खतरनाक है टूथपेस्ट ? सच जानकर चौक जायेंगे


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ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा तैयार किए गए एक अध्ययन में इस बात का गंभीर असंतोष व्यक्त किया गया कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों के गैंग ने किस प्रकार दवा और केमिस्ट एक्ट 1993 की धज्जियां उड़ा दी. इस कानून में फ्लोराइड मिले हुए टूथपेस्टों की बिक्री पर कुछ पाबंदियां लगा दी गई थी . राष्ट्रीय पेयजल आयोग द्वारा तैयार किए गए इस दस्तावेज में ग्रामीण क्षेत्रों में फ्लोरोसिस नामक बीमारी जिसने हड्डियां कमजोर हो जाती है और दांत गिर जाते हैं के खिलाफ लड़ रहे स्वास्थ्यकर्मियों एवं अन्य विशेषज्ञों को सचेत किया गया है.

90 पेज के इस दस्तावेज में कहा गया है कि फ्लोरोसिस नामक बीमारी उन क्षेत्रों में अधिक होती है जहां पर जल में फ्लोराइड की मात्रा अधिक होती है.
1945 के दवा और केमिस्ट कानून में संघ संशोधन करते हुए बनाए गए दवा और केमिस्ट एक्ट 1993 के लागू होने से पहले ही सरकार ने एक गजट नोटिफिकेशन द्वारा टूथपेस्ट निर्माताओं के लिए 3 शब्दों की सूची बना ली थी.  पहली कोई भी टूथपेस्ट में फ्लोराइड की मात्रा 1000 पीपीएम यानी पार्ट्स पर मिलियन से अधिक नहीं होनी चाहिए. दूसरे प्रत्येक टूथपेस्ट डब्बे पर बनाने और अनुपयोगी होने की तारीख के लिए स्पष्ट लिखी जानी चाहिए. तीसरे प्रत्येक टूथपेस्ट ट्यूब पर चेतावनी लिखी होनी चाहिए कि 7 वर्ष से कम के बच्चे फ्लोराइड युक्त टूथपेस्ट का इस्तेमाल नहीं करेंगे. 

परंतु यह नोटिफिकेशन जारी हुआ तो इसमें बच्चों की चेतावनी वाली शर्त ही गायब हो गई. दस्तावेज की संपादक ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस की डॉक्टर एके सुशीला ने बताया कि ऐसा टूथपेस्ट निर्माता बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दबाव में किया गया. क्योंकि यह कंपनियां चाहती थी कि भारतीय सरकार कोई कड़ा रुख अपनाया अन्यथा सारे विकासशील देशों की सरकारों इस तरह का कानून बना देगी और बहुराष्ट्रीय कंपनियों का अरबों रुपए का कारोबार समाप्त हो जाएगा. डॉक्टर सुशीला ने एक आदमी की ओर इशारा किया उन्होंने कहा कि बहुराष्ट्रीय कंपनियां यह तो लिख देती है कि निर्माण के समय टूथपेस्ट में 1000 पीपीएम से कम फ्लोराइड मिलाया गया है. यह बहुत ही खतरनाक है इसकी जगह केवल नीम का दातुन करें.

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