महान स्वतंत्रता सेनानी अमर शहीद, राजगुरु !


महान स्वतंत्रता सेनानी अमर शहीद, राजगुरु !
महान स्वतंत्रता सेनानी अमर शहीद, राजगुरु !

महान स्वतंत्रता सेनानी अमर शहीद, राजगुरु : Mahan Swatantrata Senani Amar Shahid Rajguru

देश को आजाद कराने में अपने जीवन की आहुति देने वालों में क्रांतिकारी शहीद राजगुरु को कौन भूल सकता है. शहीद राजगुरु ऐसे हीं शहीदों में गिने नहीं जाते. वो सदैव बलिदान के लिए तथा राष्ट्रीय स्वाभिमान के लिए अपने प्राणों का उत्सर्ग करने के लिए हमेशा प्रस्तुत रहते थे. वो ऐसे महान स्वतंत्रता सेनानी थे, जो लाला लाजपत राय पर लाठीचार्ज के कारण उनकी हत्या के लिए उत्तरदाई पुलिस सुपरिटेंडेंट मिस्टर स्कॉट से बदला लेने के लिए उतावले थे.

जब क्रांतिकारी दल हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन की सभा हो रही थी और सभा में एक्शन पर विचार हो रहा था. तब स्कॉट किसी भी स्थिति में बच ना जाए इसके लिए निर्णय हुआ कि उसे तीन व्यक्ति गोली मारेंगे. यदि पहले का निशाना चूका तो दूसरा, यदि फिर भी बच गया तो तीसरा व्यक्ति उसे समाप्त कर देगा. तभी राजगुरु ने जिद ठान ली.

“पहली गोली मैं मारूंगा” इसी सभा में निश्चय किया गया की जय गोपाल कई दिन पहले से स्कॉट पर उसके कार्यालय आने व जाने का समय व अन्य गतिविधियों पर दृष्टि रखेंगे. एक्शन वाले दिन जय गोपाल के हीं संकेत पर पहले राजगुरु उसके बाद भगत सिंह गोली दागेंगे.

तदनुसार 17 दिसंबर 1928 को एक्शन हेतु सभी अपनी-अपनी जगह स्थित हो गए. जैसे हीं सांडर्स (d.s.p) कार्यालय से बाहर अपनी मोटरसाइकिल पर सवार हुआ, राजगुरु ने जय गोपाल से संकेत मांगा. जय गोपाल ने संकेत का उत्तर हाथ हिलाकर “नहीं” दे दिया कि यह स्कॉट नहीं है. लेकिन राजगुरु ने समझा अभी रुक कर गोली मारने का संकेत है. पहली गोली स्वयं मारने के उतावलेपन में राजगुरु ने गोली चला दी. तुरंत हीं राजगुरु और भगत सिंह की गोलियों की बौछार से स्कॉट की जगह (डी. एस. पी.) जे. पी. सांडर्स मारा गया. ये सभी अपने बचाव के लिए D.A.V. कॉलेज की तरफ भागे.

पुलिस इंस्पेक्टर फर्न ने राजगुरु का पीछा किया. राजगुरु ने पूरी ताकत से फर्न को इतनी जोर से धक्का मारा कि वह दूर पृथ्वी पर धूल चाटने लगा. फर्न उठा और पुनः राजगुरु की ओर दौड़ा तभी भगत सिंह ने राजगुरु पर खतरा देखकर फर्न को गोली मार दी. लेकिन फर्न ने पृथ्वी पर लेट कर अपना बचाव कर लिया. और पुनः राजगुरु को पकड़ने का प्रयास छोड़ दिया.

ये लोग शीघ्र हीं D.A.V. कॉलेज से अपनी साइकिलों से अपने गंतव्य स्थान की ओर भाग लिए. इनकी साइकिल में से एक साइकिल कोई उठा ले गया. अतः राजगुरु और भगत सिंह को एक हीं साइकिल पर सवार हो कर भागना पड़ा.

इस सांडर्स हत्याकांड से सारे देश में तहलका मच गया. क्रांतिकारियों ने रातों-रात लाहौर की दीवारों पर पोस्टर चिपका दिए. इसमें सांडर्स की हत्या का स्वयं को उत्तरदाई दर्शाते हुए इस साहसिक कार्य को अपराध के स्थान पर देशभक्ति का कार्य दर्शाया गया था. इसका सार था हमने जे.पी. सांडर्स का वध करके भारत के महान राष्ट्रीय अपमान का प्रतिशोध ले लिया है.

इस पोस्टर पर अंत में हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के कमांडर बलराज के हस्ताक्षर थे.

