मैडम कामा : स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अग्रणी स्थान रखती है !


मैडम कामा : स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अग्रणी स्थान रखती है !
मैडम कामा : स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अग्रणी स्थान रखती है !

मैडम कामा : स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अग्रणी स्थान रखती है : Madam Cama Ek Mahan Swatantrata Senani

वीर महिलाओं में जो स्वतंत्रता संग्राम में अपनी वीरता के कारण इतिहास में अग्रणी स्थान रखती है, उनमें भीखई रुस्तम कामा का नाम प्रसिद्ध है.

मैडम कामा एक परिचय : Madam Cama Ek Jivan Parichay

मैडम कामा का जन्म 24 सितंबर 1861 को मुंबई में हुआ था. मुंबई के एक सबसे धनी परिवार में वकील रुस्तम जी कामा के साथ इनका विवाह हुआ, लेकिन वो स्वतंत्र विचारों की नारी थी, और नारी समाज तथा देश सेवा में अपना जीवन समर्पित करना चाहती थी. देशभक्ति के उमड़ते ज्वार को परिवार बंधन नहीं रोक सके. इंडियन नेशनल कांग्रेस के 1825 के प्रथम अधिवेशन में इन्हें 24 वर्ष की आयु में भाग लेने का अवसर प्राप्त हुआ. तभी इन्होंने भारत को विदेशी दास्तां से मुक्त कराने का निश्चय कर लिया.

एक बार इन्हें भयंकर रोग ने आ घेरा. अपने इलाज के लिए उन्हें लंदन जाना पड़ा. उनका इलाज तो हो गया लेकिन भारत की स्वतंत्रता के लिए लंदन से हीं संग्राम जारी रखने का निश्चय किया. लंदन के प्रमुख क्रांतिकारी श्यामजी कृष्ण वर्मा से इनका संपर्क हो चुका था. श्यामजी कृष्ण वर्मा ने लंदन में जनवरी 1905 में ‘इंडियन होमरूल सोसायटी’ की स्थापना की थी. लंदन में जो भारतीय आते थे, वह उनसे तुरंत संपर्क करते थे.

श्यामजी कृष्ण वर्मा ने भारतीय छात्रों के हित में ही ‘इंडियन हाउस’ खोला था. और यह छात्रावास हीं भारत की स्वतंत्रता के लिए गतिविधियों का केंद्र बना.

 

मैडम कामा का स्वतंत्रता संग्राम में योगदान : Madam Cama Ka Swatantrata Sangram Me Yogdan

मैडम कामा श्री वर्मा को सहयोग देने लगीं. यहां गुप्त रुप से बम व पिस्तौलें बनाने की विधि सिखाना, उन्हें चलाने का अभ्यास कराना और उसके बाद चुने हुए भारतीयों के माध्यम से इन शस्त्रों को भारत भेजने का कार्य मैडम कामा की हीं देख-रेख में हो रहा था.

मैडम भीखई जी कामा इंग्लैंड में ब्रिटिश सरकार द्वारा भारत की जनता पर किए जा रहे जुल्मों का सदैव अपने भाषणों में पर्दाफाश कर रही थी. लंदन के हाइड पार्क नामक स्थल पर उन्होंने जो भाषण दिया वह ऐतिहासिक था. उस भाषण में उन्होंने निहत्थे भारतीयों पर अंग्रेजी सरकार द्वारा बढरती जा रही बर्बरता, क्रूरता का पूरा चिट्ठा खोल कर रख दिया. तथा उसे ब्रिटेन की जनता के सम्मुख भी प्रस्तुत किया.

Madam Cama : मैडम कामा

भीखाजी कामा के इन भाषणों से इंग्लैंड की जनता की भी आंखें खुली. इस कारण ब्रिटिश सरकार को महसूस हुआ कि मैडम कामा उसके लिए खतरा बन सकती है. ये महसूस होते हीं ब्रिटिश सरकार मैडम कामा को गिरफ्तार करने की योजना बनाने लगी. परंतु मैडम कामा को भी खतरे का आभास हो गया. और वो ब्रिटिश सरकार को चकमा देकर पेरिस चली गईं.

इधर पेरिस में पहले से हीं उनके भारतीय क्रांतिकारी अपनी क्रांति की गतिविधियों को चला रहे थे. इन क्रांतिकारियों में वीर दामोदर सावरकर, लाला हरदयाल, मुकंद सरदेसाई, वीरेंद्र चट्टोपाध्याय आदि थे. जेनेवा से ‘वंदेमातरम्’ पत्र का संपादन हुआ. इस पत्र के माध्यम से एवं यूरोप का भ्रमण के दौरान अपने भाषणों से भारत में किए जा रहे अंग्रेजों के क्रूर अत्याचारों का इन्होंने खुलकर वर्णन किया. इन भाषणों से यूरोप में तहलका मच गया.

