बुढ़िया का अटूट विश्वास – लोक कथाएं


बुढ़िया का अटूट विश्वास - लोक कथाएं
बुढ़िया का अटूट विश्वास - लोक कथाएं

Budhiya ka atut vishwas – lok kathayen (Sikshaprad kahaniyan) बागमती नदी के किनारे एक बुढ़िया रहती थी. उसका दुनिया में कोई नहीं था. निपट अकेली थी. नित्य भगवान का भजन करते और चरखे पर सूत कातकर किसी तरह अपना गुजारा करती थी. वह बहुत गरीब थी.

उन दिनों महाराजा दिलीप सिंह का राज्य था. वे नेक राजा थे और जनता का स्नेह उन्हें प्राप्त था. उनकी सेवा में डंबर बहादुर राणा नामक एक व्यक्ति कार्य करता था.

इस राणा का मकान भी बागमती नदी के किनारे बुढ़िया के पड़ोस में ही था. वह सुबह शाम नौकरी पर जाते समय बुढ़िया को राम-राम जरूर कहता. बुढ़िया खुश होकर उसे आशीर्वाद देती. वह बुढ़िया का कामकाज भी कर देता. उसकी सूत बाजार में बेच आता था और बुढ़िया को उचित मूल्य ला कर देता. उसी में बुढ़िया के दिन किसी तरह गुजरते थे.

एक दिन बातों ही बातों में राजा दिलीप सिंह के बारे में बात होने लगी. बुढ़िया ने पूछा – क्यों रे ! तेरा राजा कैसा है.

वह तो बहुत अच्छे हैं सबका ध्यान रखते हैं राणा का उत्तर था.

क्या खाक ध्यान रखता है. मैं इतनी मुसीबत में रहती हूं, मुझे पर तो उन्होंने कभी ध्यान नहीं दिया.

अरे नानी राजा तो पारस है ! उससे सोना छू जाए तो वह भी सोना बन जाए – राणा ने बोला.

सच, बुढ़िया को बड़ा आश्चर्य हुआ.

और नहीं तो क्या – इतना कहकर राणा नौकरी पर चला गया.

बुढ़िया राजा के बारे में सोचती रह गई. उसे राजा का कमाल देखने की बड़ी इच्छा होने लगी. वह सोचने लगी, मैं इतनी गरीब हूं अगर कोई लोहा राजा से छुला दे तो मेरे घर में भी सोना हो जाएगा. फिर, मुझे किसी चीज की कमी ना होगी.

उन्हीं दिनों नेपाल का राष्ट्रीय त्यौहार दुर्गा पूजा आ गया. सारे देश में लोग नवीन परिधान पहनकर दुर्गा प्रतिमाओं के दर्शन करते और बागमती में नहाकर पुण्य बटोरते. दशमी के दिन महाराजा दिलीप सिंह बागमती में नहाने आते थे. उस दिन दशमी थी. नदी के आसपास का इलाका साफ किया जा रहा था. चारों ओर तोरन सजाए जा रहे थे और सड़के साफ़ की जा रही थी, पानी छिड़का जा रहा था.

बुढ़िया अपनी झोपड़ी में बैठी, यह नजारा देख रही थी.

अचानक बाहर से राणा गुजरा तो बुढ़िया ने उससे पूछा – क्यों रे ! आज यह सफाई कैसी हो रही है.

नानी मां तू तो सब भूल जाती है. आज दशमी है ना. आज के दिन महाराज नदी में नहाने आते हैं.

अच्छा अच्छा ! बुढ़िया को याद आ गया.

वह उत्सुकता से महाराजा की प्रतीक्षा करने लगी. अचानक उसे राणा की बात याद आ गई थी. राजा तो पारस है, उससे लोहा छुआ लो तो वह सोना हो जाए. बुढ़िया ने सोचा आज मौका है. अगर वह कोई लोहा राजा से छुला दे तो उसका भाग्य चमक सकता है. उसने झोपड़ी के चारों और लोहा खोजा पर घर में लोहा था ही नहीं. अचानक उसकी नजर तवे पर गई, जो धुए से काला हो गया था. उसने तबे को अपने कब्जे में ले लिया. उसने निश्चय कर लिया कि जब राजा आएगा तो वह यही तवा उसके शरीर से छुला देंगे बस तवा सोने का हो जाएगा. रोटी तो वह कोयले की आंच पर भी पका सकती है.

