगल पांडे का जीवन परिचय


अमर शहीद मंगल पांडे : मंगल पांडे का जीवन परिचय
अमर शहीद मंगल पांडे : मंगल पांडे का जीवन परिचय

अमर शहीद मंगल पांडे : मंगल पांडे का जीवन परिचय — सन् 1857 की क्रांति के इतिहास में मंगल पांडे के बलिदान और देश भक्ति की गाथा अमिट रुप से अंकित है. निर्भयता और वीरता के मंगल पांडे पर्याय थे. ये गुण उनमें बाल्यकाल से हीं था. वो बचपन से हीं तेजस्विता की प्रतिमूर्ति थे. और धर्म के प्रति उनमें अगाध निष्ठा की मंगल के निर्भीक व्यक्तित्व का कारण उनकी माता श्रीमती अभयरानी थीं, जो उन्हें बचपन में वीरतापूर्ण कथाएं सुनाया करती थीं.

 

मंगल पांडे की जीवनी : Mangal Pandey ki jivni

मंगल पांडे का जन्म 19 जुलाई 1827 को फैजाबाद के सुरडपुर गांव में हुआ था.

युवावस्था में जब मंगल पांडे ने पदार्पण किया वह समय बड़ा विषम था. देश अंग्रेजों का गुलाम था. और सारे देश में अंग्रेजों के विरुद्ध जन असंतोष का वातावरण फैला हुआ था. उस समय गोरी सेनाएं गांव-गांव में मार्च करती थी. तथा किसी भी सृष्टि – पुष्ट भारतीय नौजवान पर ब्रिटिश अधिकारियों की दृष्टि पड़ती थी तो वे उसे सेना में भर्ती होने का लालच देते थे.

ऐसे हीं समय में एक दिन गोरी सेना मंगल पांडे के भी ग्राम में पहुंची. मंगल पांडे का शरीर भी सुंदर और बलिष्ठ था. ब्रिटिश सैनिक अधिकारियों ने उनसे भी सेना में भर्ती होने को कहा तो मंगल पांडे सेना में भर्ती हो गए. मंगल पांडे सेना में अवश्य भर्ती हो गया था मगर उसके भीतर का स्वाभिमान पूर्ण जागृत था. वो अंग्रेजों द्वारा भारतीय जनता पर किए जा रहे अत्याचारों के कारण अंदर – हीं – अंदर घुटन महसूस कर रहा था.

इधर, अवध के नवाब वाजिद अली शाह को अंग्रेजों ने गद्दी से उतार कर अवध से दूर कलकत्ता में नजरबंद कर दिया था. फौजी पलटन में अवध के लोगों की संख्या काफी थी, अत: अंग्रेजों के इस कृत्य से फौजी पलटन में असंतोष पैदा हो रहा था.

दूसरी ओर, नाना साहब के साथ भी कुछ ऐसा हीं हुआ था. परिणाम स्वरूप नाना साहब ने अंग्रेजो के विरुद्ध सशत्र क्रांति का झंडा बुलंद कर दिया, और इस विषय में योजना तैयार कर ली. सैनिक छावनियों में भारतीय सैनिकों को अंग्रेजों के विरुद्ध सशत्र क्रांति के लिए गुप्तचरों के माध्यम से खूब प्रेरित किया जाने लगा.

सैनिक छावनियों में तो पूर्व से हीं असंतोष का अंकुर जन्म ले चुका था. इस असंतोष की आग में घी का कार्य में समाचार कर रहा था कि गाय और सूअर की चर्बी के कारतूसों को सैनिकों के लिए प्रयोग हेतु दिया जाता है.

इस तथ्त का पता एक घटना से लग सकता था. हुआ यह था किसी निम्न वर्ग के कर्मचारी ने एक सैनिक से पानी पीने के लिए लोटा मांगा. सैनिक ने उसे अछूत समझकर लोटा देने से मना कर दिया. पिछड़ी जाति के सैनिक में जवाब में कह दिया “मुझे लौटा देने से तुम्हारा धर्म भ्रष्ट हो जाएगा, लेकिन जिन कारतूसों को तुम दांतों से खोलकर बंदूक में डालते हो, उन पर गाय और सूअर की चर्बी का लेप होता है. क्या उस समय तुम्हारा धर्म भ्रष्ट नहीं होता?”

