वह भला आदमी


ईश्वरचंद्र विद्यासागर - भारत के महापुरुष
ईश्वरचंद्र विद्यासागर - भारत के महापुरुष

एक बार बंगाल में भारी अकाल पड़ा. लोग भूख से त्राहि-त्राहि करने लगे. भूखे मरते बेचारे गरीबों ने भीख मांगना शुरु कर दिया. पर भीख दे कौन? हर किसी को को स्वार्थ की लगी थी.

उन्हीं दिनों बंगाल के शहर बर्दवान में एक भद्र पुरुष घूम रहा था. अचानक एक पतला-दुबला बालक उनके पास आया और हाथ फैला कर बोला – “बाबूजी, एक पैसा! कई दिनों से भूखा हूं.”

भद्र पुरुष ने बच्चे को ऊपर से नीचे तक देखा. उसके शरीर पर फटे चिथड़े लिपटे थे. उसकी आंखों में करुणा के भाव थे.भद्र पुरुष ने कहा “बेटा! अगर मैं तुम्हें एक की बजाए दो पैसे दूं तो तुम क्या करोगे?”

“एक पैसे से भोजन लूंगा और एक पैसा माता को दूंगा.” बच्चे हैं उत्तर दिया. “यदि मैं तुम्हें दो आने दे दूं तो?” उस व्यक्ति ने प्रश्न किया.

लड़के को लगा कि वो व्यक्ति उसका मजाक उड़ा रहा है. उसने लौटते हुए कहा – “बाबूजी हम गरीबों का मजाक तो ना उड़ाओ.”

“मैं मजाक नहीं कर रहा, बेटा! सच बताओ, अगर मैं तुम्हें 4 आने दूं तो क्या करोगे?” भद्र पुरुष ने पूछा.

“चार आने?” लड़के ने आश्चर्य से देखा. शान भर सोच कर बोला – “तब तो सारी मुसीबत ही कट जाएगी. दो आने का अपने और मां के लिए भोजन लूंगा. और शेष 2 आने के आम लेकर बेच दूंगा. इससे मेरा गुज़र हो जाएगा.”

उस आदमी ने बालक को एक रुपया दिया और चला गया.

कई वर्ष बाद वही व्यक्ति फिर वर्तमान आया. वो पुरानी घटना भूल चुका था. सड़क से जा रहा था कि पीछे से किसी ने आवाज दी. भद्र पुरुष जैसे ही रुका एक युवक ने उनके पैर पकड़ लिए और अपनी दुकान में चलने की प्रार्थना की.

भद्र पुरुष ने कहा, “भाई मैं तुम्हें नहीं जानता.”

“लेकिन मैं आपको जीवन भर याद रखूंगा. आपने उस दिन मुझे 1 रुपए देकर उबार लिया. मैं आपको खाना खिलाएं बिना नहीं भेजूंगा.”

युवक के हठ के आगे भद्र पुरुष को झुकना पड़ा.

एक दिन यही महापुरुष बर्मा खांड में ठहरे हुए थे. एक बूढ़ा व्यक्ति उन्हें ढूंढता हुआ वहां आया और हाथ जोड़कर बोला – “मैं कई दिनों से आप को ढूंढ रहा हूं. पर मुझे पता नहीं चल सका कि आप कहां ठहरे हैं.” मैं इस शहर में भटक गया था.”

भद्र पुरुष ने उसे देखा और कहा – “भोजन तैयार है. पहले खाना खाओ बाद में बात करेंगे.”

इतना सुनते हीं उस बूढ़े व्यक्ति की आंखों से आंसू आ गए. सज्जन ने रोने का कारण पूछा तो बूढे ने रोते-रोते कहा – “तीन दिन से यहां भटक रहा हूं किसी ने खाने के लिए नहीं पूछा. आप एकमात्र ऐसे व्यक्ति मिले हैं जिन्होंने मानवता दर्शाई.”

“इसमें रोने की क्या बात है? भोजन का समय हो रहा है. बाद में और बात करेंगे.” इतना कहकर वह सज्जन उसे साथ ले खाने के लिए चल पड़े.

सीधे-सादे कपड़े पहने एक दिन व्यक्ति सड़क से गुजर रहा था. धूप बहुत तेज थी. शरीर से पसीना बह रहा था. उसने कुछ क्षण विश्राम करने की सोची और एक वृक्ष के नीचे खड़ा हो गया.

उसने देखा सामने दूसरे वृक्ष के नीचे एक व्यक्ति और बैठा है. उस आदमी ने सोचा क्यों ना विश्राम उसी वृक्ष के नीचे करूं जहां वह दूसरा व्यक्ति बैठा है. इस बहाने उससे बात भी हो जाएगी और विश्राम के साथ समय भी व्यतीत हो जाएगा.

यूं सोच कर वह भी उसी वृक्ष के नीचे चला गया. लेकिन वहां जाकर उसने देखा कि जिस व्यक्ति के लिए वह वहां तक गया था वह बेचारा तो बहुत उदास था.

उसने उसे खिन्न देखकर दुख का कारण पूछा. पहले तो उस दुखी व्यक्ति ने कुछ बतलाना नहीं चाहा पर बार-बार कहने पर उसने बताया – “अपनी लड़की के विवाह के लिए मुझे महाजन से ऋण लेना पड़ा जो अब तक नहीं चुका पाया हूं. महाजन ने कचहरी में दावा कर दिया है. अब तो घर भी नीलाम हो जाएगा और जेल भी जाना पड़ेगा.”

भद्र पुरुष ने बातों-बातों में उसका नाम-पता पूछ लिया. और सहानुभूति प्रकट करता हुआ चला गया. कुछ देर बाद वह दुखी व्यक्ति भी अपने घर चला गया.

मुकदमे की तारीख पर वह अदालत में हाजिर हुआ. वहां किसी ने बताया कि उसका तो मुकदमा ही समाप्त हो गया है क्योंकि किसी ने रुपये जमा करा दिए हैं.

रुपये जमा किसने कराए? वह काफी देर तक सोचता रहा. अचानक उसका ध्यान उस भद्र पुरुष की और गया. पर उसे विश्वास नहीं हुआ क्योंकि वह व्यक्ति भी तो उसी की तरह साधारण कपड़े पहने हुए था.

कुछ दिन बाद उसने उसी भद्र पुरुष को एक जनसभा में भाषण करते हुए देखा. लोगों की अपार भीड़ थी. उसकी बात बड़े ध्यान से सुन रहे थे. और बीच-बीच में नारे भी लगा देते – “ईश्वर बाबू! अमर रहे!”

अब उसे समझते देर ना लगी कि उसकी सहायता करने वाले पंडित ईश्वरचंद्र विद्यासागर ही थे.


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