ब्रिटिश सरकार को अब यह भय सता रहा था, कि मैडम कामा कहीं भारत में प्रवेश न कर जाए. क्योंकि मैडम कामा के भाषणों से जनता पर प्रभाव पड़ता था. ऐसा प्रभाव मानो उन पर जादू सा हो गया हो. ब्रिटिश सरकार को आशंका थी कि मैडम कामा के भाषणों से भारतीय जनता में विद्रोह भड़क सकता है.

 

इन सभी कारणों से ब्रिटिश सरकार ने मैडम कामा के भारत प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया.

मैडम कामा ने फहराया था प्रथम राष्ट्रीय ध्वज, विदेशी धरती पर : Madam Cama Ne Videshi Dharti Par Pehla Jhanda ( Rashtriya Dwaj ) fahraya Tha

इधर स्टुटगार्ड जर्मनी में अगस्त 1907 को समाजवादी कांग्रेस का अधिवेशन हुआ. मैडम कामा इस अधिवेशन में भारत के प्रतिनिधि के रुप में सम्मिलित हुईं. इस अधिवेशन में सभी देशों के ध्वज लहरा रहे थे. इन्होंने इसमें यूनियन जैक की जगह भारत के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में वंदेमातरम लिखा तिरंगा ध्वज लहरा दिया. ध्वज पर 7 सितारे, कमल, सूर्य व अर्धचंद्र के चिन्ह भी अंकित थे. विदेशों में फहराया जाने वाला यह प्रथम राष्ट्रीय ध्वज था. बाद में यह झंडा गुजरात के समाजवादी नेता इंदुलाल याज्ञनिक अंग्रेजों से छुपा कर भारत ले आए. और आज भी यह झंडा पुणे में ‘मराठा’ तथा ‘केसरी’ समाचार पत्र के पुस्तकालय में सुरक्षित है.

मैडम कामा ने फहराया था प्रथम राष्ट्रीय ध्वज मैडम कामा ने फहराया था प्रथम राष्ट्रीय ध्वज

देश के स्वाभिमान और स्वतंत्रता की दिशा में मैडम कामा ने सतत संघर्ष किया. देशभक्ति उनकी रग-रग में समाई हुई थी. उनकी इस देश भक्ति भावना का परिचय उनके प्रत्येक कार्य से मिलता है.

सन 1914 में प्रथम विश्व युद्ध का आरंभ हो गया. इनलैंड विश्व युद्ध में उलझा हुआ था मैडम कामा ने विचार किया कि ब्रिटिश सरकार से बदला लेने का अच्छा अवसर है. अतः उन्होंने भाषणों में घोषणा कर दी की, भारत इस युद्ध में यूरोप का साथ नहीं देगा. इस पर फ्रांस की सरकार तिलमिला उठी और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. 1914 में प्रथम विश्व युद्ध समाप्त होने पर हीं इन्हें कारागार से मुक्ति मिल सकी.

 

मैडम कामा की मातृभूमि के दर्शन की लालसा : Madam Cama Ki Matribhumi Ke Darshan Ki Lalsha

निरंतर कारावास में रहते-रहते मैडम कामा का स्वास्थ्य धीरे – धीरे गिरने लगा था. संघर्ष करते – करते वो थक भी गई थीं. निरंतर अपने देश से दूर रहीं, इसलिए उनके मन में अपनी मातृभूमि के दर्शन की लालसा जागृत हुई. और निरंतर प्रबल होती चली गई. अतः उन्होंने ब्रिटिश सरकार से बात की और सरकार की कुछ शर्तों पर स्वदेश वापसी कि इन्होंने अनुमति ले ली.

मैडम कामा दिसंबर 1935 को अपने प्यारे देश भारत लौट आईं. परंतु भारत आने पर भी मैडम कामा स्वस्थ ना हो पाईं. स्वास्थ्य निरंतर गिरता हीं जा रहा था. चिकित्सा के उपाय व्यर्थ हो रहे थे. परंतु वो अपने आत्मबल से स्वयं हीं स्थित खड़ी रहीं. यह सिलसिला निरंतर 8 माह तक चला. थकान तथा रोग के कारण उनके शरीर की प्रतिरोधक क्षमता घटती गई.

और फिर अंततः भारत आने के 8 महीने बाद 16 अगस्त 1936 को मैडम कामा का शरीर पंचतत्व में विलीन हो गया. देश की स्वतंत्रता व स्वाभिमान के लिए संघर्ष करने वाली इस वीरांगना का नाम इतिहास में अमर हो गया.

 


Comments 0

Your email address will not be published. Required fields are marked *

log in

reset password

Back to
log in