जन्म बर्वर की कथा – नीति कथा


जन्म बर्वर की कथा - नीति कथा
जन्म बर्वर की कथा - नीति कथा

Hindi story with moral : पुराने जमाने की बात है. कौशांबी नामक एक नगर था. वहां देवधर नामक एक ज्योतिषी रहता था. उसको शांतिधर नाम का एक पुत्र था. देवधर तो गुणवान था किंतु उसका पुत्र बचपन से ही जड़बुद्धि था. शांतिधर के पिता ने उसे विद्वान बनाने का काफी प्रयत्न किया. पिता का सारा प्रयास बेकार हुआ. इसका कारण यह था कि वह बिल्कुल जड़बुद्धि का था. उसके दिमाग में कोई बात घुसती ही नहीं थी. मसल मशहूर है कि पिता खुशी के साथ अपने पुत्रों को सब कुछ दे सकता है जो चीज नहीं दे सकता वह है भाग्य और बुद्धि.

देवधर जानता था कि उसका पुत्र मंदबुद्धि का है. फिर भी वह निराश नहीं हुआ था. उसकी इच्छा थी कि उसका पुत्र विद्वान बने. देवधर अब अपने पुत्र की इच्छा के अनुसार ही उसे पढ़ाने लगा. देवधर लगातार परिश्रम करता गया. अंत में मंद बुद्धि पुत्र बिना सोचे समझे शास्त्र रट गया.

अब देवधर का आत्मविश्वास थोड़ा बढ़ गया. उसने सोचा कि इसे राजा के पास ले चलना जरूरी है. तभी तो राजा समझ सकता है कि उसका पुत्र विद्वान है. वह अपने पुत्र को राजा के यहां ले गया.

उसे देखकर राजा ने देवधर से पूछा कि उसके पुत्र ने क्या पढ़ा है. देवधर ने कहा इसने गणित शास्त्र का अध्ययन किया है. यह गणित के सवाल का हल भी जानता है. आप सवाल करें यह जवाब दे देगा तो मैं अपना परिश्रम सफल समझूंगा.

राजा को कौतुक सुझा. उसने अपनी मुट्ठी में सोने की अंगूठी दवा ली. उसने शांतिधर से पूछा कि मुट्ठी में क्या है ?

शांतिधर ने हाथ में खल्ली ले ली. शास्त्र के अनुसार गणित करने लगा. गणित करने के बाद उसने राजा से कहा, आपके हाथ में धातु की बनी हुई कोई चीज है.

राजा ने कहा, ठीक है आगे बताओ.

शांतिधर ने कहा, वह चीज गोलाकार है.

राजा ने फिर कहा, बहुत अच्छा अब आगे बताओ.

शांतिधर ने कहा वह धातुओं में सबसे बड़ी धातु है, उसके बीच का स्थान खाली है.

राजा ने उसे शाबाशी दी.

अपनी तारीफ सुनकर शांतिधर को बड़ी खुशी हुई. वह प्रश्न का उत्तर देने की प्रतीक्षा में गणित करना भूल ही गया. अंदाज से ही उसने प्रश्न का उत्तर देना शुरु किया. शांतिधर ने अनुमान से ही कहा कि मुझे पता चल गया है कि आपकी मुट्ठी में क्या है.

राजा ने उससे जानना चाहा.

मंद बुद्धि शांतिधर ने जवाब दिया कि आपकी मुट्ठी में पत्थर की चक्की है.

राजा को बड़े जोर से हंसी आई. राजा ने देवधर से कहा कि तुम्हारे पुत्र ने गणित विद्या का अध्ययन अच्छी तरह से किया है. किंतु यह मंदबुद्धि का है. गणित के अनुसार इसने जो कुछ कहा वह तो सच है. अनुमान से इसने जो कुछ कहा है, वह हंसने वाली बात है.

राजा ने उस मूड शांति धर से कहा, तुम्हें इतना भी नहीं मालूम कि इतनी बड़ी चक्की मुट्ठी में कैसे आ सकती है. ऐसा अनुमान तुमने किस आधार पर लगाया. तुम्हारे उत्त्तर से यह साफ जाहिर हो गया है कि तुम मूर्ख हो बुद्धिहीन हो.

राजा ने उसे हल्का इनाम दिया. उसने कहा की कोरा शास्त्र पढ़ने ही से सब कुछ नहीं हो जाता. इसके लिए चिंतन मनन की आवश्यकता होती है. शांतिधर अपने पिता के साथ घर लौट गया.


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