धूर्त बनिया की कहानी – नीति कथाएं


धूर्त बनिया की कहानी - नीति कथाएं
धूर्त बनिया की कहानी - नीति कथाएं

Hindi stories with moral : गोदावरी नदी के किनारे विशाला नाम का एक राज्य था. वहां के राजा का नाम समुंद्रसेन था. उस राजा को एक ही पुत्र था. पुत्र का नाम चंद्रसेन था. वह बहुत ही सीधा सादा राजकुमार था.

वही एक धूर्त बनिया रहता था. उसने सोचा कि राजकुमार तो सीधा सादा है ही, आसानी से उससे धन ठका जा सकता है. फिर मेहनत करने की जरुरत ही नहीं पड़ेगी. उस बनिए ने राजकुमार की सेवा करनी का ढोंग रचा. उसके साथ खूब घुल मिलकर रहने लगा. अपनी बनावटी सेवा से उसने राजकुमार को अपने वश में कर लिया. भोला भाला राजकुमार उसके वश में हो गया.
इसके बाद उस बनिए ने सोचा कि किस प्रकार राजकुमार को दूसरी जगह ले जाया जाए. वहां जाने पर खजाने के रत्न हथियाने में कोई कठिनाई नहीं होगी. वह राजकुमार से दूसरे राज्य की सुंदरता के बारे में कहने लगा.

वह राजकुमार की उत्सुकता जगाना चाहता था. राजकुमार की उत्सुकता जाग गई. बनिया काम में सफल हो गया. अब राजकुमार रोज रोज इस तरह की कथा सुनने का आदी हो गया. बनिया तो मौके की तलाश में था ही. एक दिन उसने एकांत में राजकुमार से कहा कि एक ही जगह रहने से मन ऊब जाता है. मन बहलाने के लिए अपना राज्य छोड़कर दूसरी जगह जाना जरूरी है. एक ही चीज का बार बार उपयोग करने से मन ऊब जाता है. बाहर जाने पर नई-नई चीजें देखने को मिलती है. नए-नए पदार्थ खाने को मिलते हैं. जीवनी में मनोहर दृश्य देखना भी आवश्यक है.

राजकुमार बनिए के बहकावे में आ गया.

राजकुमार ने कहा – ठीक कहते हो.

राजकुमार के हाँ कहने पर धूर्त बनिया बड़ा खुश हुआ.

उसने राजकुमार से कहा बड़ी खुशी की बात है.

राजकुमार ने कहा कि तब चलने की तैयारी करो. राजकुमार की बात सुनकर बनिए ने कहा राजकुमार विदेश जाने के लिए काफी धन की आवश्यकता पड़ती है. आप के खजाने में धन की कमी तो है नहीं. आप खूब सोच समझ लें. राजकुमार ने कहा – खूब सोच समझ लिया है. बनिए ने फिर कहा – हम दोनों में जो बात हुई है वह कोई जानने न पाए. दूसरा कोई सुनेगा तो इस में अड़चन डाल सकता है. भोले राजकुमार ने कहा – ठीक है. यह बात मैं किसी से नहीं कहूंगा.

उसने कीमती रत्न राजकुमार के पास रखवा दिया. फिर शिकार खेलने के बहाने घोड़े पर सवार होकर वहां से चल पड़ा. साथ में कुछ सेना भी थी. कुछ दूर जाने पर उस ने सेना को लौटा दिया. अब दोनों दो घोड़ों पर सवार थे. दोनों चलते गए, रास्ते में एक घनघोर जंगल मिला. दोनों थक गए, प्यास भी लगी हुई थी. निकट ही एक तालाब दिख पड़ा. राजकुमार ने उसके जल से अपनी प्यास बुझाई. पेड़ की छाया तले घास बिछाकर लेट गया. थका होने के कारण राजकुमार को नींद आ गई.

राजकुमार को सोया देख उस धूर्त ने उसे अच्छा मौका समझा. उसने सोए राजकुमार के हाथ पैर बांध डाले. उसे जान से मार डालने के लिए उसने अपने हाथ में हथियार ले लिया. उसने सोचा कि राजकुमार को इस प्रकार मारना चाहिए की मारने का भी पाप न लगे. ऐसा सोचकर धूर्त ने उसकी आंखें फोड़ डाली. राजकुमार भयंकर दर्द से कराह उठा. उसने अपने बचाव के लिए आवाज दी. उस धूर्त बनिए को अपने काम से मतलब था. उसका काम बन गया था. वह दोनों घोड़ों पर सामान लादकर वहां से भाग निकला.

