यूनान का सत्यार्थी महान सुकरात


सुकरात की यूनान के महान पुरुषों में गणना होती है. वह वचन और कर्म दोनों से महान पुजारी थे, सत्य के. वह कबीर की तरह ही, ढोंग, पाखंड और अंधविश्वासों के पूरे विरोधी तो थे ही, घृणा भी करते थे. वे स्वतंत्र चिंतक थे, विचारक थे और थे दार्शनिक. उनका कहना था – देखकर विश्वास मत करो, सुनकर भी किसी को मत मानो – उसे ही स्वीकार करो जिसे तेरी बुद्धि स्वीकार करें! विवेक जिसे सही माने. सत्य से बढ़कर कुछ भी नहीं है. वे नगर नगर, गांव गांव, गली गली घूम कर यही कहा करते थे –

  • कुरीतियों को मिटाओ.
  • सत्य और कर्तव्य पर दृढ़ रहो.
  • देश का सचरित्र नागरिक बनो और गलत राज्यादेशों के लिए अपने विचार व्यक्त करो.
  • झूठ के आगे मत झुको.
  • अंधविश्वासों को उखाड़ फेंको. उनके इस प्रचार- युद्ध : विचार का, उपदेश का, बड़ा ही व्यापक असर पड़ा. देश में – समाज में, जन जागरण में, नवयुवक जाग पड़े. कुरीतियों पर चोट करने लगे. समाज में प्रचलित अंधविश्वासों की जड़ें उखाड़ फेंकने लगे. पोंगा पंथियों पर आघात पड़ने लगा.

एथेंस के अधिकारी और पोपपंथी, जिनके स्वार्थों में और जिनकी उन्मुक्त राहों में बाधा पड़ने लगी, सुकरात के प्रबल विरोधी हो गए. उनके संदेशों को सरकार ने विद्रोह समझा राजद्रोह – समाज में पोंगापंथीयों ने समाज विरोधी. और इस प्रकार सुकरात को नीचा दिखाने के लिए तरह-तरह के षड्यंत्र और साजिशें की जाने लगी. उन पर तरह तरह के आरोप लगाए गए. जिनमें प्रमुख ये थे –

  • सुकरात अपने उग्र भाषणों के द्वारा देश में अस्थिरता और अशांति फैलाते हैं.
  • समाज में विसंगति असंगति फैलाकर गृह युद्ध की स्थिति पैदा कर रहे हैं.
  • नव युवकों को देशद्रोह के लिए तैयार कर रहे हैं. इस बात के लिए भी भड़का रहे हैं कि तेरे पुर्वज कुछ नहीं थे, पोंगापंथी थे, तुम्हें उन से बढ़कर होना है और सारी व्यवस्था नए सिरे से ठीक करनी है.
  • सुकरात चरित्रहीन है और नव युवकों को चारित्रिक दृष्टिकोण से भी भटकाते हैं. प्रबल शारीरिक भूख के कारण ये भेड़िए के सदृश्य अनैतिक और असामाजिक आचरण करते हैं, आदि आदि…

इस प्रकार के, तरह तरह के, मिथ्या आरोपों के लिए उन पर न्यायालय में मुकदमा चला. इसमें कोई भी आरोप देखने में नगण्य और हल्का नहीं लगता है. उनके चाहने वालों ने दो प्रस्ताव रक्खे –

महात्मा जी, आप देश छोड़कर अन्यंत्र चले जाएं.

और….

आप सारे अपराधों को स्वीकार कर, क्षमा मांग ले.

सुकरात ने कहा – प्रिय बंधुओं! तुम लोगों की सद्भावना के लिए कृतज्ञ हूँ, पर इन विचारों को मानने के लिए मुझे न प्रेरित करो और ना प्रभावित. मैं ऐसा करके अपने देश और संपूर्ण जगत के लिए कोई भी गलत आदर्श नहीं रखूंगा. मैंने जो कुछ भी किया है, ठीक है. मेरे सारे आचरण सही, सामाजिक, नैतिक और राष्ट्रीय है. मैंने किसी भी रुप में, कोई भी, किसी भी प्रकार का अहितकारी कार्य न व्यक्ति के लिए और न समाज, राष्ट्र और मानव जाति के लिए ही किया है.

न्यायालय में उनके सारे अभियोगों को उन्हें पढ़कर सुनाया गया. उन्होंने अपनी सफाई में कुछ भी कहने से इंकार करते हुए इतना ही कहा मैंने कोई भी गलती नहीं की, अतः क्षमा याचना करने के आग्रह को अस्वीकार्य करता हूं.

अपने मित्रों से उन्होंने कहा – मैं अपनी जिंदगी के लिए क्यों प्रयत्न करूँ ? यह प्रयत्न तो वे करें जिन्हें नहीं रहने से हानि होगी और फिर मैं तो दूसरे लिए जिया और मर कर भी जियूँगा, दूसरे के लिए ही.