देश के लोगों ने जब सुना कि उनके हृदय सम्राट लाला लाजपत राय के हत्यारे को भगत सिंह की टोली ने मार गिराया है तो, भारतीयों ने भगत सिंह और उनके साथियों के प्रति मन – हीं – मन जो कृतज्ञता का भाव अनुभव किया उसका वर्णन नहीं किया जा सकता.

अब सारा देश चाहता था कि भगत सिंह और उनके साथी सरकार के पंजों से सुरक्षित रहे. इस कार्य को करने के लिए भगवती चरण बोहरा की धर्म पत्नी दुर्गा भाभी आगे आईं. सभी इन्हें दुर्गा भाभी के नाम से हीं संबोधित करते थे. समस्त लाहौर की नाकेबंदी कर दी गई थी. चप्पे-चप्पे पर पुलिस तैनात थी. पुलिस को विश्वास था कि हत्यारे लाहौर में हीं छिपे हैं. रात भर गिरफ्तारियों का दौर चलता रहा. पुलिस की आंखों में धूल झोंकने के लिए भगत सिंह ने अपनी दाढ़ी और मूंछें सफाचट करा ली. सिर पर हट लगाया. अंग्रेजी भेश बना लिया. दुर्गा भाभी ने अपने 2 वर्षीय पुत्र को भी वैसे हीं अंग्रेज बच्चे के वस्त्र पहना दिए. व स्वयं भी अंग्रेज मेम बन गईं. राजगुरु इनके नौकर बने.

इस प्रकार ये यूरोपियन परिवार के रूप में पुलिस की निगाहों से बचते हुए सकुशल कोलकाता पहुंच गए. कोलकाता में पूर्व योजनानुसार भगवती चरण वोहरा इस जोड़े को लेने पहले हीं स्टेशन पर आए हुए थे. इनके ठहरने का प्रबंध महिला क्रांतिकारी सुशीला दीदी के यहां किया गया था. इस प्रकार दुर्गा भाभी इन्हें कलकत्ता पहुंचा कर स्वयम लाहौर वापस आ गईं. शीर्ष क्रांतिकारी भी चंद्रशेखर आजाद के साथ साधु वेश में लाहौर से सुरक्षित बाहर निकल गए. लाहौर पुलिस हाथ मलती हीं रह गई.

सांडर्स की हत्या के बाद भी यह क्रांतिकारी दल शांत नहीं बैठा. एक तरफ सरकार इन्हें गिरफ्तार करने के लिए बेचैन थी, दूसरी तरफ यह दल बमों की ऊंची आवाज से सरकार के कानों को खोलने के लिए बेचैन हो रहा था. जब एसेंबली में सार्वजनिक सुरक्षा विधेयक पास ना हो सका तो सरकार ने इस विधेयक के लिए सार्वजनिक सुरक्षा अध्यादेश 1929 की घोषणा करने का निश्चय किया. ये विधेयक भारतीयों के मूल अधिकारों पर कुठाराघात था. अतः एसोसिएशन की सभा में निश्चय किया गया कि 8 अप्रैल 1929 को असेंबली में अध्यादेश की घोषणा से पूर्व हीं बम फेंककर धमाका किया जाए.

हर कार्य के लिए दल के सभी सदस्यों ने भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त के नामों की स्वीकृति प्रदान कर दी. लेकिन राजगुरू चाहते थे कि बम फेंकने वालों में उनका अपना नाम अवश्य होना चाहिए. देश पर प्राण कुर्बान करने की राजगुरु के हृदय में इतनी तड़प थी कि देश पर बलिदान होने का अवसर प्राप्त कराने वाले खतरे के हर कार्य में सर्वप्रथम रहना चाहते थे. अतः दुखी मन से राजगुरु तुरंत चंद्रशेखर आजाद के पास झांसी पहुंचे और बटुकेश्वर दत्त के स्थान पर अपना नाम असेंबली में बम फेंकने वालों में सम्मिलित करने के लिए जोर डाला.

किंतु उनकी यह मांग कुछ कारणों से स्वीकार नहीं की गई. इसके बाद भी राजगुरु ऐसे साहसिक कार्य की खोज में रहते थे कि जिससे सबसे पहले उन्हें देश पर बलिदान होने का गौरव प्राप्त हो.

एक बार राजगुरु अपने दल के सदस्यों के लिए खाना बना रहे थे. खाना बनाते समय इन्हें एक विचित्र हीं बात सूझी. राजगुरु ने संडासी आग में तपने के लिए रख दी. जब संडासी आग में तपकर लाल हो गई, तब उसे अपने वक्ष स्थल पर लगाकर तीन जगह निशान बना डाले. भगत सिंह ने इनके हाथ से संडासी छीनते हुए पूछा “यह क्या है?”

