सच्ची कहानी : मालिक के वियोग में ‘बसहा’ ने त्यागे प्राण!


सच्ची कहानी : मालिक के वियोग में 'बसहा' ने त्यागे प्राण!
सच्ची कहानी : मालिक के वियोग में 'बसहा' ने त्यागे प्राण!

मालिक के वियोग में ‘बसहा’ ने त्यागे प्राण! : Malik ke viyog me basha ne tyage pran

दोस्तों आज तक आपने कई किस्से-कहानियां सुने होंगे, जिसने आपके दिल को झकझोर कर रख दिया होगा. आज हम आपको ऐसी हीं एक सच्ची मार्मिक कहानी बता रहे हैं जिसे जानकर आप अपने आंसू को बहने से नहीं रोक पाएंगे.

ये सच्ची कहानी है बिहार के सहरसा जिले के गांव जम्हरा की. कहते हैं इस गांव में कुछ समय पहले रणविजय सिंह नाम के एक व्यक्ति रहते थे, जो बहुत हीं दयालु किस्म के धार्मिक इंसान थे. उन्होंने अपने दरवाजे पर कुछ गाय-बैल पाल रखे थे. एक बार विजय सिंह ने एक बसहा को शरीर पर त्रिशूल का निशान देकर आजाद कर दिया.

हममें से ज्यादातर लोग शायद इस बात से वाकिफ होंगे कि किसी बसहा के शरीर पर अगर त्रिशूल का निशान देकर आज़ाद कर दिया जाता है, तो उसे लोग ‘नंदी’ रूप में मानने लगते हैं. इसलिए भगवान के इस रूप को कोई कुछ नहीं कहता.

उस बसहा को आजाद करने के लगभग 4 साल बाद विजय सिंह की किडनी की बीमारी के कारण मृत्यु हो गई. कहते हैं उनके मौत के ठीक दूसरे दिन वह बसहा ना जाने कहां से उनके दरबार से पर आकर बैठ गया. और लगातार उसकी आंखों से मुसलाधार आंसू निकल रहे थे. वो ना तो कुछ खाता था ना पीता था. बस रोता हीं रहता था.

जिस दिन विजय सिंह के श्राद्ध का क्रियाकर्म संपन्न हुआ, उसी दिन उनके दरवाजे पर हीं उस बसहा ने अपने प्राण त्याग दिए.

जल्द हीं दूर-दूर तक ये खबर आग की तरह फैल गई. और विजय सिंह के दरवाजे पर लोगों की भीड़ इकट्ठा होने लगी. हर किसी की आंखों से आंसू निकल जाते, जब बसहा कि ये मार्मिक कहानी उन्हें पता चलती.

जहां रणविजय सिंह का अंतिम संस्कार किया गया था, ठीक उसी बगल में बसहा को भी लोगों ने दफना दिया. आज भी लोगों के दिलों को उस बसहा की याद मार्मिक कर जाती है.


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