ब्राह्मण होकर भी भगवान परशुराम क्षत्रिय स्वभाव के क्यों थे ?


ब्राह्मण होकर भी भगवान परशुराम क्षत्रिय स्वभाव के क्यों थे ?
ब्राह्मण होकर भी भगवान परशुराम क्षत्रिय स्वभाव के क्यों थे ?

दोस्तों आज हम अपने इस आर्टिकल में यह बात करने वाले है, कि क्या भगवान परशुराम क्षत्रिय थे और यदि वे क्षत्रिय नहीं थे तो उन्होंने 21 बार क्षत्रियों का विनाश करके पूरी पृथ्वी को कैसे जीता लिया था. दोस्तों भगवान परशुराम जी का यह रहस्य जानने के लिए आज हम अपने इस आर्टिकल में भगवान् परशुराम के जन्म के बारे में कुछ बातें जानते हैं.

Brahman hokar bhi bhagwan parshuram kshatriya swabhav ke kyon the 

दोस्तों, आप लोग यह तो जानते ही होंगे कि भगवान परशुराम परमपिता ब्रह्मा जी के पुत्र महर्षि भृगु के वंशज थे. महर्षि भृगु के पुत्र थे महर्षि ऋचीक. दोस्तों महर्षि ऋचीक जब विवाह के योग्य हुए तो वह कनेकुंज यानी कन्नोज के राजा गाधि के पास गए और उनसे अपने लिए उनकी बेटी सत्यवती का हाथ मांग लिया.

सत्यवती अपने माता पिता की अकेली संतान थी. इसके बाद भी राजा गाधि महर्षि ऋचीक के श्राप के डर से उनकी बात नहीं ठुकरा पाए. और उन्होंने अपनी इकलौती पुत्री सत्यवती का विवाह महर्षि ऋचीक के साथ कर दिया.

दोस्तों, एक दिन महर्षि भृगु अपने पुत्र ऋचीक के आश्रम में आए तो वहां अपनी पुत्रवधु सत्यवती को देख बड़े प्रसन्न हुए. उन्होंने सत्यवती से कहा, की वह उनसे कोई भी वर मांग ले. अपने ससुर को इस तरह प्रसन्न देख सत्यवती को अपने माता पिता की याद आ गयी. जिनके पास, उनका कोई वंशज नहीं था. इसलिए सत्यवती ने अपने ससुर महर्षि भृगु से अपने और अपनी माता दोनों के लिए पुत्र प्राप्ति का वर मांग लिया.

तब महर्षि भृगु ने सत्यवती को दो अलग-अलग फल देते हुए कहा, कि इसमें से एक फल अपनी माता को खिला देना और दूसरा फल तुम खा लेना. इसके साथ ही महर्षि भृगु ने सत्यवती को गूलर के पेड़ तथा अपनी माता को पीपल के पेड़ का आलिंगन करने को कहा.

दोस्तों जब सत्यवती महर्षि भृगु के दिए हुए फलों को लेकर अपनी मां के पास गई तो उसकी मां ने उन फलों को बदल दिया था. वह सत्यवती का फल खा गयी थी और सत्यवती को अपना वाला फल खिला दिया था. इसके बाद उसकी मां ने सत्यवती को पीपल के पेड़ के साथ आलिंगन करवाया और खुद गूलर के पेड़ के साथ आलिंगन किया.

कुछ दिनों बाद जब महर्षि भृगु वापस अपने पुत्र के आश्रम में आए तो सत्यवती को देखते ही उन्हें सारे उलटफेर का पता चल गया. तब उन्होंने सत्यवती से कहा कि तुम्हारी माता ने तुम्हारे साथ धोखा किया है. उसने तुम्हें जिस फल को खिलाया है और जिस पेड़ का आलिंगन करवाया है, उसके प्रभाव से तुम्हारा पुत्र ब्राह्मण होकर भी क्षत्रियों जैसे आचरण वाला होगा और तुम्हारी माता का पुत्र क्षत्रिय होकर भी ब्राह्मणों जैसे आचरण वाला होगा.

दोस्तों, अपने ससुर की यह बात सुनकर सत्यवती बड़ी चिंतित हो गयी और ससुर महर्षि भृगु से विनती करती हुई बोली, की भगवन मैं एक ब्राह्मण की पत्नी हूं. मेरे गर्भ से क्षत्रिय आचरण वाला पुत्र कैसे जन्म ले सकता है. आप मुझ पर कृपा करके कुछ ऐसा करिए कि मेरा पुत्र ऐसा ना हो. मेरा पुत्र ब्राह्मण आचरण वाला ही हो.

दोस्तों अपनी पुत्रवधु की बिनती सुन करना महर्षि भृगु को उस पर दया आ गई. तब उन्होंने सत्यवती को आशीर्वाद देते हुए कहा कि ठीक है, तुम्हारा पुत्र ब्राह्मण आचरण वाला ही होगा. परंतु तुम्हारा एक पौत्र अवश्य ही क्षत्रिय आचरण वाला होगा.

महर्षि भृगु के आशीर्वाद से सत्यवती के गर्भ से समय आने पर जमदग्नि मुनि का जन्म हुआ, जो पूर्णतः ब्राह्मण आचरण वाले ऋषि थे. दोस्तों जब जमदग्नि मुनि ने अपनी शिक्षा पूरी कर ली तब वे राजा प्रसेनजीत के पास गए और उनकी पुत्री रेणुका का हाथ अपने लिए मांग लिया. तब राजा प्रसेनजीत ख़ुशी ख़ुशी अपनी पुत्री रेणुका का विवाह जमदग्नि मुनि के साथ कर दिया.

रेणुका ने जमदग्नि मुनि के पांच पुत्रों को जन्म दिया था. जिसमें उनके सबसे छोटे पुत्र भगवान परशुराम थे वे अपनी दादी सत्यवती के उस भूल के कारण क्षत्रिय आचरण वाले थे.


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