राजगुरु बोले ‘देख रहा था कि पुलिस द्वारा टॉर्चर किए जाने पर कहीं घबरा तो नहीं जाउंगा.’ ये राजगुरु के साहस का ज्वलंत उदाहरण था, जिसे देखकर इनके साथी आश्चर्य में थे.

भारत माता के इस महान सपूत राजगुरु का जन्म सन् 1908 में खेड़, पुणे (महाराष्ट्र) में हुआ था. इनके पिता श्री हरि राजगुरु भी भारत मां को गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराने हेतु क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय थे. अतः पिता हीं इनकी प्रेरणा के स्रोत बने.

राजगुरु का पूरा नाम शिवराय राजगुरु था. इनका पार्टी में रघुनाथ नाम रखा हुआ था. इसी प्रकार भगत सिंह को रंजीत के नाम से पुकारा जाता था.

सरकार ने लाहौर षड्यंत्र केस में चंद्रशेखर आजाद को छोड़कर लगभग सभी अभियुक्तों को पकड़ लिया. राजगुरु भी पुणे की एक मोटर गैराज से गिरफ्तार कर लिए गए. इन सभी पर मुकदमा चलाया गया.

कारागार में इसी समय क्रांतिकारियों ने भूख हड़ताल शुरु कर दी. भूख हड़तालियों की समस्या के समाधान हेतु सरकार ने समिति का गठन कर दिया. इस समिति ने भूख हड़ताल के कारण चिंताजनक स्थिति देखकर यतींद्रनाथ को तुरंत रिहा करने की सलाह दी. लेकिन सरकार इतनी कुरुर थी की उन्हें रिहा नहीं किया गया.

अंततः 63 दिन की भूख हड़ताल के बाद जेल में ही यतींद्रनाथ दास ने 13 सितंबर 1929 को दम तोड़ दिया. लाहौर षड्यंत्र केस का निर्णय जेल के अंदर हीं अदालत में सुनाया गया. इस केस में भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु तीनों को फांसी की सजा सुना दी गई.

इसी केस में किशोरीलाल, जयदेव कपूर, महावीर सिंह, विजय कुमार सिन्हा, शिव वर्मा, गया प्रसाद तथा कमल नाथ तिवारी को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई.

कुंदन लाल को 7 वर्ष, प्रेम दत्त को 5 वर्ष की सजा सुनाई गई. चंद्रशेखर आजाद पकड़े नहीं जा सके.

जिस समय राजगुरु को फांसी की सजा सुनाई गई तो उनकी तो मानो मन की मुराद पूरी हो गई. उन्होंने सजा का आदेश सुनते ही इंकलाब जिंदाबाद तथा वंदेमातरम् के नारों से जेल को गुंजित कर दिया. फांसी की सजा सुनाए जाने के बाद राजगुरु अपार आनंद का अनुभव कर रहे थे. उन्हें प्रसन्नता थी कि देश पर कुर्बान होने की जो तड़प वे मन में संजोए थे वो पूरी होने जा रही है.

एक क्रांतिकारी देश पर मर – मिटना अपना एक सुनहरा सपना, एक सौभाग्य मानता है. राजगुरु भी ऐसे हीं थे. वो अपनी मातृभूमि पर मर मिटने के हीं सपने देखा करते थे.

वो दिन भी आ गया जब मातृभूमि के लिए राजगुरू को बलिदान का सौभाग्यपूर्ण अवसर प्राप्त हो गया. वो दिन था 23 मार्च सन 1931.

इसी 23 मार्च 1931 की शाम भगत सिंह, सुखदेव तथा राजगुरु को फांसी पर लटका दिया गया. तीनों को लाहौर की सेंट्रल जेल में फांसी दी गई. सरकार इनकी फांसी से पूर्व बहुत घबराई हुई तथा बेचैन थी. सारा देश बौखलाया हुआ था. अतः इनके शव भी विप्लव के भय से इनके परिवार को नहीं दिए गए. रात्रि में चुपचाप हुसैनी वाला पुल के निकट शव भस्मीभूत कर दिए गए.

जब अगले दिन इस करतूत का जनता को पता चला तो हुसैनी वाला पुल के पास की भूमि तो मानों तीर्थ बन गई. जनता का ज्वार उमड़-उमड़ कर उधर जाता और उस भूमि की राख को माथे पर लगा अपने को धन्य समझता.

राजगुरु वास्तव में आज भी देशभक्तों के हृदय में जीवित हैं. उनके बलिदान की गाथा भारत के देशभक्त नागरिकों के हृदय में अमिट रुप से अंकित है. और रहेगी. क्योंकि राजगुरु जैसे बलिदानियों के कारण हीं आज ये देश स्वतंत्र है.


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