डरपोक की कथा – नीति कथा


डरपोक की कथा - नीति कथा
डरपोक की कथा - नीति कथा

Hindi story with moral : पालीभद्र नाम का एक राजकुमार था. वह स्वभाव से डरपोक था. उसका पिता गंगा के दक्षिणी तट पर राज्य करता था. उसके पिता की मृत्यु हो गई. मंत्रियों ने आपस में सलाह की पाली भद्र को राजा बना दिया.

राजा बनने पर भी उसकी कायरता कम नहीं हुई. पास पड़ोस के राजाओं को अच्छा मौका मिला. उन्होंने मिलकर उसके राज्य पर चढ़ाई कर दी. राजाओं ने उसके राज्य की भूमि पर अधिकार जमाना आरंभ किया.

वह कायर तो था ही. अपनी भूमि छोड़कर पीछे हटता गया. कहा गया है – जो राजा डरपोक है, अपनी शक्ति का प्रयोग नहीं करता. युद्ध से पीठ दिखाकर भाग खड़ा होता है. उससे उनके शत्रु राजा खुश होते हैं. शत्रु और रोग प्रकृति से ही हानि पहुंचाने वाले हैं. इन्हीं बढ़ने देना कायरता है.

इस नीति उपदेश के बिल्कुल विपरीत उस राजा का स्वभाव था. राजा की कमजोरी देख पड़ोसी राजाओं का हौसला बढ़ा. उन्होंने पूरी तैयारी के साथ चढ़ाई करनी शुरू कर दी.

मंत्रियों को यह बात सही नहीं गई. उन्होंने आपस में राय की. मंत्रियों ने राजा से कहा, राज्य की बहुत सी भूमि को शत्रुओं ने दखल कर लिया है. बची भूमि को बचाना चाहिए नहीं तो हमारा राज्य खत्म हो जाएगा.

राजा ने मंत्रियों से कहा, एक काम करो पहले संधि कर लो. बाद में युद्ध किया जाएगा.

मंत्रियों ने कहा, अगर बाद में युद्ध करना ही पड़ेगा तो अभी ही क्यों नहीं किया जाए. जो काम अभी करना है, उसे कल पर टालना बुद्धिमानी नहीं है.

राजा ने कहा, तुम्हें मालूम है ना कि जो युद्ध करता है वह अपनी सेना को खतरे में डालता है. मुझे तो ऐसा करना उचित नहीं जान पड़ता.

मंत्रियों ने कहा, सेना का काम ही है युद्ध करना. अगर युद्ध नहीं करना है तो फिर सेना की आवश्यकता ही क्या है.

इस पर राजा ने कहा, युद्ध में केवल सैनिक ही नहीं मारे जाते. राजा भी मारा जाता है. मुझे अपने मारे जाने का खतरा है. मुझे मरने के बाद तुम लोगों से कुछ होगा भी तो नहीं.

मंत्रियों ने कहा, शत्रुओं का सामना करने की शक्ति आप में है. इस शक्ति का उपयोग कीजिए. ऐसा नहीं करने से वे आपका राज छीन लेंगे.

राजा ने कहा, अगर तुम लोग चाहते हो कि युद्ध हो ही तब मुझे एक काम करने दो मुझे. अपनी जगह पर किसी को चुनने दो मुझे.

मंत्रियों ने कहा, युद्ध मे राजा अपनी जगह पर दूसरे व्यक्ति को तभी भेजता है जब शत्रु उससे कमजोर हो. शत्रु तो आप के समान ही बलवान है. ऐसी हालत में किसी को अपना प्रतिनिधि बनाना उचित नहीं. इस युद्ध में आप का जाना जरुरी है.

डरपोक राजा बोला, तुम लोग जो चाहो कर सकते हो. इतना जान लो कि मैं लड़ाई नहीं कर सकता हूं.

राजा की बात सुनकर मंत्री बाहर चले गए. सभी ने राजा की कायरता की चर्चा की. इस हालत में इसका राज नहीं बच सकता. कायरता आदमी का बहुत बड़ा दुश्मन है. इस राजा की कायरता के कारण यह राज्य बच नहीं पाएगा. इसके विनाश के पहले हमें अपनी भलाई की बात सोचनी चाहिए. हमारा विनाश निश्चित है.

इस नीति पर हम लोग चलें, दुष्ट राजा का नाश उसके ही दोष से होता है. उस दोष का फल प्रजा को ही भुगतना पड़ता है.

मंत्रियों ने सोचा, यह डरपोक राजा लड़ाई नहीं करेगा. शत्रुओं की जीत होगी. परिवार के साथ हमारा यहां रहना कठिन हो जाएगा. फिर भी विपत्तियों के समय इसे छोड़ना भी तो उचित नहीं.

मंत्रियों ने फिर सोचा, अभी इस राजा को छोड़ना ठीक नहीं होगा. अभी संकट आने में देर है. संकट जब तक निकट नहीं आया है तब तक डरना ठीक नहीं. संकट से तब तक नहीं डरना चाहिए जबतक वह नजदीक ना आया हो. अगर वह नजदीक आ ही जाए तभी कुछ करना उचित है. मंत्री ठहर गए.

दूसरे राजा ने चढ़ाई की. डरपोक राजा कुछ नहीं कर सका. शत्रु राजा की ओर से विजय के बाजे बजने लगे. यह सुनकर राजा ने अपने मंत्रियों को बुलाया.

राजा ने कहा, वैधो ने कहा है कि डंके की आवाज बाण से भी अधिक तीखी है. हो ना हो, तुम लोग जो कहते हो. उसमें सच्चाई हो. मुझे तो लग रहा है कि यह आवाज मुझे हटाने के लिए ही आ रही है.

मंत्री बौखला उठे.

मंत्रियों ने कहा, बेशक वैधो के अनुसार यह आवाज आप को हटाने की नहीं, आपकी कायरता के कारण है.

यह सुनते ही वह कायर राजा वहां से भाग गया. वह कहीं जाकर छिप गया.

मंत्रियों ने कहा, ठीक ही कहा गया है. ब्रह्मा ने स्त्रियों के पहचान के चिन्ह तो बना दिए हैं. कायरों की पहचान के लिए कोई चिन्ह नहीं बनाया है.

दूसरी बात यह कि कायर के पास से लक्ष्मी जल्दी भाग जाती है. लक्ष्मी के भाग जाने पर स्त्रियां भी उसके पास से भाग जाती है. वे ऐसे पुरुष पर तरस खाती है. हंसती है.


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