Also read : खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी : लक्ष्मीबाई महान क्रान्तिकारी

यह सुनकर सैनिक चौंक गया, उसने यह बात अपने सभी साथियों को बताई. बहरानपुर की सैनिक छावनियों में क्रांति ज्वाला की पृष्ठभूमि पूर्व से प्रज्वलित होने की स्थिति में इस खबर ने आग में घी का काम कर दिया.

इसी बीच इस क्षेत्र में सन्यासियों के दल के साथ महर्षि दयानंद का आगमन हुआ. उनके उपदेशों में भी कारतूसों में गाय और सूअर की चर्बी होने का खूब प्रचार किया गया. अब तो सैनिकों का मन आत्मग्लानि से छटपटाने लगा. परिणाम यह हुआ कि वह रामपुर की 19वीं रेजिमेंट के हिंदू और मुसलमान सैनिकों ने उन कारतूसों को स्पर्श करने से साफ इंकार कर दिया. इस पर अंग्रेज अधिकारियों ने इन हिंदू और मुसलमान सैनिकों को नि:शस्त्र करने एवं कठोर सबक सिखाने के लिए बर्मा से भारी संख्या में अंग्रेज सैनिकों को बुलाया.

अंग्रेज भारतीय सैनिकों के विद्रोह को सख्ती से दबाने पर आमदा हो चुके थे. बहरामपुर में ही पूरी पलटन को दंडित करना संभव ना था, अतः अंग्रेजों ने बगावत करने वाले सैनिकों को छोटे-छोटे समूह में बैरकपुर भेजकर वहीं सजा देना उचित समझा.

परंतु इस प्रकार की सभी घटनाओं की सूचनाएं साधु-संतों के माध्यम से गुप्त रुप से आसपास की सैनिक छावनियों में पहुंचती रहती थी.

बैरकपुर की 34वीं रेजिमेंट के सिपाही मंगल पांडे को अंग्रेज फौज द्वारा भारतीय सैनिकों के विरुद्ध समाचार मिला तो वह तिलमिला उठा. उसका स्वाभिमान जाग चुका था.

वह 29 मार्च 1857 का दिन था. मंगल पांडे एक हाथ में बंदूक और दूसरे में तलवार लेकर परेड मैदान में पहुंच गया. वहां सभी भारतीय सैनिकों को उसने अंग्रेजी साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष के लिए ललकार लगाई. उसके स्वर शोले उगल रहे थे. वह अंग्रेज अधिकारियों को खत्म करने के लिए उतारू था.

सही बात ये थी कि मंगल पांडे सच्चे अर्थों में धार्मिक था. वह धर्म जो भारत की प्राणवायु है. जीवनी शक्ति है मंगल पांडे की इसी धर्म भावना को सरकार की कुटिल और भारत की धर्म भावना को नष्ट करने की नीति से गहरा वेदना पहुंची थी इसलिए मंगल पांडे ने भारतीय सैनिकों के सोए स्वाभिमान को ललकारते हुए कहा – ” उठो, जागो, अत्याचारियों का सर्वनाश करो. कब तक अत्याचार के घूंट पीते रहोगे.”

मंगल पांडे ने विद्रोह की खुली घोषणा कर दी थी. उसके द्वारा की गई विद्रोह की उद्घोषणा का समाचार चारों ओर फैल गया. ह्यूसन ने मंगल पांडे को गिरफ्तार करने का आदेश दिया परंतु उसकी आज्ञा का पालन किसी भी भारतीय सैनिक ने नहीं किया. इतने में ही मंगल पांडे ने ह्यूसन को गोली से घायल कर दिया.

इस प्रकार इस्ट इंडिया कंपनी के सिपाही मंगल पांडे ने 29 मार्च 1857 को विदेशी शासकों के खिलाफ पहली गोली दागकर स्वतंत्रता संग्राम का भी श्री गणेश कर दिया. मेजर ह्यूसन के घायल हो जाने के तुरंत बाद लेफ्टिनेंट वाग घोड़े पर सवार होकर आया. पांडे ने उसकी ओर देखा ही था कि वाग ने मंगल पांडे पर गोली दाग दी. लेकिन मंगल पांडे ने अपना बचाव करते हुए उस को भी गोली से घायल कर दिया.

