ईश्वरचंद्र विद्यासागर – भारत के महापुरुष


ईश्वरचंद्र विद्यासागर - भारत के महापुरुष
ईश्वरचंद्र विद्यासागर - भारत के महापुरुष

विद्यासागर का असली नाम ईश्वरचंद्र था. बंगाल के इन प्रसिद्ध विद्वान और समाज सुधारक का जन्म हुगली जिले के वीरसिंह गांव में सन 1820 ईस्वी में हुआ. इनके पिता ठाकुर दास बंदोपाध्याय एक बड़े गरीब ब्राह्मण थे और ₹8 माहवार पर नौकरी करते थे. लेकिन इतना गरीब होते हुए भी उन्हें अपने पुत्र को पढ़ाने का बड़ा शौक था. उन्होंने उसे अच्छी से अच्छी शिक्षा देने का पूरा प्रयत्न किया.

बचपन में ईश्वरचंद्र ने गांव की पाठशाला में शिक्षा पाई. गांव की पाठशाला की शिक्षा समाप्त करने पर यह पिता के पास कोलकाता आए. यहाँ कोलकाता के एक अति प्रसिद्ध संस्कृत कॉलेज में ये भर्ती किए गए. उस समय उनकी अवस्था बहुत कम थी. 11 वर्षों की लंबी अवधि तक शिक्षा प्राप्त कर ये कॉलेज से निकले. ये बहुत ही प्रतिभासंपन्न विद्यार्थी थे और कॉलेज में उनका स्थान सर्वदा प्रथम रहता था. कम समय में ही व्याकरण, काव्य और अलंकार आदि विभिन्न विषयों में निष्णात होकर ये संस्कृत के आचार्य बन गए. अंततः इनकी विद्वत्ता से प्रसन्न होकर विश्वविद्यालय ने इन्हें विद्यासागर की उपाधि प्रदान की.

इनका विद्यार्थी जीवन बड़ी मुसीबतों और कठिनाइयों में बीता था. अपने हाथों चौका-बर्तन करना तो मामूली बात थी, हाट बाजार भी करना पड़ता था. जिस कमरे में यह रहते थे, वह बहुत छोटा था और उसमे पैर फैला कर सोया तक नहीं जा सकता था. ईश्वरचंद्र रात में केवल 2 घंटे सोते थे बाकी सारी रात पढ़ने में बिताया करते.

विद्यार्थी जीवन समाप्त करते ही ईश्वरचंद्र फोर्ट विलियम कॉलेज में ₹50 मासिक वेतन पर प्राध्यापक नियुक्त हुए. इनकी बराबर तरक्की होती रही. कुछ वर्षों के बाद ये संस्कृत कॉलेज के सुपरिटेंडेंट बने. ये बड़े ही इमानदार परिश्रमी और साहित्य प्रेमी व्यक्ति थे और कॉलेज में इस समय उन्होंने बांग्ला साहित्य का गंभीर अध्ययन किया. सन 1850 में ये संस्कृत कॉलेज में प्रोफेसर बनाए गए और 1 साल के भीतर ही वहां के प्रिंसिपल हो गए. कुछ दिनों के बाद ये इंस्पेक्टर ऑफ स्कूल्स नियुक्त हुए. जहां भी जिस पद पर उन्होंने काम किया अपना कर्तव्य और दायित्व अच्छी तरह पूरा किया.

स्त्रियों के बीच शिक्षा के प्रचार का इन्होंने बहुत प्रयत्न किया और अपने इंस्पेक्टर जीवन में लड़कियों के लिए उन्होंने कई स्कूल खुलवाए. अंग्रेजी से भी इन्हीं कम शौक नहीं था. विद्यासागर कॉलेज के नाम से आज भी वह संस्था जीवित है, जहां ईश्वरचंद ने अंग्रेजी की शिक्षा के प्रचार के लिए एक समिति स्थापित की थी.

