कविता : जिंदगी और जोंक


कविता : जिंदगी और जोंक
कविता : जिंदगी और जोंक

 

बेसरपैर के ख्वाबों का पुलिन्दा रहना, आसान नहीं इंसान का जिन्दा रहना

उससे मांगता भी तो क्या वो खुदा ही तो था , मुझसे देखा ना जाता उसका शर्मिन्दा रहना
अब दुआएँ अर्श (roof) से टकरा कर लौट आती हैं,  कुछ मुमकिन नही बन्दे का अब बन्दा रहना



ज़िन्दगी गोश्त थी मैं जोंक सा चिपका जैसे,  मेरा खून पीना था मेरा जिन्दा रहना



तेरे लम्स (touch) की पाकीज़गी अभी बदन मे बाकी है, क्या नहाये वह जिसे अच्छा लगे यूँ गन्दा रहना



तू उस शहर को छोड़ आई है इस दुनिया में,  जिस शहर का उम्र भर था हमे बाशिन्दा रहना

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