सच्ची कहानी – दासों पर दया


सच्ची कहानी - दासों पर दया
सच्ची कहानी - दासों पर दया

Enlightening and inspirational Hindi Story : एक गरीब लड़का था. उसके घर की आर्थिक स्थिति बहुत खराब थी. उसके पिता चरवाहे थे तथा भेड़ इत्यादि पालते थे. अतः पढ़ाई जारी रखने के लिए इस बालक को बहुत संघर्ष करना पड़ा. कभी पिताजी के साथ खेत में काम करता तो कभी किसी दुकान पर नौकर के रूप में लग जाता.

इस युवक ने पढ़ने का मन में पक्का निश्चय कर लिया था इसलिए एक दिन उसने अपनी पढ़ाई पूरी कर ली. शुरू से ही उनके मन में जन साधारण के लिए बहुत प्यार था. वह ज्यों ज्यों बड़ा हुआ उसने गरीब व्यक्तियों का शोषण होते देखा.

एक बार वह नदी किनारे खड़ा था. उसने देखा माल से लदी हुई कुछ नौकाएं आई. उनमें सामान से भारी गट्ठे पड़े थे. कुछ गुलाम व्यक्तियों को उन्हें उतारने के लिए कहा गया. इन दासों के शरीर पर फटे कपड़े थे तथा उनकी हड्डियां स्पष्ट दिखाई पड़ रही थी. दास अपने मालिक का आदेश मान, माल उतारने लगे. पर इन कमजोर आदमियों से माल नहीं उतर रहा था. अचानक एक गट्ठा एक नौकर की गर्दन से लुढ़क कर पानी में गिर गया. नौका का स्वामी देख रहा था. वह चाबुक लेकर दौड़ा, उस गुलाम के शरीर पर कई चाबुक जड़ दिए. बेचारा दास रो पड़ा. यह देख उस युवक की आंखों में भी आंसू आ गए.

वह कई दिन तक सोचता रहा, जब सभी मनुष्य समान है तो कुछ आदमी गुलामों जैसा जीवन क्यों बिता रहे हैं और पैसे वाले उनका शोषण क्यों करते हैं. जब भी कहीं वह गुलामों को बोझ ढोते देखता तो उसका मन दुखी हो जाता. अपने मन को शांत करने के लिए वह उनकी मुक्ति का उपाय सोचता. इसकी योग्यता रंग लाई और वह अपन राज्य का प्रसिडेंट चुन लिया गया.

एक दिन वह व्यक्ति अपनी गाड़ी में बैठा एक सभा में जा रहा था. उसे बहुत जल्दी थी, क्योंकि सभा का समय होने वाला था. अचानक उसने देखा एक गुलाम व्यक्ति सड़क के किनारे बैठा रो रहा है. उस व्यक्ति ने अपनी गाड़ी रोकी और गुलाम से रोने का कारण पूछा. दास ने कहा – मैं अपने मालिक की सूअर लेकर यहां आया था. एक सूअर दलदल में फंस गया है. अगर वह नहीं निकला तो मालिक मुझे कोड़ों से मारेगा. मैं बुड्ढा हूं अतः दलदल में नहीं घुस सकता. उस आदमी ने देखा सचमुच पास के दलदल में एक सूअर फंसा हुआ था वह ज्यों ज्यों निकलने की कोशिश करता और अधिक धसता जा रहा था. वह व्यक्ति गाड़ी से उतरा और दलदल में घुस गया. कुछ देर के प्रयत्न के बाद उसने सूअर को बाहर निकाल दिया. बुड्ढे दास ने हाथ उठाकर उसका धन्यवाद किया.

सभा का समय हो चुका था अतः वह व्यक्ति उन्हीं कीचड़ के कपड़ों से अधिवेशन में चला गया. उसको देखते ही सभी व्यक्ति खड़े हो गए और जय जयकार करने लगे. लेकिन वह आदमी गर्दन झुकाए खड़ा था. कुछ देर बाद उसने कहा – भाइयों ! इसमें प्रशंसा की क्या बात है ?

कीचड़ के कपड़ों ने उनके मन में उत्सुकता जागृत की और वे पूछ ही बैठे. उस भले आदमी ने सारी बात बता दी. लोगों ने फिर तालियां बजाई.

वह नेक इंसान बोला – मैंने यह सब कुछ अपने मन को शांति देने के लिए किया है. क्योंकि सूअर को कीचड़ से निकालते ही मेरे मन का दुख दूर हो गया. यदि मैं ऐसा ना करता तो मेरे मन में प्रायश्चित की आग बनी रहती और मैं अभी तक प्रसन्न न हो पाता.

इसी तरह जब तक मेरे देश से दास प्रथा पूरी तरह समाप्त नहीं होगी तब तक मुझे चैन नहीं आएगा.

और सचमुच इस महापुरुष ने एक दिन अपने जीवन का बलिदान करके इस कुप्रथा को अपने देश से समाप्त कर दिया.

जानते हो यह दयालु महापुरुष कौन था ?

– अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन.


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