खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी : लक्ष्मीबाई महान क्रान्तिकारी


खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी : लक्ष्मीबाई महान क्रान्तिकारी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी : लक्ष्मीबाई महान क्रान्तिकारी

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी : लक्ष्मीबाई महान क्रान्तिकारी : हिंदी साहित्य की सुप्रसिद्ध कवित्री सुभद्रा कुमारी चौहान ने महारानी लक्ष्मीबाई पर कविता लिखी थी कि – “बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी.”

सचमुच उक्त पंक्तियां वीर झांसी की महारानी लक्ष्मी बाई पर खरी उतरती है. महारानी लक्ष्मीबाई की वीरता और यश गाथा आज भी देशवासियों की स्मृतियों पर अंकित है. और भारत की इतिहास में तो उनका नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखा है. साथ ही उन अमर बलिदानियों में उनका प्रमुख स्थान है, जिन्होंने देश के शत्रुओं से लोहा लेते हुए मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए.

Rani Laxmi Bai ( Jhansi Ki Rani ) : Jeevni

महारानी लक्ष्मी बाई का जन्म सन 1835 ईस्वी में बनारस में हुआ था. उनके पिता का नाम मोरोपंत तांबे था. वे मराठी ब्राह्मण थे. अंतिम पेशवा जब पदच्युत होने पर जब बिठूर भेजे गए, तो उनके भाई चीमन्न जी आपा काशी चले आए. आपा जी के साथ ही मोरोपंत तांबे भी काशी आ गए थे. महारानी के जन्म का नाम मनुबाई था. ज्योतिषियों ने कन्या के ग्रहों को देख कर यह भविष्यवाणी की थी, कि यह कन्या बड़ी तेजस्विनी होगी. और किसी की रानी होगी.

कुछ समय ही बाद आपा जी का देहांत हो गया. तांबे जि निराश्रय हो गए. उनके सहारे एकमात्र आधार स्वरूप आपाजी चल बसे थे. ऐसे हालात में उनका काशी में रहना बहुत दुष्कर था. वो बिठूर भाई के पास चले आए. और वहीं रहकर अपना समय व्यतीत करने लगे. 3-4 वर्ष की आयु में मनुबाई की मां का भी देहांत हो गया. इसलिए पिता को ही मनु भाई की देखरेख करनी पड़ी. पेशवा को मनुभाई पर विशेष स्नेह था, मनुबाई अत्यंत रूपवती थी. मनुबाई और पेशवा का दत्तक पुत्र नाना साहब दोनों साथ ही खेला करते थे. साथ में पढ़ा करते थे. जो काम नाना साहब करते, वही काम करती थी.

Rani Laxmi Bai Ek Mahan Krantikari

नाना साहब का मनुबाई द्वारा यह अनुकरण इस रुप में था कि नाना साहब घुडधसवारी करते, तलवार चलाना सीखते, या शिकार करते तो मनु भी वही सब करने लगती. केवल करती ही नहीं थी, वह सहज हीं सीख भी लेती थी. जहां नाना साहब से भी जल्दी मनु भाई ने हर काम में निपुणता प्राप्त कर लिया था.

एक दिन नाना साहब को हाथी पर चलते देख मनुबाई भी हाथी पर चढ़ने की जिद्द करने लगी. पेशवा ने कहा – ‘तेरे भाग्य में हाथी की सवारी कहां बदी है. मनुबाई को यह बात लग गई, उसने तुरंत उत्तर दिया मेरे भाग्य में एक हाथी नहीं 10 हाथी बदे हैं.’ इसके बाद मनुबाई थोड़े ही समय में पढ़ने – लिखने के साथ – साथ युद्ध कला में भी प्रवीण हो गई.

जब मनुबाई की अवस्था 8 वर्ष की हुई, तो झांसी के राजा गंगाधर राव से उनका विवाह हो गया. विवाह के दिन से हीं उनका नाम लक्ष्मीबाई पर गया. 16 वर्ष की अवस्था में लक्ष्मी बाई के पुत्र उत्पन्न हुआ. परंतु शीघ्र ही उसकी मृत्यु हो गई. इस बात से राजा गंगाधर को बहुत दुख हुआ. पुत्र शोक के कारण उनका शरीर दिन-प्रतिदिन छीन होता चला गया. तथा इसी अपार दुख के कारण उनकी मृत्यु भी हो गई. अपनी मृत्यु से पूर्व उन्होंने एक दत्तक पुत्र गोद लिया था.