अब वह तवा लेकर झोपड़ी के पास बैठ गई. थोड़ी देर बाद ही महाराजा की सवारी वहां से गुजरने लगी. वे हाथी पर बैठे थे, उनके आस-पास घोड़े पर उनके अंगरक्षक और सेना के अधिकारी थे. सड़क के दोनों और जनता की भारी भीड़ थी जो महाराजा की जय जयकार कर रही थी.

बुढ़िया ने अपना तवा संभाला और भीड़ को चीरकर बीच सड़क पर पहुंच गयी. सामने से महाराज का हाथी आ रहा था. महाराज के पास पहुंचते ही बुढ़िया ने ऊंचे (चिल्लाकर) में कहां – कांछा कांछा ! तल आओ. (बेटा जरा नीचे तो उतरो).

बुढ़िया का इतना कहना ही था की सभी सकते में आ गए. अंगरक्षक और सेना के अधिकारी चौक कर खड़े हो गए. सड़कों के दोनों ओर खड़ी जनता का आश्चर्य से मुँह खुल गया. अंगरक्षक बुढ़िया को पकड़ने के लिए आगे बढ़े. महाराजा दिलीप सिंह ने ललकार कर अपने अंगरक्षकों से कहा – ठहर जाओ.

अंगरक्षक अपनी जगह पर खड़े रह गए.

महाराजा अपने हाथी से नीचे उतरे और बुढ़िया के सामने जाकर खड़े हो गए.

बुढ़िया ने महाराजा को बुला तो लिया था पर अब उस की बोलती बंद हो गई थी. साक्षात राजा को अपने सामने खड़ा देखकर बुढ़िया हतवाक थी. उसने अपना तवा पीछे छिपा लिया.

महाराजा ने मुस्कुराकर कहा – बोलो नानी ! तुम्हे क्या कहना है.

बुढ़िया चुप ! बेचारी क्या कहे ! महाराजा ने पुनः कहा, नानी मैं तुमसे बहुत खुश हूं. आज बहुत दिनों के बाद कांछा सुनकर मेरा बचपन मुझे याद आ गया. मेरी मां मुझे इसी प्रकार पुकारा करती थी. आज तुमने उसी प्रकार पुकारकर मुझे मेरा प्यारा बचपन लौटा दिया. बोलो तुम क्या कहना चाहती हो.

बुढ़िया प्रसन्न हो गई. उसका सारा डर गायब हो गया. आंखों में स्नेह भर कर बोली, कांछा राजा, जरा मेरे तवे को छू दो, जिससे यह सोने का हो जाए.

मेरे छूने से लोहा सोना कैसे हो जाएगा. महाराज ने आश्चर्य से उत्तर दिया.

मुझ बुढ़िया को बुद्धू बनाने की जरूरत नहीं. मुझे सब पता है. लोग कहते हैं कि तुम पारस हो. लोहे को छू लो तो वह सोना बन जाता है.

बुढ़िया का यह विश्वास देखकर महाराजा गदगद हो गए. पर उनकी समझ में नहीं आया की बुढ़िया का तवा छू कर उसे सोना कैसे बना दें. यह तो एकदम असंभव था. वह सोच में डूब गए. वह किसी भी तरह बुढ़िया का विश्वास तोड़ना नहीं चाहते थे. एकाएक उन्हें एक उपाय सूझ गया. उन्होंने बुढ़िया से कहा – अरे इसमें कौन सी बड़ी बात है. लाओ तवा मुझे दो. मैं अभी इसे सोने का बना देता हूं.

बुढ़िया ने खुशी-खुशी तवा राजा को दे दिया. महाराज ने तवा लेकर अपने एक अंगरक्षक को दिया और बोले, इसे महज में ले जाओ और इतने ही वजन का सोना लाकर बुढ़िया को सौंप दो.

अंगरक्षक तवा लेकर महल में चला गया. महाराज तथा अन्य सभी अंगरक्षक का इंतजार करने लगे. थोड़ी देर में ही अंगरक्षक महल से सोना ले कर आ आया.

महाराज ने सोना बुढ़िया को सौपकर कहा – लो नानी मां, तुम्हारा तवा सोना बनकर आ गया.

बुढ़िया सोना पाकर फूली ना समाई.


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