सच्ची कहानी : अनोखा न्याय, गुरु स्वामी रामदास जी


सच्ची कहानी : अनोखा न्याय, गुरु स्वामी रामदास जी
सच्ची कहानी : अनोखा न्याय, गुरु स्वामी रामदास जी

Sachi kahani anokha nyay – Enlightening and inspirational Hindi Story : एक साधु अपने शिष्य के साथ चले जा रहे थे. रास्ते में गांव के कुछ लोग भी उनके साथ हो लिए. खेतों से गुजरते समय गन्ने की एक खेत से उन लोगों ने कुछ गन्ने तोड़ लिए. साधु को इसका पता न चला, क्योंकि वह तो सबसे आगे चल रहे थे. अन्यथा बिना पूछे किसी का एक तिनका भी उठाना वे अपराध मानते थे.

जब गन्ने के खेत के स्वामी ने यह देखा तो वह दौड़ता हुआ आया. सभी लोग डर कर भाग गये पर संत वही खड़े रहे. शिष्य ने कहा – गुरुजी इस खेत का स्वामी आ रहा है, वह मूर्ख हम निरपराध को भी पीट सकता है. अतः अच्छा है, हम भी भाग चलें.

साधु ने उत्तर दिया – अगर उन्होंने अपराध किया है तो उनके साथ हमारी भी गलती थी क्योंकि हमने उन्हें समझाया नहीं. हम महात्मा होकर भी उन को नहीं समझ पाए यह तो हमारा ही दोष है. इतने में खेत का रखवाला वहां पहुंच गया. उसने सोचा, जरूर इस सन्यासी ने ही लोगों को भगाया है. वह डंडा लेकर उन दोनों पर पिल पड़ा. काफी देर तक पीटने के बाद, वह गाली देता हुआ चला गया.

लहूलुहान साधु एवं शिष्य शिवाजी के पास पहुंचे. क्योंकि उन दिनों वहां शिवाजी का राज था. शिवाजी साधु को देखते ही चरणों में गिर पड़े. यह साधु और कोई नहीं उनके गुरु समर्थ रामदास थे. शिवाजी ने गुरुजी के शरीर पर मार के चिन्ह देखे तो उन्होंने उनसे पूछताछ की. रामदास जी चुप रहे. उन्होंने मुंह से एक शब्द भी न बोला, पर शिवाजी जैसे निपुण राजा के लिए अपराधी को ढूंढना कोई कठिन कार्य नहीं था.

उन्होंने सैनिकों को आदेश दिया कि तुरंत अपराधी को पकड़ कर लाओ. कुछ समय बाद ही मराठी सैनिक खेत के स्वामी को पकड़ लाए. किसान ने जब शिवाजी के पास उन साधुओं को देखा तो वो डर से कांपने लगा. शिवाजी ने स्वामी जी से पूछा इस अपराधी को क्या सजा दे.

रामदास जी बोले – शिवा ! यदि मुझे प्रसन्न करना चाहते हो तो वह गन्ने का खेत इसे पुरस्कार में दे दो. इससे उसका कोई कर ना लेना.

शिवाजी गुरु जी की इस बात से बहुत हैरान हुए पर गुरु जी की आज्ञा शिरोधार्य कर किसान को मुक्त कर दिया.

गुरु जी ने मुस्कुराते हुए कहा – राजा सभी के लिए समान होता है, शिवा ! चाहे गुरु हो या प्रजा.

शिवाजी को जब कभी कोई अड़चन आती तो वे स्वामी जी के पास पहुंच जाते और उसका उपाय पूछते.

इसी तरह एक बार शिवाजी ने गुरु जी से कहा – महाराज इस राज्य कार्य में मेरा मन नहीं लग रहा. कृपया, कोई उपाय बताएं. मैं संन्यास लेना चाहता हूं.

यह सुनकर स्वामी जी बहुत बिगड़े, कहने लगे तुम छत्रिय हो और तुम्हारा यही धर्म है कि गौ, ब्राह्मण एवं धर्म की मलेच्छों से रक्षा करो.

गुरु जी का आदेश मानकर शिवाजी ने अपना मन पुनः राज कार्यों में लगा लिया. स्वामी जी भिक्षा मांग कर ही अपना पेट पालते थे. एक बार जब शिवाजी सतारा में ठहरे हुए थे. स्वामी जी जय जय रघुवीर करते हुए उनके दरवाजे पर पहुंच गए. शिवाजी ने उन्हें प्रणाम किया और एक कागज पर कुछ लिखकर उनके भिक्षापात्र में डाल दिया. स्वामी जी ने कहा – शिवा दो मुट्ठी अनाज देते तो अच्छा था. पर जब कागज निकालकर पढ़ा तो देखा शिवाजी ने सारा राज्य ही दान में दे दिया है.

स्वामी जी ने समझाया, शिवा राज्य करना हम सन्यासियों का नहीं अपितु क्षत्रियों का कार्य है. शिवाजी अपनी बात पर अड़े रहे. तब स्वामी जी ने कहा अच्छा यह राज्य मेरा ही सही तुम मेरी मंत्री बन कर इसे चलाओ. उसी दिन से शिवाजी स्वयं को गुरु का नौकर समझ कर कार्य करने लगे. चुकी गुरु जी भगवा वस्त्र पहनते थे अतः शिवाजी ने इसी रंग का झंडा बनवाया था ताकि सभी लोग समझे कि राज्य श्री समर्थ का ही है.

धन्य है शिवाजी ! जिन्हें स्वामी रामदास जी जैसे गुरु मिले.


Comments 0

Your email address will not be published. Required fields are marked *

log in

reset password

Back to
log in