महारानी लक्ष्मीबाई ने पति का विधिवत अंतिम संस्कार किया. इस समय रानी की उम्र 18 वर्ष की थी. ऐसे समय उन पर ऐसा दुख आ पड़ा. एक तरफ राज्य शासन का गुरुतर भार था. दूसरी ओर पति वियोग की असहनीय वेदना. ऐसी स्थिति में रानी के लिए यदि कोई सहारा था तो वो उसका दत्तक पुत्र. रानी ने ब्रिटिश सरकार की सेना में एक खरीता भेजा, कि सरकार उनके दत्तक पुत्र को राज्य का अधिकारी स्वीकार कर ले. सरकार ने उसका कोई उत्तर नहीं दिया. वहां तो कुछ दूसरा रहस्य था. सरकार रानी के दत्तक पुत्र को स्वीकार करना हीं नहीं चाहती थी. यदि स्वीकार कर लेती, तो झांसी का राज्य उनके कब्जे में भला कैसे आता.

लॉर्ड डलहौजी ने रानी को एक आज्ञा पत्र भेजा उसने लिखा की झांसी को सरकार ने ब्रिटिश राज्य में मिला लिया है. लक्ष्मीबाई किला खाली कर दें. उन्हें 5000 रूपये पेंशन दी जाएगी. वो अपनी सेना तोड़ दें. और नौकर घटा दिए जाएं.

रानी पत्र पाकर व्याकुल हो गई. उनको बेहद पीड़ा हुई. पति और पुत्र के वियोग का दुख उस पर से अभी दूर भी ना हो सका था, कि इस घटना ने उसके कोमल हृदय को बहुत आघात पहुंचाया. रानी मूर्छित हो कर गिर पड़ी. पर चारा ही क्या था. विवश होकर पेंशन स्वीकार करनी पड़ी.

महारानी लक्ष्मीबाई ने एक पवित्र स्त्री की तरह अपना वैधव्य जीवन बिताना शुरू कर दिया. प्रातः काल 4 बजे उठकर स्नान, ध्यान, पूजा-पाठ आदि से 8 बजे तक निवृत होकर महल के भीतर ही भ्रमण करती थी. उसके बाद भोजन करके कुछ विश्राम करती. और अपने दैनिक कार्यों में लग जाती थी. इसके बाद 11 सौ राम नाम की आटे की गोलियां मछलियों को खिलाती. फिर रात को 8 बजे तक शास्त्र पुराण आदि को सुनती थी. तत्पश्चात भोजन करके ईश्वर का स्मरण करके सो जाती थी. यही उनका नित्य नियम और कार्य था.

Rani Laxmi Bai Ek Mahan Krantikari

उनके पिता मोरोपंत घर का काम करते थे. इधर रानी के साथ किए गए इस प्रकार के व्यवहार का जनता पर विपरीत प्रभाव पड़ा. लॉर्ड डलहौजी ने जिस स्वार्थपरता का परिचय दिया था, वह सभी के ह्रदय में कांटे की तरह चुभ रहा था. मध्य भारत और उत्तर भारत के बीच झांसी हीं एक ऐसा स्थान था, जहां से सिंधिया तथा अन्य राजाओं को परास्त किया जा सकता था. और मध्य भारत की बड़ी-बड़ी रियासतों को काबू रखा जा सकता था. भला अंग्रेज लोग ऐसे मूल्यवान स्थान को कैसे छोड़ने वाले थे.

यही स्वार्थों से प्रेरित होकर दत्तक पुत्र को अमान्य करार देकर झांसी को सबके देखते-देखते अपने अधीन कर लेना अंग्रेजो की नीति थी. जिसे जनमानस ने पसंद नहीं किया. जिस कारण लोगों में उनके प्रति रोष उत्पन्न हो गई. जनमानस में व्याप्त घृणा दिन – प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही थी. इसी बीच सन 1857 ई. में विद्रोह की आग भड़क उठी. और वो आग धीरे-धीरे चारों ओर फैलने लगी.

झांसी भी इस विद्रोह की अग्नि से अछूती नहीं रह सकी थी. इसलिए झांसी में भी विद्रोह की हलचल मचने लगी. अंग्रेजों को भी भय उत्पन्न हुआ. उन्होंने रानी से विद्रोह शांत करने के लिए कहा. परंतु रानी बेचारी इस अवस्था में सरकार की भला क्या मदद कर सकती थी. रानी अब वो रानी कहां थी. ना तो उसके पास अस्त्र-शस्त्र थे, ना सेना ही थी. वो करती भी तो क्या. इस पर भी वह जो कुछ कर सकती थी, उसने वैरभाव भुलाकर किया.

