बड़ा इमामबाड़ा भूल भुलय्या, लखनऊ के रहस्य!


बड़ा इमामबाड़ा भूल भुलय्या, लखनऊ के रहस्य

कहते हैं कि एक बार अवध प्रांत जिसकी राजधानी लखनऊ हुआ करती थी. वहां पर भयावह अकाल पड़ा लगभग 5 साल से भी अधिक अवधि तक चले इस अकाल से लोगों के पास रोजगार तक नहीं रहा. जिससे भुखमरी की समस्या पैदा होने लगी तब अवध के तत्कालीन नवाब आसफ़ुद्दौला ने बड़े इमामबाड़े का निर्माण कराया. इस विशाल परिसर के निर्माण के पीछे कोई नया संरचना की प्रस्तुति या वास्तु कला के क्षेत्र में झंडे गाड़ना नहीं था. अपितु दुर्भिक्ष के शिकार लोगों को काम के बदले अनाज जैसे सरकारी योजना की भांति उनके जीवन यापन को सिर्फ बनाए रखना था.

कहा तो यह भी जाता है के आरंभ में इस विशाल इमामबाड़े के लिए किसी नक्शे के तहत काम तक नहीं किया गया और लोगों से मजदूरी कराकर उसके बदले उन्हें खाने और उनके परिवार के ले राशन दिया जाता था. यह काम काफी लंबे समय तक चलता रहा . दिनभर में जो किला तैयार होते थे रात की अँधेरे में उन्हें फिर से तोड़ने का काम किया जाता था. दिन के उजाले में निर्माण का काम साधारण लोगों से किया जाता था जबकि रात में नगर के गणमान्य व्यक्ति धीमी रोशनी में उन्हें जमीनदोस्त करने का जिम्मा उठाते थे. अकाल पीड़ित ऐसे तमाम लोग जिन्हें रोजी रोटी मुहैया नहीं हो रही थी बिना किसी भेदभाव के इस काम में लग जाते थे और उन्हें समान रूप से पारिश्रमिक दिए जाने की व्यवस्था थी.

आज भी आप बड़े इमामबाड़े के भ्रमण के लिए जाएंगे तो गाइड आपको यही बताएंगे कि जिसको ना दे मौला उसको दे आसिफ उद्दौला. लेकिन यह भी जानना जरूरी है कि इस मुहाबरे का पता चलने पर नवाब साहब ने क्या कहा उनका कहना था जिसको न दे मौला उसको क्या दे आसफउद्दौला अर्थात यह सब मात्र ईश्वर की ही देन है यदि उन्होंने मुझे इस लायक नहीं बनाता तो जनता की सेवा कैसे कर पाते . उस सर्वोत्तम प्रभु सत्ता के सामने उसकी कोई हैसियत नहीं.

सत्य यह है कि अपने सलाहकार के परामर्श से आसफउद्दौला ने सुनियोजित तरीके से बड़े इमामबाड़े परिषद निर्माण कराया उसमे सबसे पहले शाही बाग और पंच महल का निर्माण करवाया, इसका निर्माण इसलिए जरूरी था कि भवनों के निर्माण के लिए पानी के स्रोत की भरपूर आवश्यकता थी. यह एक बेहतर विकल्प तालाब के रूप में और स्वयं में एक अद्भुत संरचना है. जिसका सीधा लिंक निकट की प्रवाहित गोमती नदी से है. यानी आप यूं समझिए अगर गोमती नदी में तूफान आता है तो यह बावली तीन मंजिल तक दुब जाती है. अगर गोमती नदी का जल स्तर काम होता या नदी सुख जाती है तोह बावली का जल स्तर भी काम हो जाता है. यहाँ पर आपको तीसरी मंजिल से नीचे जाने की अनुमति नहीं है अगर कभी भी गोमती नदी में तूफान आ गया तो यह सारी मंजिले दुब जाएंगे.