विद्यासागर केवल विद्या के ही सागर नहीं थे, वे शक्तिमान सुधारक और अपने युग के सामाजिक नेता भी थे. उन्होंने उस समय के समाज में प्रचलित बुराइयों की तीव्र आलोचना की और उन्हें दूर करने का सफल प्रयास किया. बाल विधवाओं की मार्मिक अवस्था से वे बड़े क्षुब्द हुए और उन्होंने विधवा विवाह का प्रचार करना शुरू किया. उन्होंने पूरे देश में विधवा विवाह की जोरदार चर्चा की और स्वयं अपने पुत्र का विवाह एक विधवा से किया. वेद और अन्य शास्त्र का प्रमाण देकर विद्यासागर ने यह स्पष्ट बताएं की विधवा विवाह ना तो शास्त्र के विरुद्ध है और न पाप है. कट्टरपंथी लोग फिर भी ईश्वरचंद्र का विरोध करते ही रहे.

आखिरकार विद्यासागर ने कोशिश करके सन 1856 में विधवा विवाह का कानून पास करवा ही लिया और इस कानून के अनुसार विधवा स्त्रियों का अधिकार बढ़ गया. विधवा विवाह का यह प्रचार ईश्वरचंद्र के जीवन की अत्यंत उपलब्धि है.
किंतु, सागर में इन सब के अतिरिक्त भी एक से एक बढ़कर गुण थे. विद्वान और सुधारक के अलावा मनुष्य के रूप में भी बड़े महान थे. दूसरों के दुख से दुखी होना इनका स्वभाव था. घमंड तो इन्हें छू भी नहीं गया था. वह सादा जीवन बिताते और सबसे बहुत नम्र हो कर बोलते थे. दयालुता की तो ये खान ही थे. इनकी दयालुता की इतनी कहानियां प्रचलित है कि सबको इकट्ठा करने पर काफी मोटी किताब ही तैयार हो जाए.

एक बहुत प्रसिद्ध घटना यह है कि बंगाल के सुविख्यात साहित्यकार माइकेल मधुसूदन जब फ्रांस में बहुत तकलीफ में जीवन बिता रहे थे तो उन्होंने विद्यासागर के पास सहायता के लिए लिखा. विद्यासागर ने तुरंत रुपए भेजकर माइकेल मधुसूदन की सहायता की. वास्तव में, जैसा कि मधुसूदन ने ठीक ही लिखा है, विद्यासागर विद्यासागर ही नहीं, दयासागर भी थे.

ईश्वरचंद्र अपने माता पिता के बड़े भक्त थे. अपनी नौकरी शुरु करते ही पिता को घर पर आराम करने के लिए कहा और उन्हें खर्च के लिए वह बराबर रुपया भेजते रहें. माता के प्रति भी इनकी भक्ति कम नहीं थी. कहा जाता है, कि एक बार जब ईश्वर चंद्र पढ़ रहे थे, मां ने किसी काम से इन्हें घर पर बुलाया. रात को यह समाचार विद्यासागर को मिला. लेकिन वे तुरंत उठे और चल पड़े. रात की वजह से नाव नहीं मिलने पर उन्होंने तैरकर ही नदी को पार किया और घर पर मां से जाकर मिले.

विद्वत्ता तो विद्यासागर में अताह थी. उन्होंने अपने ज्ञान को अपने अंदर छिपाए नहीं रखा. उन्होंने कई अच्छी अच्छी किताबें लिखी. बांग्ला भाषा में इनकी लिखी सीता वनवास और कथा माला पुस्तकें काफी प्रसिद्ध हुई. संस्कृत में भी इन्होंने ग्रंथ लिखे हैं, जिनमें उपक्रमणिका का विशेष आदर है. उत्तररामचरित पर भी इनकी टीका बहुत उपयोगी और अच्छी बन पड़ी है. स्कूलों में भी उन्होंने कई पुस्तके लिखी थी और उनसे अच्छी आय भी होती थी.

इस प्रकार, विद्यासागर ने बड़ा ही गौरवमय जीवन पाया था. उनके दिल और दिमाग की इतनी प्रसिद्धि हुई कि सरकार ने भी उन्हें c.i.e. की उपाधि से विभूषित किया. अंततः सन 1891 ईस्वी में 71 वर्ष की उम्र में उनका स्वर्गवास हो गया. आज भी हिंदुस्तान का बच्चा-बच्चा इनका नाम जानता है और जैसे-जैसे विद्वत्ता की ज्योति फैलेगी विद्यासागर का नाम भी फैलता जाएगा.


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