अंग्रेज स्त्री बच्चों को अपने किले में शरण दी. लगभग 100 आदमी भी सहायता के लिए भेजे. किंतु इस सबसे भला क्या हो सकता था. बलवारी जोर पकड़ते गए. उन्होंने कितने ही अंग्रेजों का क्रूरता से वध किया. और महारानी के किले को घेर कर उन से 3 आख रुपए मांगे. रानी ने उन्हें समझाया पर वो कब मानने वाले थे. रानी से रूपयों के लिए आग्रह करने लगे. रानी को मारने की धमकी देने लगे. और किले में आग लगाने तक को तैयार हो गए. तब तो रानी को बहुत दुख हुआ. और उसने विवस हो कोई उपाय ना देख कर, अपने गहने दे दिए. और किसी तरह उनसे अपनी जान उस समय जुताई.

अब झांसी में अंग्रेजों का कोई प्रभाव नहीं रह गया था. और एक तरह से शासन उठ सा हीं गया था. बलवाइयों का तो आतंक चारों ओर छा गया था. कुछ शांति मिलने पर रानी ने बलवे की सूचना सागर के कमिश्नर को दी. अंग्रेजों ने भी जब तक कोई अंग्रेज झांसी ना पहुंचे, तब तक के लिए रानी को झांसी का शासन सौंप दिया.

जैसे ही रानी ने शासन की बागडोर संभाली त्यों ही शिवराव ने झांसी पर आक्रमण कर दिया. रानी के पास कोई भी साधन ना थे. इस पर भी रानी ने जिस चतुरता से शत्रु पर विजय पाई, वह एक आश्चर्य की बात थी. शिव राव अपना सा मुंह लेकर लौट गया. इतने में ही ओरछा के दीवान नत्थे खां ने 20 हजार सवार लेकर हमला कर दिया.

नत्थे खां के हमला करने पर रानी ने ब्रिटिश सरकार से सहायता चाही. पर सब व्यर्थ. नत्थे खां बड़े जोरों पर था. इसपर भी रानी ने हिम्मत ना हारी. किले में रानी ने एक बड़ी सभा की, और सभी को समझाया. उनको लड़ाई के लिए उत्साहित किया, किंतु कायरों पर कब रंग चढ़ सकता था. मारे क्रोध की रानी की आंखें अग्नि वर्षा करने लगी. और होंठ फड़फड़ाने लगे. वह क्रोध में आकर बोली “धिक्कार है तुम लोगों के मानव जीवन को. मैं तो स्त्री होकर अपने साहस, धैर्य और बल पर विश्वास करके रण से विमुख कदापि नहीं हो सकती. चाहे तुम लोग कायर बने रहो.”

रानी लक्ष्मीबाई की बाणी में अद्भुत ओज था. उसका उद्बोधन सुनकर सभी लज्जित हुए, और सब में एक बड़ी उत्तेजना फैल गई. सभी युद्ध की तैयारियां करने लगे. तलवारें खिंचने लगी, किले की बुर्ज ठीक किए. गए उन पर तोपें लगा दी गईं. रानी ने मर्दाना वेश धारण किया और विद्युत की भांति सब में अपूर्व जोश भर दिया. कायर वीर बन गए.

और फिर नत्थे खां ने बड़े वेग से आक्रमण किया. उसने अपनी सारी शक्ति लगा दी. किंतु रानी के आगे उसकी एक ना चली. तलवार की धार से रणक्षेत्र चमचमा उठा. सैकड़ों रणबांकुरों की लाशों से भूमि पट गई. नत्थे खां अपनी जान लेकर भागा. रानी की विजय हुई. किले पर विजय का झंडा फहराया गया.

रानी ने जान पर खेलकर अंग्रेजों के राज्य की रक्षा की. और झांसी को विद्रोहियों के पंजे से बचाए रखा. झांसी को छोड़कर अन्य स्थानों पर विप्लव कार्यो ने अपना कब्जा जमा लिया था. अंग्रेजों को रानी की विजय से प्रसन्न होना चाहिए था, किंतु किसी के बहकावे से और यह अफवाह उड़ाने से, की रानी अंग्रेजो के विरुद्ध है. अंग्रेजो ने बिना इस बात की जांच किए हीं उस सबला रानी पर आक्रमण कर दिया.

रानी को जब ये पता चला कि मेरे विरुद्ध अंग्रेजों को किसी ने भड़काया है, तो उसने तुरंत आगरे के कमिश्नर को एक खरीता भेजा, जिससे की गलतफहमी दूर हो जाए.

परंतु इस बात पर ध्यान कौन देता. अंग्रेजों को झांसी पर अपना अधिकार करना था. भला उस पर वह किसी और का शासन कैसे देख सकते थे.

