क्यों भगवान शंकर ने असुर बाणासुर के लिये श्री कृष्णा से युद्ध किया !


क्यों भगवान शंकर ने असुर बाणासुर के लिये श्री कृष्णा से युद्ध किया !
क्यों भगवान शंकर ने असुर बाणासुर के लिये श्री कृष्णा से युद्ध किया !

बहुत प्राचीन काल में सोणितपुर राज्य में बाणासुर का शासन था. वह बहुत बुद्धिमान और अत्यंत उदार था. वह अपनी प्रजा के हित का सदैव बहुत ध्यान रखता था. इसी कारण समाज में उसका बड़ा आदर था. वह बड़ा वीर और पराक्रमी था तथा अपनी बात का धनी था. जो बात वह अपने मुंह से कह देता था उसका पालन करता था. उसे अपार संपत्ति प्राप्ति थी. उसके राज्य की प्रजा भी वैभव संपन्न थी. किसी के जीवन में किसी प्रकार का अभाव नहीं था.

बाणासुर शंकर का बड़ा भक्त था. उसके हजार भुजाएं थी. एक बार जब शंकर तांडव नृत्य कर रहे थे तब उसने अपने हजार हाथों से अनेक प्रकार के बाजे बजाकर शंकर जी को प्रसन्न कर दिया था. शंकर जी ने उस समय उस से वरदान मांगने को कहा. बाणासुर ने कहा, आप यदि मुझसे प्रशन्न है तो कृपा करके मेरे ही राज्य में रहें और उसकी रक्षा करें. शंकर जी ने बाणासुर की यह प्रार्थना स्वीकार कर ली. बाणासुर अब निडर हो गया.

जब किसी व्यक्ति के पास बहुत अधिक बल पौरुष हो जाता है तब वह उस पर घमंड करने लगता है और कभी कभी अपने से कमजोर लोगों को सताने भी लगता है. बाणासुर को भी अपनी शक्ति का घमंड हो गया था. वह युद्ध करना चाहता था, पर संसार में उसको अपनी बराबरी का कोई व्यक्ति नहीं मिलता था जिस से वही युद्ध करें.

अपनी शक्ति के घमंड में चूर बाणासुर शंकर जी के पास गया और उनको प्रणाम करके उनसे कहा भगवन आप ने मुझको इतनी अधिक शक्ति तो दे दी है पर उसके प्रयोग करने का मुझको अवसर नहीं मिलता. अब तो यह हजार भुजाएं मुझको भार लगने लगी है.

बाणासुर की यह घमंड से भरी बातें सुनकर शंकर जी बहुत नाराज हुए. उन्होंने कहा, घमंडी का सर नीचा होता है. तुझे अपनी शक्ति का घमंड हो गया है और तुझको मुझ से भी अधिक शक्तिशाली शत्रु मिलेगा जो तेरे इस घमंड को चूर कर देगा. शंकर भगवान की यह बात सुनकर वह उस दिन की प्रतीक्षा करने लगा जिस दिन उसको युद्ध करने के लिए शंकर से भी अधिक शक्तिशाली शत्रु मिले.

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बाणासुर की एक कन्या थी उसका नाम था उषा. अभी उसका विवाह नहीं हुआ था. वह बड़ी गुणवती और सुंदर थी. उसने एक रात सपने में एक सुंदर नवयुवक को देखा. उसने उसी नवयुवक से विवाह करने का निश्चय किया. उस नवयुवक को ना वह जानती थी ना पहले कभी देखा था. वह बहुत दुखी रहने लगी. अपनी सहेली चित्रलेखा के पूछने पर उसने उसे अपने मन की व्यथा बताई. चित्रलेखा चित्रकार थी. उसने उस समय के सभी राजकुमारों और पराक्रमी योद्धाओं के चित्र बनाए और उन्हें उषा को दिखाया. वह एक एक करके इन चित्रों को देखने लगी जब उसके सामने अनिरुद्ध का चित्र आया तब उसका मुख्य लज्जा से लाल हो गया. चित्रलेखा ने समझ लिया उस की सखी के स्वपन का राजकुमार अनिरुद्ध ही है. चित्रलेखा बाणासुर के मंत्री कुम्भाण्ड राक्षस की कन्या थी. वह योगनी थी और उसको अलौकिक शक्तियां प्राप्त थी. उसने उषा को वचन दिया कि वह अपनी शक्तियों से राजकुमार अनिरुद्ध को उसके पास ला देगी.

अनिरुद्ध भगवान कृष्ण के पौत्र थे और द्वारकापुरी में रहते थे. एक रात चित्रलेखा आकाश मार्ग से द्वारकापुरी गई और पलंग पर सोए अनिरुद्ध को शोणितपुर उठा लाई. अनिरुद्ध को प्राप्त कर उषा बहुत प्रसन्न हुई. उसने उन्हें अपने महल में ठहरा लिया. उषा का राजमहल इतना सुरक्षित था कि कोई उस में झांक भी नहीं सकता था. उषा और अनिरुद्ध ने कुछ समय तक अपना सुखमय जीवन व्यतीत किया.