इधर राजकुमार आंखें की पीड़ा से कराह रहा था. वह जोर जोर से चिल्लाने लगा, छटपटाने से उसके हाथ पैर के बंधन टूट गए. हार थक कर वह जमीन पर लुढ़क गया.

संयोग की बात थी, उसी पेड़ के ऊपर एक घोंसले में दयालु नाम का तोता रहता था. उस तोते के दो पुत्र थे. वह उड़ कर दूर दूर जाकर दाना चुगते. दाना लाकर अपने पिता को खिलाते. दोनों पुत्रों ने अपने पिता से कहा कि आज हमने नर्मदा नदी के किनारे एक विचित्र दृश्य देखा है. पुत्रों की बात सुनकर वृद्ध तोता ने उस दृश्य के विषय में पूछा. बेटा बताओ तो वह कैसा दृश्य है.

तोते के दोनों पुत्रों ने कहा युक्तिपुर नगर के नीलरथ नामक राजा का राज्य है. चित्ररथ नामक उसको एक पुत्र है. वह राजकुमार अंधा है. बहुत से वैध उपचार कर हार गए हैं. राजकुमार अंधा का अंधा ही रह गया है. इस प्रकार उसके राज्य का भविष्य अंधकारमय लग रहा है.

बूढ़े तोते ने कहा – वह राजकुमार आंखों वाला हो सकता है, उसका सही इलाज होना चाहिए. तोते ने पूछा, सही इलाज क्या हो सकता है. बूढ़े तोते ने कहा – हम जिस पेड़ पर रहते हैं उसी के फूल का अंजन बनाकर आंखों में लगाने से अंधा आदमी आंखों वाला हो सकता है.

ठगा गया नेत्रहीन राजकुमार, बूढ़े तोते की बात सुन रहा था. वह खिसकते खिसकते उस पेड़ का फुल इकट्ठा करने लगा. किसी तरह फुल एकत्र हो गए. अंधा हो जाने पर भी उसने फूलों का अंजन बनाया. एक बार लगाने से आंखो की पीड़ा समाप्त हो गई. दूसरी बार लगाने से आंखो में फिर कम्पन पैदा हुई. तीसरी बार अंजन लगाते ही उसकी आंखें अच्छी हो गई. अब उसे सब कुछ दिखाई पड़ने लगा.

राजकुमार सोचने लगा कि मैं एक दुष्ट बनिए द्वारा ठगा गया हूं. इस रुप में अपने राज्य में लौटने पर मेरी हंसी होगी. उस राजकुमार ने सोचा कि क्यों नहीं इस फूल का अंजन बनाकर युक्तिपुर के राजकुमार का इलाज करें. इससे मुझे यश मिलेगा, राजा नीलरथ बड़ा खुश होगा और मुझे मनचाही वस्तु देगा.

फूल का अंजन बनाकर वह राजकुमार युक्तिपुर की ओर चला. रास्ते में कई दिन लग गए. किसी प्रकार वह वहां पहुंचा. उसने राजा नीलरथ से भेंट की, राजकुमार का उपचार किया. राजकुमार की आंखें भली चंगी हो गई. राजा बड़ा खुश हुआ. उसने राजकुमार के विषय में पूछा. राजकुमार ने अपनी सारी कहानी कह सुनाई.

राजकुमार की कहानी सुनकर राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ, उसे दया भी आई. राजा की एक लड़की थी चित्रसेना. राजा ने उस राजकुमार से उसका विवाह कर दिया. अपनी राज्य का चौथा हिस्सा भी उसे दे डाला. राजकुमार चंद्रसिंह के दिन सुख से बीतने लगे.

