प्रभु का आदेश


प्रभु का आदेश
प्रभु का आदेश

Enlightening and inspirational Hindi Story : एक पंडित जी थे. बड़ा विनम्र एवं दयालू स्वभाव था उनका. प्रतिदिन मंदिर जाते और समय पर यथा संभव किसी न किसी गरीब प्राणी की सहायता करते. दुखी व्यक्ति उनकी मृदु वाणी सुनकर अपना दुख ही भूल जाते थे.

एक बार पंडित जी सुबह गंगा स्नान कर मंदिर के लिए चले. अभी घर से कुछ ही दूर गए थे कि उन्होंने देखा एक कुत्ता कूड़े के ढेर पर बैठा कराह रहा है. उसके कान के पास घाव हो गया था. पीड़ा तथा मक्खियों से तंग आकर वह इधर उधर भटक रहा था. हर कोई उसके शरीर से आ रही दुर्गंध के कारण उसे भगा देता. कूड़े के ढेर पर और अधिक मक्खियां थी. अतः कुत्ता बार-बार सिर हिला कर रोने जैसी आवाज निकालता था.

पंडित जी का दयालु हृदय पिघल गया. उन्होंने मंदिर जाना छोड़ा और सीधे औषधालय पहुंचे. वहां वैध जी से दवाई ली और वापस उसी कूड़े के ढेर के पास आ गए. कुत्ता अभी भी वैसे ही पड़ा था.

पंडित जी ने एक बांस पर कपड़ा लपेटा तथा उस पर दवाई लगा कर कुत्ते के घाव पर लगाने लगे. परेशान कुत्ते ने अपने पास जब आदमी को लाठी लिए देखा तो वह दांत निकाल कर गुर्राने लगा तथा काटने झपटने की कोशिश भी करने लगा. राह चलते और भी कई आदमी वहां रुक गए थे. एक व्यक्ति बोला पंडित जी ऐसे कुत्ते अक्सर पागल हो जाते हैं. अतः आप का निकट जाना उचित नहीं.

पंडित जी ने उसकी बात की ओर ध्यान नहीं दिया. अपितु अपने कार्य में लगे रहे. काफी समय तक घाव साफ कर दवा लगाते रहे. जब कुत्ते की पीड़ा कुछ कम हो गई तो उसने गुर्राना बंद कर दिया और पंडित जी की और कृतज्ञ भाव से देखने लगा.

औषध पट्टी से संतुष्ट होकर पंडित जी मंदिर पहुंचे. पुजारी ने हंसते हुए पूछा – पंडित जी आज देर कहां लगा दी. पंडित जी ने उत्तर दिया – पुजारी जी रास्ते में प्रभु का आदेश हुआ कि घायल कुत्ते की मरहम पट्टी करो. भला उसे कैसे टाल सकता था.

पुजारी जी समझ गए. उनके स्वभाव से पूर्व परिचित थे.

पंडित जी ने पूरे 1 सप्ताह तक कुत्ते की सेवा की. जब कुत्ता पूर्णतया स्वस्थ हो गया तो पंडित जी उसे बाहर छोड़ने चलें. पर कुत्ता अब अपने स्वामी को भला कैसे छोड़ सकता था. वापिस लौट आया और जीवन भर पंडित जी के मोहल्ले में ही घूमता रहा.

जानते हो वह पंडित जी कौन थे ? पंडित मदन मोहन मालवीय, काशी हिंदू विश्वविद्यालय के संस्थापक एवं स्वतंत्रता संग्राम के महान सेनानी.

महामना मदन मोहन मालवीय का परिवार कई पीढ़ियों से श्रीमद्भागवत का विद्वान होता आया था. पंडित मदन मोहन के पिता अत्यंत सरल स्वभाव के एवं संतोषी ब्राह्मण थे. उनका परिवार बहुत गरीब था. कई बार ऐसा अवसर भी आया कि घर में कुछ भी नहीं होता था. तब पूरा परिवार उपवास करता था. भिक्षा मांगना तो पंडित जी को मृत्यु के समान लगता था. वे दान भी नहीं लेते थे.

एक बार रीवा कि महाराज ने उन्हें भागवत सुनाने के लिए बुलवाया. कथा समाप्ति पर महाराज ने ₹5000 कथा की दक्षिणा दी. पंडित जी ने सारे रुपए वहीं भिक्षुओं में बांट दिए. किसी ने पूछा पंडित जी बच्चों के लिए तो कुछ ले जाते. पंडित जी मुस्कुराए, भाई ब्राह्मण का धन से क्या मतलब. बच्चों की चिंता का काम उसी पर छोड़ दिया जो सबको पालता है.

सच है ऐसे ही पुरुषों के घर तो मदन मोहन मालवीय जैसे महापुरुष पैदा होते हैं.


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