कुछ समय के पश्चात उसके महल के द्वारपालों को अनिरुद्ध के राज महल के अंदर रहने की भनक लग गई. उन्होंने इसकी सूचना बाणासुर को दे दी. क्रोध से भरा हुआ बाणासुर अपने अस्त्र शस्त्र से सुसज्जित सैनिकों को लेकर उसके राजमहल में आया. राज महल को सैनिकों से घिरा देखकर अनिरुद्ध ने सैनिकों पर प्रहार करना आरंभ कर दिया. बाणासुर ने देखा कि उसके सैनिक मारे जाने लगे, अतः उसने नागपाश से अनिरुद्ध को बांध दिया. अनिरुद्ध नागपाश से बंधा सोनितपुर में पड़ा रहा.
द्वारिका से अनिरुद्ध के अचानक गायब हो जाने से वहां पर बड़ी हलचल मच गई. दूत चारों ओर से पता लगा कर लौट आए, अंत में एक दिन नारद मुनि श्री कृष्ण के पास आए उन्होंने श्रीकृष्ण को बताया कि बाणासुर ने अनिरुद्ध को नागपाश में बांध लिया है. यह सूचना प्राप्त करके श्रीकृष्ण ने शोणितपुर पर अपनी यदुवंशी सेना को लेकर आक्रमण कर दिया. अपनी बारह अक्षौहिणी सेना से उन्होंने बाणासुर की राजधानी को घेर लिया.

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जब बाणासुर ने देखा कि श्री कृष्ण की सेना उसके दुर्ग को तोड़-फोड़ रही है तो वह अपनी बारह अक्षौहिणी सेना लेकर युद्ध करने के लिए अपनी दुर्ग से बाहर निकल आए. दोनों सेनाओं के बीच घमासान युद्ध हो गया. अपने दिए हुए वचन के अनुसार भगवान शंकर भी अपने गणो के साथ बाणासुर की ओर से युद्ध कर रहे थे. शंकर जी ने श्री कृष्ण के ऊपर भली-भांति के अस्त्र शस्त्रों का प्रयोग किया. पर श्रीकृष्ण ने उन सभी अस्त्र-शस्त्रों को शांत कर दिया. अंत में श्रीकृष्ण ने शंकर पर एक ऐसा अस्त्र चला दिया कि वे मोहित होकर युद्ध से अलग हो गए. श्री कृष्ण और उनकी सेना के बलराम, प्रधुमन आदि योद्धाओं के प्रहार से व्याकुल होकर बाणासुर की सेना में भगदड़ मच गई. यह देखकर बाणासुर बहुत क्रोधित हुआ और अपने रथ पर सवार होकर आगे आया और श्रीकृष्ण पर प्रहार करने लगा. अपनी एक हजार हाथों से एक साथ 500 धनुषों पर बाण चढ़ाकर श्री कृष्ण पर छोड़ने लगा. पर भगवान कृष्ण ने एक साथ बाणासुर के सारे धनुष काट डाले, सारथी को मार डाला, रथ को तोड़ फोड़ दिया और घोड़ों को भी घायल कर दिया. बाणासुर रथहीन हो जाने के कारण युद्ध भूमि छोड़ कर भाग गया.

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युद्ध चलता रहा. कुछ समय बाद बाणासुर फिर रथ पर सवार होकर आया और श्री कृष्ण के ऊपर बाणों की वर्षा करने लगा. अब श्री कृष्ण ने उस पर अपना सुदर्शन चक्र चला दिया. सुदर्शन चक्र उसकी भुजाओं को तेजी से काटने लगा. जब भगवान शंकर ने देखा कि उनके भक्त बाणासुर की भुजाएं कट रही है तब वे श्री कृष्ण के सामने आकर प्रार्थना करने लगे. उन्होंने कहा – बानासुर मेरा भक्त है, मैंने इसको अभय दान दिया है. अब आप भी इस पर कृपा करें.

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श्री कृष्ण ने कहा आप के कहने के कारण मैं बाणासुर का वध नहीं करूंगा. इस को अपनी शक्ति का बड़ा घमंड हो गया था. इस के घमंड को चूर करने के लिए मैंने इसकी भुजाएं काट दी है. अपनी सेना के साथ यह पृथ्वी का भार बना हुआ था. इसलिए मैंने इसकी सेना का संहार कर दिया है. अब चार भुजाएं इसकी बच रही है. अभी मैं इनकी नहीं काटूंगा. श्री कृष्ण की यह बात सुनकर बाणासुर आकर उनके चरणों में गिर पड़ा. अब उसका गर्व नष्ट हो चुका था. इसलिए श्रीकृष्ण ने उसको अभय दान दे दिया.

बाणासुर अपनी पुत्री उषा और अनिरुद्ध को रथ पर बैठा कर कृष्ण के पास ले आया. भगवान शंकर से आज्ञा लेकर श्रीकृष्ण ने अनिरुद्ध और उषा का विवाह कराया और उनको लेकर अपनी सेना के साथ द्वारका लौट गए.

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