विघ्न ना डालो


विघ्न ना डालो
विघ्न ना डालो

Enlightening and inspirational Hindi Story : कश्मीर में एक विद्वान ब्राह्मण थे. नगर के दूर झोपड़ी में निवास करते थे. झोपड़ी में उनकी संपत्ति के नाम पर एक टूटी चारपाई तथा कमंडलु था. उनकी पत्नी वन से मूंज काट कर ले आती तथा रसियां बंटती. उन्हें बाजार में बेच कर जो पैसे मिलते उनसे घर का खर्च चलाती. किसी से भिक्षा तो ले नहीं सकती थी क्योंकि ब्राह्मण ने भिक्षा ना लेने की आज्ञा दे रखी थी.

विद्वान ब्राह्मण दिन रात अध्ययन में लगे रहते. जब थक जाते तो जमीन पर चटाई बिछाकर लेट जाते. उठते ही फिर लिखना शुरु कर देते. इनकी विद्वता का डंका दूर दूर तक बज रहा था.

एक बार काशी के कुछ पंडित उनसे मिलने उनके आश्रम में आए. ब्राह्मण ने उनका यथायोग्य आदर सत्कार किया. काशी के पंडितों को ब्राह्मण की दशा देख कर बहुत दुख हुआ.

वह कश्मीर नरेश से मिले और ब्राह्मण की स्थिति समझाई. उन्होंने राजा को ब्राह्मण की आर्थिक सहायता करने को कहा.

कश्मीर नरेश बोले – मुझे उस विद्वान के आश्रम में धन जैसी तुच्छ वस्तु ले जाते हुए लज्जा अनुभव होती है. भय भी है कि कहीं क्रोधित ना हो जाएं. मैं आपको यह पत्र लिख देता हूं जहां से जितना धन चाहे वह ले सकेंगे. आप यह पत्र उन तक पहुंचा दें.

काशी के पंडित दान पत्र लेकर ब्राह्मण के आश्रम में पहुंचे और उनसे प्रार्थना की कि इसे स्वीकार ले.

वही हुआ जिसका भय था. ब्राह्मण ने वह पत्र फाड़ दिया और अपनी पत्नी को बोले अपनी चटाई बांध लो, मेरी पुस्तकें भी उठा लो. अब यहां नहीं रह पाएंगे क्योंकि यहां का राजा ब्राह्मण को धन के लालच में डालना चाहता है.

सभी पंडित ब्राह्मण के चरणों में गिर पड़े. इतने में कश्मीर नरेश भी वहां पहुंच गए. उन्होंने भी ब्राह्मण से इस धृष्टता के लिए क्षमा मांगी और राज्य छोड़कर ना जाने की प्रार्थना की.

ब्राह्मण ने चटाई रख दी और एक शर्त पर रहना स्वीकार किया कि भविष्य में उनके अध्ययन में बाधा डालने वाला कोई भी कार्य ना करें और ना ही अपने सेवकों को यहां भेजें. राजा और अन्य पंडित क्षमा मांगते हुए चले गए तथा ब्राह्मण लेखन में जुट गए.

प्रिय पाठकों जानते हो यह महापंडित एवं संतोषी ब्राह्मण कौन थे ? महाभाष्य के सुप्रसिद्ध टीका के कर्ता तथा संस्कृत के अपूर्व विद्वान कैयट जी.

संस्कृत के इस महापंडित ने महाभाष्य जैसे ग्रंथ पर पहली टीका लिखकर इसे सरल कर दिया. एकाग्रता के बिना यह सब असंभव था. तभी तो हमारे आदी ऋषि जंगलों में अपनी आवश्यकता को सीमित रखते हुए ग्रंथ रचना करते थे.

धन्य है कैयट जी जिन्होंने संतोष की प्रथा को बनाए रखा.


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