महामति चाणक्य की जीवनी – भारत के महापुरुष


क्या ब्राह्मण भगवान एवं ग्रहों के एजेंट हैं ? वेद कहता है...
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चाणक्य के कई नाम मिलते हैं. विष्णु शर्मा, कौटिल्य, वात्स्यायन, द्रुमिल इत्यादि कई नामों से ये प्रसिद्ध है. यह जाति के ब्राह्मण और पाटलीपुत्र के निवासी थे. प्राचीन कथाओं से यह अनुमान किया जाता है कि ये काले कलूटे और बहुत कुरूप थे और इसी कारण नंद की सभा में अपमानित हुए थे. किंतु, काले कुरूप शरीर के अंदर वह महान शक्ति छिपी हुई थी जिसने भारत के इतिहास में एक विशाल साम्राज्य की नीव डाली.

Mahamti Chanakya ki jivni – Bharat ki mahapurush

अपमानित किए जाने पर खुले दरबार में चाणक्य ने प्रतिज्ञा की कि जब तक मैं नंद वंश का समूल नाश नहीं कर दूंगा अपनी शिखा नहीं बांधूगा. क्रोधान्ध चाणक्य जब नंगे पैर रास्ते से जा रहा था, अचानक उसके पैरों में कुश चुभ गये. खून की एक बूंद निकल पड़ी और चाणक्य का क्रोध और भी जल उठा – ये लोग भी नंदों से मिल गए हैं — मन में ऐसा विचार कर उसने अपने दोनों हाथों से कुशों को उखाड़ना शुरू किया. ऊपर दोपहर का सूरज गर्मी बरसा रहा था.

कुछ देर से यह सारा दृश्य देखते हुए राजकुमार चंद्रगुप्त का ह्रदय चाणक्य के प्रति प्रशंसा से भर उठा. यही आदमी मेरे लिए काम का हो सकता है – चंद्रगुप्त ने मन ही मन सोचा. इसके बाद चाणक्य की सहायता पाकर चंद्रगुप्त ने नंद वंश का नाश कर दिया और महान मौर्य साम्राज्य की स्थापना की.

चाणक्य राजनीति के बड़े भारी विद्वान और कूटनीतिज्ञ थे. इन्होने तक्षशिला में शिक्षा प्राप्त पायी थी. जैन ग्रंथों में इन्हें जैन धर्मावलंबी बताया गया है, पर यह ठीक नहीं ज्ञात होता है. ज्यादातर लोगों का अनुमान है कि चाणक्य मगध के ब्राह्मण थे. पाटलिपुत्र इनकी जन्मभूमि थी. ये बड़े ही प्रतिभावान, हठी और कूट राजनीतिज्ञ थे. चाणक्य नीति, अर्थशास्त्र, कामसूत्र और न्यायभाष्य इनकी प्रसिद्ध रचनाएं हैं. संसार के राजनीति साहित्य को उनकी ये देन सर्वथा अनुपम है. आज भी बड़े-बड़े विद्वान उनकी प्रशंसा करते नहीं थकते. उनकी नीतियां वास्तव में विलक्षण और अमोध सिद्ध होती थी.

नंद वंश के नाश के बाद चंद्रगुप्त सम्राट तो हो गया था लेकिन नंदों का मंत्री राक्षस बदला लेने की चिंता में लगा हुआ था. चाणक्य की बुद्धि के आगे उसकी एक न चली और अंत में उसे आत्मसमर्पण करना ही पड़ा. कूटनीति में चाणक्य की कोई बराबरी नहीं कर सकता था.

इस प्रकार, महान मौर्य साम्राज्य का निर्माण वास्तव में चाणक्य ने हीं किया, और उसका स्वप्न पूरा हुआ. उसने अहंकार के नशे में डूबे हुए नंदों के घराने का समूल नाश किया और एक सुयोग्य शासन-व्यवस्था की स्थापना की. एक साम्राज्य को धूल में मिला कर उसने भग्नावशेष पर अपने नए मजबूत साम्राज्य का निर्माण किया और तद्युगीन संपूर्ण भारत में उसकी महान शक्ति का कोई मुकाबला नहीं था, किंतु ब्राह्मण चाणक्य…… ……

चाणक्य का ब्राह्मण हृदय राज्य और वैभव के मद में निमग्न नहीं हो सकता था. उसने तुरंत शासन के समस्त सूत्र चंद्रगुप्त के हाथों सौंप कर संयास ग्रहण किया और गंगा के किनारे कुटी बनाकर रहने लगा. राजनीतिक कूचत्रों से कुत्सित उनका जीवन वेदपाठ और भगवत भक्ति के वातावरण में स्वर्ण-सा पावन हो उठा.

वह ऐसा ही प्रतिभावान और ऐसा ही महान था.

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