बापू की आत्मग्लानि गल गई : पिघल गई


घटना उस समय की है, जब बापू दिल्ली में भंगी कॉलोनी में रहा करते थे.

उनकी पोती मनु बेन ने ताजे आम का एक गिलास रस पीने के लिए दिया. गांधीजी ने पीने से पूर्व आम की खरीद की कीमत पूछी. उत्तर में पोती मनु ने जानकारी दी कि काम ढाई रूपए में खरीदे गए थे, जिसका रस एक गिलास तैयार हुआ था.

गांधीजी ने क्रुद्ध स्वर में कहा – मनु ! तूने यह क्या किया ? इतने महंगे आम लेने की जरूरत ही क्या थी ? बिना आम खाए भी मैं जीवित रह सकता था और रह सकता हूं. फिर मैं जीने के लिए, सांस को कायम रखने के लिए खाता हूं ना कि मैं खाने के लिए जीवित हूं. फिर, मनु तू तो जानती ही है कि अपना देश कितना गरीब है. देश में बहुत से लोग ऐसे हैं जो कई दिनों तक भूखे रह जाते हैं – एक रोटी का टुकड़ा भी प्राप्त नहीं होता है. ऐसी हालत में मैं एक गिलास आम का रस पीऊं, मेरी आत्मा को कबूल नहीं ! तेरा यह कार्य, कम से कम बुद्धिमतापूर्ण नहीं. मुझे तुम्हारे इस कार्य से अपार पीड़ा हुई है. मैं आत्म ग्लानि महसूस करता हूं, मेरी अच्छी मनु ! इतना कहकर बापू अत्यंत गंभीर हो गए.

बापू की इस मार्मिक वेदना को देख कर बड़ी मर्माहत हुई पर समय चूक जाने पर अब कर ही क्या सकती थी !

प्रभु की कृपा से, तत्काल, कुछ ही देर बाद दो अत्यंत क्षीण काया महिलाएं बापू से भेंट करने उनके पास आई. इन महिलाओं के साथ दो छोटे छोटे बच्चे भी थे !

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गांधी ने बड़े ही प्यार से उन बच्चों को अपने पास बुलाया और जो एक गिलास आम का रस मनु ने गांधीजी के पीने के लिए बनाया था, गांधीजी ने मनु से उसे दो गिलास में बराबर बराबर हिस्से में बांट कर उन दोनों बच्चों को पीने के लिए देने कहा. मनु ने वैसा ही किया. रास पीकर बच्चे बड़े ही प्रसन्न हुए और गांधीजी को बड़ी प्रसन्नता हुई. उन्होंने महसूस किया कि उनके सीने पर एक बड़ा बोझ था जो उतर गया. उन्होंने कहा – ईश्वर ने मेरी आंतरिक वेदना सुन ली : समझ ली और मुझे उस वेदना और ग्लानि से मुक्त करने के लिए इन दो गरीब अबोध बच्चों को मेरे पास भेज दिया, जिन्हें आम का रस पिलाकर वेदना और ग्लानि के स्थान पर आत्म संतोष और आनंद प्राप्त किया. पहले आम के रस को अपने लिए तैयार देखकर भीतर ही भीतर आत्म ग्लानि महसूस कर रहा था ! लग रहा की जरूर मुझमें कोई त्रुटि है : कमी है जो मेरे लिए इस गरीब देश में आम का रस पीने के लिए तैयार किया गया. मैं अपने को गुनहगार और दोषी महसूस कर रहा था ! प्रभु कि मुझ पर बड़ी ही अनुकंपा है, उन्होंने मेरी विनती सुन ली और कृपा करके : करुणा करके, मुझे अपनी भूलों और गुनाहों से बचाने के लिए, इन दो बच्चों को भेज दिया !

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बापू की इस करुण वाणी और व्यथा को सुनकर मनु को बड़ी ही पीड़ा हुई और मन ही मन पछताई भी. साथ ही साथ उन दिनों से महंगी वस्तुए कभी भी, गांधी जी के लिए नहीं खरीदने का मन ही मन निर्णय कर लिया !

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और… इस प्रकार बापू की आत्म वेदना और आत्मग्लानि गल गई : पिघल गई.


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