उनके शुभचिंतक इस उत्तर के बाद हतोत्साहित हो गए और निरुत्तर भी. न्यायालय ने मृत्युदंड का फैसला सुनाया. इस फैसले से संपूर्ण एथेंस में हलचल मच गई, पर सुकरात शांत और स्थिर रहे. कुछ दिनों तक जेल में रहना पड़ा. लोगों ने पुनः भागने की सलाह दी और व्यवस्था की, फिर भी वह अपने इरादे पर अडिग और स्थिर रहे. बिना किसी प्रकार की घबराहट के वे सब कुछ सहते रहे और मृत्यु की प्रतीक्षा करते अपनी स्त्री और बच्चों से भी बड़ी स्थिरता, धैर्य और शांति के साथ मृत्युदंड को सह लेने का साहस रखने को कहा.

मृत्युदंड की तिथि आई. विष का प्याला सामने रक्खा गया. न्यायालय में वीर एथेंस के इस सत्य शरीर को देखने के लिए अपार भीड़ एकत्रित हो गई. राजा को भीड़ संभालने के लिए बहुत बड़ी : फौजों की व्यवस्था करनी पड़ी. पूरा वातावरण आंदोलित हो उठा.

सुकरात की जय और सत्य की जय. के गगनभेदी नारों से वातावरण गूंज उठा. भीड़ ने सत्य का समर्थन किया और वीर सुकरात के हौसले को बुलंद.

सुकरात ने विष का प्याला पी लिया वैसे ही जैसे कोई बड़ा प्यासा पानी को पीता है. उनके चेहरे पर उस समय प्रशंनता की रेखा थी, ना की भय, चिंता या विषाद की. सभी लोग देखकर दंग थे. यह शांति देखकर उनके चेहरे पर उपस्थित जनता हाहाकार कर उठी और रोने चिल्लाने लगी. उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए कहा – मित्रों मृत्यु शांति का है, परम शांति का आश्रय है, अतः आप शोक न करें. फिर यह मृत्यु सत्य के लिए है और सत्य शाश्वत और चिरंतन होता है. इतना ही नहीं एक दिन तो सबको मरना ही है. जन्म मरण तो चिरंतन सत्य है ना. यह मृत्यु लोग है, मृत्यु एक सत्य है. एक शिष्य ने उत्तर दिया – शोक असली मृत्यु का नहीं, वरन गलत आरोप के लिए है. एक निरपराध को मृत्यु दंड हम लोगों को दुख दे रहा है. सुकरात ने उत्तर दिया – यही तो सबके परम आनंद की बात है. क्या तुम लोग चाहते हो कि मैं एक अपराधी के रूप में मरुँ? जो सजा दे रहे हैं, अनजाने, भगवान उन्हें माफ करें. मेरे प्रिय शिष्यों ! एक बार सदा याद रखना कि अगर तुम पर गलत आरोप है, इसके दुखी मत होना. देखना यह है कि कोई आरोप तो तुम पर सही तो नहीं है.

सत्य के महान समर्थक सुकरात के इस उत्तर ने सबको निरुत्तर कर दिया.

उन दिनों जिसे विष दिया जाता था, मृत्यु दंड के रूप में, उसे तब तक टहलाया जाता था, जब तक वह शिथिल होकर गिर ना जाए. यह कार्य सुकरात को विष देने के बाद, राजा के पदाधिकारियों ने बड़ी निर्ममता से किया. सुकरात के पांव में छाले पड़ गए. अंग शिथिल हो गया. वे शिथिल होकर गिर गए. अचानक उन्हें एक बात याद आई – एक मुर्गी की. उन्होंने अपने सेवक को बुलाकर कहा – याद होगा, मैंने एक मुर्गी ली थी. उसकी कीमत बाकी है, चुका दोगे ना! चुका देना. कर्ज मेरे सीने पर एक बोझ है. प्रियवर, मेरे सेवक, अंतिम रूप से, आंख मूंदने से पहले चुका देना. कर्ज उतार दोगे! सेवक ने उत्तर दिया – हां श्रीमान, कुछ और आदेश और कोई आकांक्षा ? नहीं. मृत्यु के पूर्व उन्होंने कहा – मेरे शुभचिंतक! पुरुषार्थी को मृत्यु की प्रतिष्ठा करनी चाहिए, इसी में गौरव है. हंसते हंसते मरना चाहिए, ताकि मृत्यु में, सुकरात ने कहा, तेरे लिए सारा संसार रोए. गौरवशाली मृत्यु वही है, जिसमें संसार से विदा होते समय मरने वाला हंसे और मरने वाले के लिए सारा संसार रोए, तड़पे.

सुकरात की जय-जय कार से पुनः वातावरण गूंज उठा!

सुकरात ने सब को प्रणाम किया और अंतिम रुप से – हे प्रभु! उन्हें क्षमा करना. अलविदा! कहा और पृथ्वी पर गिर पड़े. हंसते हंसते वीरगति पाई.

सत्य और क्षमा कि यह मिसाल इतिहास के पन्नों पर स्वर्णाक्षरों में अंकित है और सुकरात का अंतिम वचन – हे प्रभु! भगवान् उन्हें छमा करना! अमर है.


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