हैमवती उमा


हैमवती उमा
हैमवती उमा

ऋषि के आश्रम में प्रश्नोत्तर का समय था. वह अपने शिष्यों से घिरे हुए शांत चित्त बैठे थे. संध्या की प्रार्थना समाप्त हो गई थी.
मनुष्य स्वभाव से अज्ञात के प्रति जिज्ञासु होते हैं.

शिष्यों ने ऋषि से पूछा, “किसकी आज्ञा से मस्तिष्क वस्तुओं प्रति आकर्षित होता है ? जीवनदाई मूल शक्तियां एवं आंख-कान, नाक तथा वाणी किसकी इच्छा से कार्य करती है ?”

ऋषि ने उत्तर दिया, “सबको प्रेरणा देने वाली शक्ति एक एवं अविभाज्य है. दृश्यमान जगत के अंदर और बाहर तथा संपूर्ण अस्तित्व के भीतर भी वही शक्ति है. सभी शक्तियों का स्रोत ही वास्तविक ब्राह्मण है. विभिन्न देवतागण जिस की मनुष्य उपासना करता है, मात्र उसकी प्रतिछाया है. जो व्यक्ति इस तात्विक सत्य को जान लेता है, वह अमर हो जाता है.”

शिष्यों ने पूछा, “कौन वह भाग्यवान है, जो इस सत्य को जान लेता है ? और यह जाना जाए कि अमुक व्यक्ति ने इस सत्य के सत्य को जान ही लिया है ?”

ऋषि ने कहा, वह नहीं, जो कहता है ‘मैं जानता हूं’ बल्कि वह जो कहता है ‘मैं नहीं जानता’. नहीं जानने वाला क्रमशः सत्य को समझने में समर्थ हो जाता है. एक बार सत्य का ज्ञान हो जाने से आत्मा, चेतना की चार अवस्थाओं से युक्त हो, उसके सामने सदैव उपस्थित रहती है. वह आत्मा क्रमशः शक्तिमान होती जाती है, और वह पुरुष अमर हो जाता है.

इतना कहकर ऋषि ने अपने शिष्यों की तरफ देखा, तो वह समझ गए कि उनकी बातों का पूरा महत्व वह नहीं समझ पाए हैं. इसलिए अपनी बात को और स्पष्ट करने के लिए उन्होंने एक कहानी कही.

ऋषि ने कहा, “तुम लोग ने देवासुर संघर्ष के विषय में अवश्य सुना होगा. इस संघर्ष में देवता विजय हुए थे. देवताओं की जीत, ब्रह्मा की कृपा से हुई थी. किंतु अज्ञान एवं दर्प के कारण वे समझने लगे कि उनकी जीत उन्ही की शक्ति एवं महिमा से हुई है. इस तथ्य की जानकारी ब्रह्म को हुई. ब्रम्ह ने उनको शिक्षा देने और उनकी सीमा की पहचान कराने का विचार किया. यह सोचकर ब्रह्म ने एक तेजयुक्त यक्ष का रूप धारण किया और देवताओं के पास गए.

अलौकिक यक्ष को देखकर देवता चकित रह गए कि यह कौन हो सकता है. उसके पास जाने की हिम्मत किसी की नहीं हो रही थी. वे आपस में विचार करने लगे कि कौन उसके पास जाए. अंत में यह निर्णय हुआ कि सबसे पहले अग्निदेव वहां जाए.

अग्नि देव यक्ष के पास गए. यक्ष ने उन्हें देखकर पूछा – तुम कौन हो.

मैं अग्नि, परमज्ञानी एवं सर्वज्ञ हूं. अग्नि ने स्वाभिमान कहा.

यक्ष ने फिर पूछा, तुम्हारी शक्ति और विशेषता क्या है.

अग्नि देव ने कहा, इस ब्रम्हांड में जो कुछ है, मैं उसे जला सकता हूं.

यक्ष अग्नि देव की दर्पभरी बात पर हंसा और घास का एक तिनका उनके सामने रखकर बोला इस तिनके को जलाओ.

अग्निदेव ने उस तिनके को जलाने का बहुत प्रयत्न किया, किंतु उन्हें सफलता नहीं मिली. लज्जित मन अग्नि देव देवताओं के पास आए और बोले मैं नहीं समझ पाया कि यह यक्ष कौन है.

इसके बाद देवताओं ने वायु देव से प्रार्थना की कि वे उस यक्ष के पास जाएं और उसके विषय में पता करें. वायुदेव उसके पास गए. यक्ष ने उन्हें देखकर पूछा, तुम कौन हो.

वायुदेव ने कहा, मैं वायु हूं और शुन्य में विचरण करता हूं.

यक्ष ने पूछा, तुम्हारी विशेषता और शक्ति क्या है ?

वायु ने कहा, समस्त जगत की प्रत्येक वस्तु उड़ा कर मैं उसे आकाश में ले जा सकता हूं.

यक्ष ने उसकी दर्प भरी बात सुनकर कहा, इस तिनके को उड़ाओ तो जाने.

वायुदेव ने बहुत प्रयत्न किया, किंतु वह तनिक भी नहीं हिला. वायु देव लज्जित होकर देवताओं के पास लौट आएं. उन्होंने देवताओं से कहा, मैं नहीं समझ पाया कि यह यक्ष कौन है.

अब देवताओं ने इंद्र से प्रार्थना की कि वह प्रतापी एवं बलवान है, अतः वे जाकर पता लगावे की यह यक्ष कौन है. इंद्र ने कहा, मैं अभी पता लगाता हूं कि यह यक्ष कौन है और हम लोगों से क्या चाहता है.

अभिमानी इंद्र यक्ष के पास गए. किंतु इंद्र को देखकर यक्ष वहां से अंतर्धान हो गया. यह देखकर वह बहुत चकित हुए. अचानक उन्होंने देखा कि अत्यंत तेजस्वी एवं सुंदर हैमवती उमा उनके समक्ष उपस्थित है. इन्द्र श्रद्धापूर्वक उसके पास गए और बोले – यह तेजवान यक्ष कौन था.

हैमवती उमा ने कहा, यह यक्ष ब्रह्म था. उसी की इच्छा से देवताओं ने असुरों पर विजय पाई थी. अपनी शक्ति से देवता लोग बहुत कुछ भी करने में समर्थ नहीं है. देवताओं को इस बात का अभिमान हो गया था कि उन्होंने अपनी शक्ति से असुरों को जीता है. तुम लोगों ने देख लिया की अपनी शक्ति से अग्नि देव एक तिनका नहीं जला सके और वायु देव एक तिनका नहीं उड़ा सके.
तब इंद्र को ज्ञान हुआ कि वह यक्ष ब्रह्म था, और उसकी शक्ति ब्रह्मा की शक्ति से बनी हुई है. ब्रह्मा की ही शक्ति सभी की शक्तियों के मूल में है.


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