ह्यूसन और हेनरी वाग से संघर्ष के समय मंगल पांडे के साथी ईश्वर पांडे ने अन्य भारतीय सैनिकों को जो कि दोनों अंग्रेज अफसरों की मदद के लिए आगे बढ़ने वाले थे ललकार कर रोके रखा.

परिस्थिति को बिगड़ता देखकर कर्नल ह्वीलर ने ईश्वर पांडे को आदेश दिया कि वह मंगल पांडे को गिरफ्तार करे, लेकिन ईश्वर पांडे ने कर्नल ह्वीलर की आज्ञा मानने से साफ इंकार कर दिया.

Also read : महान स्वतंत्रता सेनानी अमर शहीद, राजगुरु !

सैनिकों द्वारा विद्रोह की स्थिति देखकर अंग्रेज सैनिकों की पलटन बुला ली गई. मंगल पांडे किसी सिंह की भांति अब चारों ओर से अंग्रेज फौज द्वारा घेर लिया गया था. उसके पास बचने का कोई रास्ता नहीं था, परंतु वह सच्चा स्वाभिमानी देशभक्त भारतीय सिपाही था. वह जीवित हीं अंग्रेजों के हाथ गिरफ्तार नहीं होना चाहता था. इस स्थिति में मंगल पांडे ने एक कड़ा निर्णय लिया, यह निर्णय था कि अंग्रेज सैन्य अधिकारियों के हाथ जिंदा पकड़ने के बजाए स्वयं का ही स्वयं ही प्राणान्त कर दिया जाए. इस निर्णय के होते हीं उस वीर ने स्वयं को गोली मार ली. परंतु भाग्य ने उसका साथ नहीं दिया उसे गिरफ्तार कर लिया गया.

मंगल पांडे पर एक सैनिक अदालत में मुकदमा चला. उन्हें कठोर यातनाएं दी गई. अंग्रेज मंगल पांडे से क्रांतिकारियों के नाम उगलवाना चाहते थे. परंतु वे नहीं जानते थे कि मंगल पांडे में सच्चे देशभक्त का रक्त है. अतः लाख कोशिश की गई किंतु मंगल पांडे की जुबान जैसे पत्थर की बनकर रह गई थी. भला वह वीर सपूत अपने देश से कैसे द्रोह कर सकता था. अंग्रेज लोगों को निराश होना पड़ा.

8 अप्रैल 1857 को मंगल पांडे को फांसी दी गई. फांसी के तख्ते पर वह भारत माता का सपूत ‘भारत माता की जय’ के उद्घोष के साथ फांसी पर झूल गया. साथ हीं शहीद के रूप में भारतीय इतिहास में अमर हो गया. फांसी के बाद अंग्रेजी हुकूमत ने मंगल पांडे के परिजनों को पीड़ित करना शुरु कर दिया. और उन्हें चैन से नहीं बैठने दिया. ऐसे में मंगल पांडे की पत्नी विद्या को अपने पुत्र कृति पांडे के जीवन रक्षा की चिंता सताने लगी. सरकार के भय से आस – पड़ोस तथा संबंधियों ने भी किनारा कर लिया. पर ऐसे में विद्या किसी प्रकार छिपती छिपाती कृति को अपने गले लगाए महाराणा की सिंहभूमि मेवाड़ पहुंच गई. यहां अंग्रेजो को उस पर संदेह हुआ तो वह जयपुर आ गई. जयपुर के महाराजा माधोसिंह थे, उनके प्रमुख अमात्य रामप्रताप पुरोहित ने विद्या के रहने – खाने का प्रबंध कर दिया. 7 अप्रैल 1880 में मंगल पांडे की पत्नी विद्या भी संसार से चल बसी. मंगल पांडे के परिवार से श्री राम पांडे अंतिम सूचना तक राजस्थान में हीं रह रहे थे.


Comments 0

Your email address will not be published. Required fields are marked *

log in

reset password

Back to
log in