राजा नीलरथ के यहां एक उत्सव का आयोजन था. उसमें चंद्रसेन भी आमंत्रित था. चंद्रसेन अपनी पत्नी चित्रसेना के साथ अपने ससुर के घर जा रहा था. रास्ते में वही बंचक बनिया मिल गया. राजकुमार उसे देखते ही घोड़े से उतर पड़ा. उस धूर्त मित्र को गले लगाया. धूर्त बनिए के प्राण सूख गए, वह वहां से भागने लगा. राजकुमार ने अपने सैनिकों से उसे पकड़ लाने को कहा. धूर्त बनिया पकड़ा गया. वह राजकुमार के सामने लाया गया. राजकुमार उसे बार-बार सीने से लगाने लगा. उस दिन वह अपने ससुर के घर नहीं गया.

राजकुमार उस धूर्त बनिए के साथ अपने घर वापस आ गया. राजकुमार ने उस धोखेबाज मित्र से कहा की इतनी संपत्ति पाने पर भी उसकी दशा ऐसी क्यों है ? धूर्त बनिए ने बताया – यह उसके किये का फल है. राजकुमार ने उसे पिछली बातें भूल जाने को कहा.

राजकुमार ने यह भी पूछा -आखिर तुम्हारी इस कमजोरी का कारण क्या है. धूर्त बनिए ने कहा – मैं बनिया हूं, लोभ हमारा स्वभाविक धर्म है. मैं आपके संपत्ति लेकर और अधिक लाभ कमाने के उद्देश्य से समुंद्र के उस पार चला गया था. वहां व्यापार में मुझे काफी लाभ भी हुआ. दुर्भाग्य की बात थी, लौटते समय जहाज समुंदर में डूब गया. धन तो डूब ही गया, किसी प्रकार मेरे प्राण बच गए. मुझे अफसोस है राजकुमार मैंने आपके साथ भारी धोखा किया था. अब मेरा सर आपके सामने है, आप चाहें तो इसे धड़ से अलग कर दें.

बनिए की बात सुनकर, राजकुमार ने कहा – डरने की कोई बात नहीं. तुम्हारा वही धर्म था, जो तुमने किया. मेरा यही धर्म है कि जिस से मित्रता करूं उसे जिंदगी भर निभाऊ. धन नष्ट हो जाने से तुम चिंता मत करो. मैं तुम्हें पहले से भी अधिक धन दूंगा. बनिए ने डरते हुए कहा – राजकुमार जब मैं अपना कुकृत्य करता हूं तो आप पर मेरा विश्वास नहीं होता. मैंने आपके साथ बहुत बुरा व्यवहार किया था फिर भी आप सुखी हैं. मैं काफी धन पाकर भी इस दशा को प्राप्त हूं.

चंद्रसेन ने कहा – आदमी अपने किए का फल भोगता है. मित्र, मैंने जो किया उसका फल मैं भोग रहा हूं. तुमने जो किया उसका फल भोग रहे हो. इसमें दोष केवल कर्म का है. राजकुमार ने फिर कहा – तुम कुछ भी समझो या कुछ भी करो किन्तु, मैं तो अपनी सही राह पर ही चलूंगा.

बताओ तो, तुम्हारी मित्रता के लिए मैंने क्या नहीं किया ? राज्य के साथ अपने परिवार को भी छोड़ा, सब कुछ का त्याग किया. मैं केवल अपने कर्मों का ही भागी हो सकता हूं. दूसरे के काम का भागी तो दूसरा ही होगा.

राजकुमार मित्र की बात सुनकर धूर्त बनिया अत्यंत लज्जित हुआ. लज्जित ही नहीं हुआ, उसके प्राण पखेरू उड़ गए. राजकुमार की उदारता देखिए, धूर्त मित्र की मृत्यु के कारण वह जोर जोर से रोने लगा. राजकुमार को रोते देख उसकी पत्नी चित्रसेना ने पूछा – यह कौन आदमी है ? कहां से आया है ? किस कारण इसकी मृत्यु हुई ? फिर इस अनजान व्यक्ति की मृत्यु से आप इतने रोते क्यों है ?

चंद्रसेन ने कहा – तू नहीं जानती प्रिय! इसने मेरे साथ बड़ी उदारता बड़ती है. इसके हाथ में पर्ने पर भी मैं जिंदा बच गया. चित्र सेना ने कहा – उस समय इस पर पागलपन का भूत सवार था. चंद्रसेन ने कहा – इतना होने पर भी यह महान है, इस ने जो किया उसकी लज्जा के कारण ही तो इसकी मृत्यु हुई है. इसके बाद चंद्रसेन ने उसका दाह संस्कार कराया.


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