बड़ा इमामबाड़ा bhool bhulaiyaa लखनऊ के रहस्य

इसके इमामबाड़े का निर्माण सन 1786 में आरंभ करवाया था जो सन 1791 तक चला. मुख्य परिसर में बना विशाल गुंबदनुमा हॉल 50 मीटर लंबा और 14 मीटर ऊंचा है यह एक ऐसी इमारत कि इसे बनाने में कोई भी लकड़ी और पिलर का इस्तेमाल नहीं हुआ, अनुमान है की इसे बनाने में उस जमाने में पांच लाख रुपए की लागत आई थी. यही नहीं इस इमारत के पूरा होने के बाद भी नवाब हर साल इनके साज सज्जा पर ही 5 से ६ लाख रुपए सालाना खर्च करते थे . इसमें विश्व प्रसिद्ध कवियों को बुलाकर उनसे कविता सुनते थे . इस इमामबाड़े में एक खूबसूरत मस्जिद भी है जहां गैर मुस्लिम लोगों को प्रवेश की अनुमति नहीं. कहते हैं कि खुदा की बंदगी के लिए मस्जिद बनाने की सोची परिमाण स्वरुप यह बेहतर मस्जिद बनकर तैयार हुई. मस्जिद परिसर के आंगन में तो उची मीनारें हैं जो इसकी भव्यता में चार चांद लगाते हैं. इसके बनने के बाद में इमामबाड़े के मुख्य भवन के निर्माण का कार्यक्रम प्रारंभ हुआ. वास्तुशिल्प के लिहाज से उस दौर की इमारतों में शीर्ष पर हुआ करती थी. कहते हैं इसका सेंट्रल हॉल दुनिया में सबसे बड़ा गुंबदकार छत वाला हाल है जिसकी आंतरिक सज्जा में सिर्फ गलियारों को छोड़ दे तो और कहीं भी लकड़ी का इस्तेमाल नहीं हुआ है कहा जाता है कि नवाब साहब इसका इस्तेमाल अपने दरबार की तरह से करते थे. जहां जनता की समस्याएं सुनी जाती थी अब इसका इस्तेमाल शिया मुसलमान नवाज़ अजादारी के लिए करते हैं.

इमामबाड़ा की वास्तुकला मुगल शैली को प्रदर्शित करती है जो पाकिस्तान में लाहौर की बादशाही मस्जिद से काफी मिलती जुलती है और इसे दुनिया के पांच में सबसे बड़ी मस्जिद का दर्जा दिया गया है. इसके डिजाइन की मुख्य विशेषता यह है कि इसमें कहीं भी लोहे का इस्तेमाल नहीं किया गया है और ना ही किसी यूरोपीय शैली का वास्तु कला को शामिल किया गया है. इस इमारत का मुख्य हॉल बहुत बड़ा है जहां छत पर कोई भी सपोर्ट नहीं लगाया गया.

बड़ा इमामबाड़ा को यहां की भूलभुलैया के लिए ही जाना जाता है जहां कई भयानक रास्ते हैं जो एक दूसरे से जुड़े हुए हैं जिन में कुल 869 एक से ( सामान ) दरवाजे है तथा लगभग 1000 रास्ते हैं. यह माना जाता है कि यहां पर एक लंबा सुरंगनुमा रास्ता भी है जो गोमती नदी की ओर जाता था. वर्तमान में इस रास्ते को बंद कर दिया गया है इस के नीचे कई भूमिगत रास्ते हैं जिन्हें भी अब बंद कर दिया गया है. मुख्य संरचना टेढ़े-मेढ़े रास्ते का एक ऐसा जाल है कि आम आदमी इस भूल भुलय्या में फस कर रह जाता है. इस की दीवारों के भी कुछ अलग की संरचना है. कई दीवार इस तरह से खोखली बनाई गई है कि एक कोने पर खड़े व्यक्ति यदि कोई बात करता है तो दूसरे छोर पर खड़े व्यक्ति को स्पष्ट सुनाई देती है. यहां के गाइड आपको अपनी बात साबित करने के लिए एक कोने पर खड़े होकर माचिस की तीली जिला कर दिखाएंगे, जिसके आवाज सश… को आप दूर खड़े छोड़ पर भी सुन सकते हैं. दीवारों के भी कान होते हैं मुहावरा भी लगता है इसकी शुरुवात यही से हुई होगी 🙂


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