और फिर! आदेश हुआ कि – “किला फौरन खाली कर दो. गोला बारुद सब हमारे हवाले कर के हाजिर हो.”

ये रानी का सरासर अपमान था. और स्वाभिमानी रानी को भला अपमान कैसे सहन हो सकता था. रानी अंग्रेजों के स्वार्थपूर्ण अभीप्राय को समझ गई. इधर सर ह्यूरोज एक बड़ी सेना लेकर चढ़ गया. रानी को यह विश्वास ना था कि अंग्रेज इतनी शीघ्रता करेंगे. रानी अनभिज्ञ थी. उसे क्या मालूम था, कि उसे पुनः रणभेरी बजानी पड़ेगी. सिर पर सर ह्यूरोज की सेना को चढ़ा देख कर रानी की आंखें खुली. वह तिलमिला उठी और मुट्ठी भर वीरों को लेकर रणक्षेत्र में कूद पड़ी.

कर्नल मैलेसन ने स्वयं लिखा है कि – अंग्रेजों के दुर्व्यवहार के कारण महारानी को बलवा करना पड़ा.

रानी के थोड़े से सिपाहियों पर ह्यूरोज का अस्त्र – शस्त्रों से सुसज्जित दल टूट पड़ा. परंतु रानी के रणबांकुरों का भी रणकौशल भी देखने लायक था. थोड़े से लोगों ने ही दांत खट्टे कर दिए. अंग्रेजी सेना के छक्के छूट गए. मर्दो की तो बात ही क्या, स्त्रियां तक गोला बारुद तैयार करती थी. अंग्रेजो ने किला लेने का बहुत प्रयत्न किया, किंतु सब निष्फल रहा. इतने में एक विश्वासघाती ने यह भेद बता दिया कि किस ओर से आक्रमण करने से किले पर अधिकार किया जा सकता है.

फिर क्या था वैसा ही किया गया. शहर की दीवार वेद दी गई. और अंग्रेज भीतर घुस आए. रानी ने जब कोई रक्षा का उपाय ना देखा, तो नंगी तलवार लेकर निकल पड़ी और क्षणभर रणतांडव करके और सैकड़ों को मौत के घाट उतार कर फिर किले में घुस गई.

रानी ने सोचा अभी यहां से निकल जाना ही श्रेयस्कर है. दत्तक पुत्र को अपनी पीठ पर लादकर और स्वयं घोड़े पर सवार होकर 10 – 12 वीर बहादुर अंग रक्षकों को लेकर, जब अंग्रेजी सेना के जाल से महारानी निकल गई, तो ह्यूरोज को बड़ा आश्चर्य हुआ. उसने एक लेफ्टिनेंट को पकड़ने के लिए भेजा.

रानी एक गांव में अपने उस पुत्र को खाना खिला कर आगे चलने की तैयारी में हीं थी, इतने में लेफ्टिनेंट पहुंच गया. उसके साथ में सेना थी रानी अकेली थी. पर भिड़ गई. रानी का रण कौशल अदभुत था. उसने कमाल कर दिया. उस क्षण वह साक्षात दुर्गा के रूप में देखी गई. गोरे साहब पर एक ऐसा वार किया, कि वह छटपटाकर गिर गया. उसकी सेना भाग खड़ी हुई. और रानी पुत्र सहित बिना कुछ खाए पीए 102 मील बराबर घोड़ा दौड़ाती हुई कालपी जाकर रुकी तथा पेशवा से मिल गई.

अंग्रेज लक्ष्मीबाई का जब बाल बांका भी ना कर सके तो वो बौखला उठे. उनकी बौखलाहट का परिणाम यह हुआ कि वह अत्याचारों पर उतारु हो गए. इधर रानी के पिता तांबे को पकड़ कर अंग्रेजों ने फांसी दे दी. शहर में आग लगा दी थी. तीन – चार दिन झांसी को खूब लूटा गया. अत्याचारों की तो सीमाएं हीं लांघ दी गई. लोमहर्षक दृश्य को देखकर ह्रदय थर्रा उठा था. छोटे-छोटे बच्चों से लेकर 80 वर्ष तक के बूढ़े, स्त्री – पुरुषों को निर्भयता पूर्वक मारा गया. झांसी की इस घटना का उल्लेख स्वयं अंग्रेज अफसरों ने किया है.

अब जब सर ह्यूरोज को पता चला कि रानी कालपी के पेशवा से जाम मिली है, तो उसने कालपी पर चढ़ाई कर दी. भीषण संग्राम हुआ. पेशवा की सेना ने अंग्रेज सेना का खूब मुकाबला किया. किंतु पेशवा की सेना का संगठन मजबूत ना होने से पेशवा की सेना के पैर उखाड़ गए.

पेशवा को पराजित होते देख रानी ने अपना घोड़ा मंगवाया और विकराल रुप धारण कर स्वयं युद्ध में कूद पड़ी. रानी का युद्ध अप्रतीम था. संसार में उस वीरांगना की वीरता अद्भुत थी, जिसकी समता संसार के पर्दे पर नहीं की जा सकती. उसने शत्रुओं के छक्के छुड़ा दिए, परंतु रानी अकेली थी. पेशवा का सैन्य शक्ति संगठन दुर्बल था. इसलिए रानी को हारना पड़ा. परंतु वे अंग्रेजों से बचकर साफ निकल गई.

इधर पेशवा की दुर्बलता का सिंधिया को पता चला तो वह भी चढ़ आया. बलवाई पहले तो जी – जान से लड़े किंतु सिंधिया के सामने उनके पैर न जम सके. बलवाइयों की सेना भागना ही चाहती थी कि रानी ने अपने दो – तीन जवान बुलाए, और सिंधिया की सेना पर भूखे शेर की तरह टूट पड़ी. रानी की लपलपाती तलवार से सिंधिया घबरा गया. स्वयं सिंधिया जान बचाकर भागा. रानी के पराक्रम से पेशवा जीता और ग्वालियर का किला अधिकार में आया.

सर ह्यूरोज बेचैन था. वह फिर एक बड़ी सेना लेकर आ धमका. उसे पेशवा से भय नहीं था. यदि उसे डर था तो महारानी लक्ष्मीबाई का. कर्नल मैनसिल का कहना है कि महारानी के अतिरिक्त किसी में इतनी बुद्धि और रण कुशलता ना थी, जो सब तरह की तरकीब एक समय पर सुक्षाति. रानी सिपाहियों को लेकर आगे बढ़ी, साथ हीं उन्होंने तोपें दागने की आज्ञा दे दी. अंग्रेज घबरा गए थे. खेमें में खूब युद्ध हुआ. अंत में अंग्रेजों ने चारों ओर से घेर लिया. दनादन गोलियां बरस रही थीं. उस घेरे से निकल जाना आसान काम नहीं था.

महारानी अपने कुछ साथियों सहित उस विकट व्यूह से निकलने का प्रयत्न कर रही थी. शत्रुओं के घनघोर प्रहार होने पर भी अपनी दासियों और स्वामिभक्त सरदार रामचंद्र राव सहित वो बाहर निकल आई. कुछ सवारों ने रानी का पीछा किया. निर्दय होकर उन पर अंधाधुंध गोलियां बरसाई गई. एक गोली रानी के पीठ में लगी. जिससे उनका शरीर शिथिल हो गया. इतने में गोरे समीप आ गए. रानी ने उन्हें उनकी करनी का फल चखा दिया.

महारानी लक्ष्मीबाई ने गोली मारने वाले को तुरंत मौत के घाट उतार दिया. वो जरा आगे बढ़ी ही थी कि दासी चिल्लाई. पीछे मुड़कर देखा तो एक गोरा दासी पर आक्रमण कर रहा था. उसे उसने फौरन काटा और आगे बढ़ी. महारानी ने कोई कसर बाकी न छोड़ी, परंतु दुर्भाग्य का क्या करें, एक नाले को देखकर घोड़ा अड़ गया. इतने में महारानी के एक गोली और लगी, इतने में एक सवार ने धोखे से वार कर दिया. जिससे महारानी का दाहिना हिस्सा छिन्न – भिन्न हो गया. उनकी आंख निकल आई.

इतने में एक निर्दयी ने छाती में किच्च भौंक दी. इतने भीषण प्रहारों पर भी रानी ने अपनी तलवारों से उन गोरों के दो – दो टुकड़े कर हीं दिए. उनके शरीर में अब कुछ शक्ति नहीं थी. वो धाराशाई हो रही थी. उन्होंने रामचंद्र राव को इशारा किया, वो नेत्रों से आंसू बहाता हुआ आया और रानी को एक कुटिया में ले गया. महारानी को प्यास लगी थी, गंगाजल पीकर अपने प्यारे पुत्र को प्यार किया फिर भारत की स्वतंत्रता को स्मरण करती हुई रानी ने अपने प्राण त्याग दिए. ऐसी देवियों को स्मरण करके भारत अपना मुखोज्जवल कर सकता है, जिसकी वीरता की कहानी आज भी कायरों में वीरता, आलसियों में स्फूर्ति तथा डरपोकों में निर्भयता भर रही है.


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